कुछ - कुछ बिंदास , कुछ - कुछ जिज्ञासु सोनाबाबू : ले. कुँवरजी अग्रवाल
April 10, 2008सोनाबाबू उनमें थोड़ा अलग थे । कुछ - कुछ बिंदास और कुछ - कुछ जिज्ञासु । मेरी उनसे अच्छी पटती थी , मेरी कटु आलोचनाओं के बावजूद उनमें सुनने और समझने का धैर्य था । अपने हमउम्र रंगकर्मियों में वह मुझे आत्मविकास के प्रति सजग नजर आते । वे अपनी नाट्य प्रस्तुतियों को अपनी सीमाओं के बावजूद ठोस आधारों पर खड़ा करते और काफी मेहनत करते । उनके निर्देशन में एक तरह का कसाव रहता जो रंगमंच पर नाटक को झूलने से अक्सर बचा लेता । अपनी नाट्यमंडली के सदस्यों , अभिनेताओं और दूसरी तरह के कार्यकर्ताओं के साथ उनके मानवीय रिश्तों में गर्माहट थी जो उन्हें एकजुट बनाए रखने में काफी मदद करती थी । सोनाबाबू के मन में अच्छा थियेटर करने की उमंग थी लेकिन अपने रंग परिवेश की सीमाओं से वे अक्सर तल्ख़ हो उठते थे । काशी में साधन कोई है ही नहीं । यहां तो हमें जो कुछ भी करना है । उसके बारे में सोचना पड़ता है।आर्थिक पहलू से कमजोर होते हुए भी हम हिंदी रंगमंच की स्थिति को कायम रखे हैं । प्रकाश व्यवस्था के संबंध में कुछ यंत्र डीएल्डब्ल्यू (डीजल रेल इंजन कारखाना) में है पर वे वहीं के लिए सीमित हैं । दूसरों के लिए अप्राप्य ।काशी में आज भी कोई सस्ता मंच न सरकार दे सकी , न रंगकर्मी जुगाड़कर सके , न कोई दानवीर दे सका और न नगरमहापालिका ही कोई सुसज्जित रंगमंच की आवश्यकता महसूस कर सकी ।
सोनाबाबू अपनी प्रस्तुति और अपनी संस्था से कुछ ऊपर उठकर काशी के पूरे रंगपरिवेश को उन्नत करने की बात सुनकर सक्रिय भी हो सकते थे । मैंने जब काशी में एक डायेरेक्टर्स फोरम बनाने की योजना बतायी तो वे इसके लिए फौरन तैयार हो गये और शिवमूरत सिंह को उसका संयोजक बना दिया गया ।उसमें मेरे और सोना बाबू के अलावा डीएलडब्ल्यू के ज्योतिंद्र सिंह सोहल भी तुरन्त शामिल हो गये ।लेकिन बनारस के थियेटर की फिजा को मोड़ने में माहिर कुछ लोगों की कृपा से यह फोरम न आगे बढ़ सका न ज्यादा कुछ कर सका ।
डाकतार विभाग में नौकरी करते हुए और भरी-पूरी गृहस्थी की गाड़ी को कुशलतापूर्वक खींचते हुए भी अपने जीवन के बहुमूल्य ३० - ३५ वर्ष सोना बाबू ने हिन्दी रंगमंच को अर्पित कर दिये । काबिलेगौर है कि यह हिन्दी का अव्यवसायी रंगमंच था जिसके भरोसे असली हिन्दी रंगमंच पिछले सौ साल से टिका हुआ है । औसतन लगभग तीन घण्टे प्रति शाम ऐसा रंगकर्मी हिन्दी को देता है । बिना किसी आर्थिक प्रतिदान के अपने घरेलू जीवन के लिए जरूरी वक्त को छीन कर । मरने के बाद उसके पीछे क्या रह जाता है। कुछेक फोटोग्राफ , अखबारों की कुछ कतरनें ,दो-चार अदद छोटे बड़े पुरस्कारों के सर्टिफिकेट्स जो उत्तराधिकारियों के किसी काम के नहीं । इनके अलावा और जो मूल्यवान वह कुछ छोड़ जाता है।एक कला परंपरा को बनाए रखने की कोशिश । उसकी कोई पहचान,कोई कद्र नहीं ।
सोना बाबू के खाते में लगभग डेढ़ दर्जन नाटकों का निर्देशन और उतने ही में अभिनय , लगभग आधा दर्जन मौलिक नाटक लेखन और करीब दस साहित्यिक कृतियों का नाट्य रूपांतर है । इनके अलावा कई छोटे-मोटे पुरस्कारों के अतिरिक्त अभिनय के लिए शाकुंतल तथा उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार भी उनके खाते में है।हो सकता है कोई अपने खाते में इससे बड़ी संख्या गिना दे लेकिन अपने दौर में गुणवत्ता की दृष्टि से सोनाबाबू अंगुलियों पर गिने जाने वालों में हैं । ऐसे तेजस्वी रंगसहकर्मी को खोकर मैं मर्माहत हूँ ।

