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कुछ - कुछ बिंदास , कुछ - कुछ जिज्ञासु सोनाबाबू : ले. कुँवरजी अग्रवाल

April 10, 2008
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    सोनाबाबू उनमें थोड़ा अलग थे । कुछ - कुछ बिंदास और कुछ - कुछ जिज्ञासु । मेरी उनसे अच्छी पटती थी ,  मेरी कटु आलोचनाओं के बावजूद उनमें सुनने और समझने का धैर्य था । अपने हमउम्र रंगकर्मियों में वह मुझे आत्मविकास के प्रति सजग नजर आते । वे अपनी नाट्य प्रस्तुतियों को अपनी सीमाओं के बावजूद ठोस आधारों पर खड़ा करते और काफी मेहनत करते । उनके निर्देशन में एक तरह का कसाव रहता जो रंगमंच पर नाटक को झूलने से अक्सर बचा लेता । अपनी नाट्यमंडली के सदस्यों , अभिनेताओं और दूसरी तरह के कार्यकर्ताओं के साथ उनके मानवीय रिश्तों में गर्माहट थी जो उन्हें एकजुट बनाए रखने में काफी मदद करती थी । सोनाबाबू के मन में अच्छा थियेटर करने की उमंग थी लेकिन अपने रंग परिवेश की सीमाओं से वे अक्सर तल्ख़ हो उठते थे । काशी में साधन कोई है ही नहीं । यहां तो हमें जो कुछ भी करना है । उसके बारे में सोचना पड़ता है।आर्थिक पहलू से कमजोर होते हुए भी हम हिंदी रंगमंच की स्थिति को कायम रखे हैं । प्रकाश व्यवस्था के संबंध में कुछ यंत्र डीएल्डब्ल्यू (डीजल रेल इंजन कारखाना) में है पर वे वहीं के लिए सीमित हैं । दूसरों के लिए अप्राप्य ।काशी में आज भी कोई सस्ता मंच न सरकार दे सकी , न रंगकर्मी जुगाड़कर सके , न कोई दानवीर दे सका और न नगरमहापालिका ही कोई सुसज्जित रंगमंच की आवश्यकता महसूस कर सकी ।

    सोनाबाबू अपनी प्रस्तुति और अपनी संस्था से  कुछ ऊपर उठकर काशी के पूरे रंगपरिवेश को उन्नत करने की बात सुनकर सक्रिय भी हो सकते थे । मैंने जब काशी में एक डायेरेक्टर्स फोरम बनाने की योजना बतायी तो वे इसके लिए फौरन तैयार हो गये और शिवमूरत सिंह को उसका संयोजक बना दिया गया ।उसमें मेरे और सोना बाबू के अलावा डीएलडब्ल्यू के ज्योतिंद्र सिंह सोहल भी तुरन्त शामिल हो गये ।लेकिन बनारस के थियेटर की फिजा को मोड़ने में माहिर कुछ लोगों की कृपा से यह फोरम न आगे बढ़ सका न ज्यादा कुछ कर सका ।

    डाकतार विभाग में नौकरी करते हुए और भरी-पूरी गृहस्थी की गाड़ी को कुशलतापूर्वक खींचते हुए भी अपने जीवन के बहुमूल्य ३० - ३५ वर्ष सोना बाबू ने हिन्दी रंगमंच को अर्पित कर दिये । काबिलेगौर है कि यह हिन्दी का अव्यवसायी रंगमंच था जिसके भरोसे असली हिन्दी रंगमंच पिछले सौ साल से टिका हुआ है । औसतन लगभग तीन घण्टे प्रति शाम ऐसा रंगकर्मी हिन्दी को देता है । बिना किसी आर्थिक प्रतिदान के अपने घरेलू जीवन के लिए जरूरी वक्त को छीन कर । मरने के बाद उसके पीछे क्या रह जाता है। कुछेक फोटोग्राफ ,  अखबारों की कुछ कतरनें ,दो-चार अदद छोटे बड़े पुरस्कारों के सर्टिफिकेट्स जो उत्तराधिकारियों के किसी काम के नहीं । इनके अलावा और जो मूल्यवान वह कुछ छोड़ जाता है।एक कला परंपरा को बनाए रखने की कोशिश । उसकी कोई पहचान,कोई कद्र नहीं ।

    सोना बाबू के खाते में लगभग डेढ़ दर्जन नाटकों का निर्देशन और उतने ही में अभिनय , लगभग आधा दर्जन मौलिक नाटक लेखन और करीब दस साहित्यिक कृतियों का नाट्य रूपांतर है । इनके अलावा कई छोटे-मोटे पुरस्कारों के अतिरिक्त अभिनय के लिए शाकुंतल तथा उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार भी उनके खाते में है।हो सकता है कोई अपने खाते में इससे बड़ी संख्या गिना दे लेकिन अपने दौर में गुणवत्ता की दृष्टि से सोनाबाबू अंगुलियों पर गिने जाने वालों में हैं । ऐसे तेजस्वी रंगसहकर्मी को खोकर मैं मर्माहत हूँ ।

रंगमंच के सोना थे सोनाबाबू : ले. कुँवरजी अग्रवाल

April 5, 2008

  सोनाबाबू ( अवधबिहारीलाल श्रीवास्तव ) नहीं रहे । उनके साथ ही काशी रंगपरिवेश का एक अध्याय पूरा हो गया । मेरे लिए सोनाबाबू को याद करना पिछली आधी शती के अपने ही नाट्यजीवन को याद करने जैसा है । इस आधी सदी में बनारस के थियेटर ने कितने रंग बदले ।

    आज से पचास साल पहले मैंने उन्हें पहली बार अभिनय करते देखा था । मैदागिन स्थित टाउनहाल का ऐतिहासिक भवन था जिसे आम जनता अंधरी कचहरी के नाम से जानती थी । उन्नीसवीं शती के साठ के दशक में अंग्रेजी हुकूमत ने पहली बार आनरेरी मैजिस्ट्रेटी की प्रथा चालू की थी और काशी के कई रईसों को आनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाकर उन्हें छोटे-मोटे मामलों की सुनवाई और फैंसले का अधिकार सौंपा था । भारतेंदु भी उनमें से एक थे । उनकी कचहरी यहीं लगा करती थी । उसी समय आम जनता की जुबान पर आ कर आनरेरी अंधरी बन गया । स्वयं भारतेन्दु ने प्रेमजोगिनी में इस और इशारा किया है- ‘ और कहिए अंधरी मजिस्ट्रों का क्या हाल है ? ‘ बाद में यहाँ कचहरी बन्द हो गयी और यह भवन सार्वजनिक कामों के लिए म्युनिसिपैलिटी को सौंप दिया गया । स्वतंत्रता के बाद मैंने इसी भवन में कई नाटक किए और देखे हैं । उस समय नागरी नाटक मंडली का प्रेक्षागृह नहीं बना था और उसकी जगह खुला मैदान था । रंगमंच जरूर विशाल और भव्य था लेकिन वह कुछ इस तरह सीलबंद कर रखा जाता था कि उसे खुलवाना और सफाई करवाना अपने आप में एक छोटा-मोटा नाटक करने जैसा था । इसीलिए ज्यादातर शौकिया नाट्य मंडलियाँ टाउनहाल को ही अपनी प्रस्तुतियों के लिए चुनती थीं ।

    बांग्ला व्यावसायिक रंगमंच पर सफलता अर्जित कर चुके सत्य बंद्योपाध्याय के स्फीत भावनाओं से ओतप्रोत नाटक एरा ओ मानुष - ये भी इंसान हैं- के मुख्य चरित्र मानसिक रूप से विकलांग दासू का चुनौतीपूर्ण अभिनय सोनाबाबू ने किया था । निर्देशक प्रभातकुमार घोष और अनुवादक दया गिरी थे । प्रस्तुत करने वाली उस समय की सबसे  महत्वपूर्ण संस्था थी श्रीनाट्यम । सोनाबाबू के साथ ही इस संस्था से जुड़े़ और भी कई निष्ठापूर्ण रंगकर्मियों की यादें आ रही हैं । त्रिलोचन प्रसाद भार्गव , गोविन्द प्रसाद केजरीवाल , डॉ. कौशलपति तिवारी , कौतुक बनारसी , मंगला भगत , रामचन्द्र विश्वकर्मा , रामउजागर शर्मा , शमशेर बहादुर सिंह ,- फिल्मों के सुजीत कुमार - आदि । उन्नीस जुलाई १९५८ ई. को हुई यह प्रस्तुति मुझे इसलिए भी याद है कि मेरी नाट्य समीक्षा का श्रीगणेश भी इसी के साथ हुआ , जब नाटक से लौटने के बाद देर रात तक जाग कर सहज प्रभाव प्रेरणावश मैंने इसकी लंबी समीक्षा लिख डाली थी ।

   इस नाटक की उसी वर्ष पांच प्रस्तुतियाँ हुईं । इनके दर्शक या तो श्रीनाट्यम के सदस्य होते थे या फिर टिकट खरीदने वाली जनता । बिना किसी सरकारी अनुदान इसकी प्रत्येक प्रस्तुति आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती थी । किसी अव्यवसायी नाट्य संस्था की यह ऐसी उपलब्धि थी जो काशी में बहुत कम दुहराई जा सकी । गोविन्द प्रसाद केजरीवाल को जब यह पता लगा कि मैंने ये भी इंसान हैं की लंबी समीक्षा लिखी है तो वे मुझे बुलाकर नाट्यम के रिहर्सल में ले गये जहाँ मैंने कलाकारों के सामने अपनी समीक्षा का पाठ किया । बड़ा अनोखा अनुभव था । उसी समय अन्य कलाकारों के अलावा सोना बाबू से मेरा सीधा परिचय हुआ । प्रसंगवश यह रिहर्सल भी बांगला के लोकलुभावन नाटक परिछय के हिन्दी अनुवाद का चल रहा था जिसकी प्रस्तुति इसी वर्ष १३ सितंबर को हुई थी । श्रीनाट्यम तेज रफ़्त्यार से आगे बढ़ रहा था ।

[ जारी ]

प्रख्यात नाट्यविद एवं लेखक कुँवरजी अग्रवाल ख्यातनाम नाट्य निर्देशक हैं तथा नैशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में प्राय: जाते हैं । साझा संस्कृति मंच के वे संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं । ‘ सुबहे बनारस’ ,हिन्दुस्तान से साभार ।

‘ आगाज़ ‘ का खैरम कदम करें

December 16, 2007

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कल ‘यही है वह जगह’ पर एक गीत डालने की कोशिश की , सफल नहीं रहा । मनीष और विमलजी के दिशा निर्देश पर गाड़ी चली लेकिन उन दोनों के चिट्ठे वर्डप्रेस पर नहीं हैं , सो मेरी दिक्कतें उन से कैसे दूर होतीं?  कई प्रिय पाठकों को कल निराशा हुई होगी,त्रुटिपूर्ण पोस्ट देख कर । गीत प्रेमी मित्र सागर ने कहा कि उन्हें इसी समस्या की वजह से ब्लॉगर पर जाना पड़ा ।

 मैंने एक नया चिट्ठा शुरु कर दिया ‘आगाज़’ । पत्रकार विप्लव राही ने समता युवजन सभा (इस जमात से मैं भी जुड़ा था) की दीवाल - पत्रिका इसी नाम ( आगाज़ ) से शुरु की थी , अस्सी के दशक में , काशी विश्वविद्यालय में । इस चिट्ठे पर जायें ,सुनें भी। बनारस की मट्टी से जुड़ा कुछ - कुछ देने की कोशिश रहेगी।

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

October 11, 2007

    अख़बारों के प्राण यानी समाचार अथवा ख़बर । खबरें हासिल करना और उन्हें पेश करने की भी कला है , तथा जिसने इस कला को उत्तम ढंग से साधा है , वह लोगों की सेवा तो कर ही रहा है ,खुद की भी सेवा कर रहा है । आज दुनिया दिनबदिन छोटी होती जा रही है , पश्चिम के सुदूर कोने की ख़बर पूर्व के सुदूर कोने में कुछेक घण्टे में ही पहुँच रही है । कई बार एक स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों को वहीं घटित घटना की खबर मिले इसके पहले वहाँ से हजारों मील दूर रहने वालों को वह ख़बर मिल जाती है । मेरा यह कथन अत्युक्ति नहीं है । श्री रणजीत पण्डित मसूरी रह रहे थे तब गुजरात के ‘अब्बाजान’ कहे जाने वाले अब्बास साहेब तैय्यबजी की मृत्यु वहाँ हुई । श्री रणजीत को इस दुखद घटना की जानकारी तीन दिन बाद अख़बारों से मिली जबकि अब्बास साहेब के कुटुंबीजनों को सैंकड़ों मील से दूर से भेजे गए संवेदना के अनेक तार मिल चुके थे ।

    यूँ अख़बार समाचार छाप कर एक अहम सेवा करते ही हैं , मगर यह समाचार सच के बदले झूठ हो तब क्या हो ? और कुछ नुकसान हो या न हो सरकार के डाक तार- विभाग की अच्छी आमदनी ऐसी ग़लत खबरें जरूर करा देती हैं । ‘गाँधीजी २७ तारीख़ को मुम्बई हो कर जाएँगे’- यह गप्प किसी अख़बार वाले ने उड़ा दी, नतीजन मुझे नाहक ही ढेरों लिखा पढ़ी करनी पड़ी ।

    यदि समाचार सेवा के बदले असेवा के लिए दिए जाँए, तब ! कौमों के बीच ज़हर बरस रहा हो और वहीं आग भड़काने वाली चिन्गारी छोड़ दी जाए, तो ? जहाँ पल भर में शान्ति से लड़ाई की स्थिति बन सकती हो , वहाँ लड़ाई शुरु करवाने के उद्देश्य से सत्य अथवा अर्धसत्य अथवा संशयपूर्ण तथ्य जारी कर दिए जाँए,तब  क्या हो? मिल मजदूरों और मालिकों के बीच झगड़ा चल रहा हो,उसी बीच बड़ी सामूहिक हड़ताल हो जाए ऐसी उड़ती बातें तथा गप्प प्रकाशित की जाँए ,तब क्या हो ? अख़बारनवीस जनता के सेवक न रहकर शत्रु बन जाते हैं,सत्यरूपी अमृत परोसने की जगह असत्य का जहर परोसते हैं । अख़बार की कुछ अधिक प्रतियाँ बिक जाएँगी ऐसे छोटे स्वार्थवश अख़बार इस बुनियादी उसूल की कितनी बार अवहेलना करते हैं ? गांधीजी जेल में थे तब उनके द्वारा वाइसरॉय को कथित तौर पर लिखे गये पत्रों  को ‘मसौदे’ सहित छाप कर एक अखबार ने जनता के चित्त को झूले की पेंग का मजा चखाया था । अन्य एक पत्रकार ने कुछ समय पूर्व ‘नए वाइसरॉय मिलने के विषय में गांधीजी और लॉर्ड हेलिफ़िक्स के बीच पत्राचार चल रहा है’- यह गप्प छाप कर अपनी ,अपने अखबार की प्रतिष्ठा और देश का कितना अहित किया था ? जब से साम्प्रदायिक द्वेष की बीमारी अपने यहाँ आई है और गाहे बगाहे प्लेग की तरह फूट पड़ती है, तब से विशेष रूप से उत्तर में,कितने चीथड़े जैसे अख़बार निकल रहे हैं जो अनेक सच्ची झूठी खबरों से कितना जहर नित्य फैला रहे हैं ? इस जहर के कारण कितनी हत्याएँ हुई हैं ? हाल ही में एक उर्दू अख़बार ने मुम्बई के संवाददाता का निराधार पत्र छापा । पत्र में लिखा था कि फलाँ व्यक्ति गाँधीजी से मिल कर आया है । उसके साथ हुई इस मुलाकात में गांधीजी ने इस्लाम की बखान की , हिन्दू धर्म की निन्दा - आलोचना की तथा कलमा पढ़ा । लखनऊ के इस अखबार के सम्पादक से मिलने के लिए हमने एक मित्र से निवेदन किया और कहा कि ऐसा कोरा झूठ छापने का मकसद भी पूछ लेना । यह मित्र उस व्यक्ति से मिले तब उसने बेशरमी से जवाब दिया : ‘ हमें तो ऐसी खबर मिली है, आपको यदि इसका इनकार छपवाना हो तो छापने के लिए तैयार हूँ । बस यह समझ लीजि कि इनकार छपवाने का यह अर्थ निकलेगा गांधीजी का इस्लाम के प्रति सम्मान नहीं है !’ इस पर टीका करने का यह स्थान नहीं है और आवश्यकता भी नहीं है । परन्तु यह हमारे अभागे देश की अधोगति की सीमा दरशाता है । पत्रकार लोकमत का प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है, तथा लोकमत गढ़ता भी है । इस परतंत्र स्थिति में और विकास के दौर में लोकमत गढ़ना , लोकमत कि ज्ञान से ,सच्चे समाचारों से समृद्ध करना पत्रकार का विशेष धर्म बनता है । अपने देश में लोगों का अज्ञान किस हद तक जाता है इसकी एक मिसाल देता हूँ -  सत्य समाचार देने की जिम्मेदारी कितनी गम्भीर है इसका अन्दाज इस मिसाल से मिलेगा ।कुछ दिन पहले अच्छी खासी तनख्वाह पाने वाला एक व्यक्ति गांधीजी से मिलने आया ।वह अख़बार रोज़ाना तो क्या पढ़ता होगा कभी-कदाच देख लेता होगा । वह एक प्रसिद्ध संस्था में है परन्तु शायद ही अपने काम से बाहर निकल न पाता होगा । वह जब गांधीजी के पास आया तब खान साहब अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान सामने बैठे हुए थे । विवेकवश गांधीजी ने परिचय कराते हुए कहा, ‘ ये ख़ान साहब अब्दुल गफ़्फ़ार खान हैं , नाम तो सुना होगा ? ‘  उसने विनयवश हामी भर दी । मेरे साथ वापस लौटते वक्त रास्तेमें उसने मुझसे पूछा , ‘ यह साहब जो वहां बैठे थे वह तो गांधीजी के पुत्र अब्दुल्ला हैम न, जो कि मुसलमान हुए हैं ?” मैंने उसे वास्तविक बात समझाई । तब उसने दूसरा सवाल दागा , “गांधीजी आजकल यहां बैठे हैं एहमदाबाद में उनकी जो तीन - चार मिलें हैं वह कौन चलाता है ?और यह बड़ा लड़का मुसलमान हुआ तो मिल चलाने वाले कोई दूसरे लड़के हैं ,क्या ?”  ऐसा है हमारी जनता का पढ़ना-लिखना जानने वाला एक औसत व्यक्ति !ऐसे लोगों का कितना अहुइत होगा यदि उन्हें गलत खबर दी जाएगी ? उस उर्दू अख़बार के झूठ को कई उर्दू अखबारों ने लिया तथा मेरे पास दर्जनों ख़त यह पूछते हुए आए - ‘गांधीजी के मुसलमान बनने की बाबत सही खबर क्या है ? ‘

[ जारी ]

पिछले भाग : एक , दो ,

 

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न लिखने के बहाने

September 28, 2007

 

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     परसों एक मित्र ने याद दिलाया कि कई दिनों से मैं नहीं लिख रहा हूँ । ब्लॉग का स्वरूप दैनन्दिनी जैसा होता है - पुराने जमाने में दो छोटे डण्डों के बीच कपड़े पर लिखे सन्देश की तरह,जिसे एक छोर से दूसरे छोर तक लपेटते हुए पढ़ा जाता था । इस स्वरूप की एक कमी को दूर करने के लिए मैंने सभी प्रविष्टियों की विषय सूची तीनों चिट्ठों पर डाल दी थी,चिट्ठेकारी की सालगिरह पर । विषय सूची के जरिए पाठक जिन पुरानी प्रविष्टियों को देखना चाहें पहुँच जाते हैं , चूँकि तमाम शीर्षक पर्मालिंक युक्त हैं । न लिखने के अन्तराल में खोजी इन्जनों द्वारा भेजे गए पाठकों के अलावा ‘विषय-सूची’ के जरिए रोज ३० से ६० पाठक पुरानी प्रविष्टियों पर आये।

  ’विषय-सूची’  के लाभ बता रहा हूँ , इसे लिखने के सातत्य में आई टूट के हक में दलील कत्तई न मानें । चिट्ठेकारी का दैनन्दिनी वाला स्वरूप लाइव जर्नल पर लिखने वालों में देखा जा सकता है, ( एक बेहतर नमूना ) । इनका एक पाठकवर्ग बन जाता है जो अत्यन्त निष्ठापूर्वक हर प्रविष्टी पर टिपियाता है । ये टीपें अक्सर सवाल-जवाब,चर्चा-बहस के कारण ‘परिचर्चा’ जैसी भी बन जाती हैं । डायरीनुमा चिट्ठे ज्यादातर डायरियों की तरह अप्रकाशित नहीं होते इसलिए उनकी सामग्री में निजी डायरियों से कुछ फर्क जरूर होता होगा। अपनी कमजोरियों को भी दैनंदिन लिखने वाले , उन्हें संजाल पर छापने से कुछ संकोच करते होंगे ?

    एक गैर चिट्ठेकार , बल्कि अब तक चिट्ठेकारी विरोधी रोजनामचा लेखक से मैंने आज चर्चा की । मेरे पिता । पिछले ६८ वर्षों से दैनन्दिनी लिख रहे हैं। १६ वर्ष की उम्र से अपना रोजनामचा लिखना शुरु किया । उन्होंने बताया ,’ जब कभी लिखना छूट जाता है,तब छूटे हुए अन्तराल की डायरी एक साथ लिख लेता हूँ’। आजादी मिलने के बाद दक्षिण गुजरात के एक आदिवासी गाँव में मेरी बा के साथ उन्होंने बुनियादी पाठशाला में पढ़ाना शुरु किया ।आज उन्होंने बताया ,’ तब की डायरी देख कर विस्मय होता है । उन दिनों की डायरी स्कूलमय होती थी ।’

    कुछ दिनों पूर्व मेरी बेटी उनके पास गयी थी । तब मेरी चिट्ठेकारी के बारे में उन्होंने कहा , ‘तुम्हारा पिता तत्काल-तुष्टि वाले लेखन के चक्कर में दूरगामी महत्व का लेखन और अन्य काम छोड़ रहा है ।’ बहरहाल डायरी लिखना शुरु करने के और पाँच साल पहले , यानी ११ वर्ष की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी टाइपिंग (ब्लाइन्ड फ़ोल्ड) सीख ली थी और गति भी ८०-१०० शब्द प्रति मिनट हुआ करती थी।बहुत फक्र से वे याद करते हैं कि हिटलर को लिखा गाँधी का पत्र उन्होंने टाइप किया था । सम्पूर्ण क्रान्ति विद्यालय जिसकी स्थापना उन्होंने की है के कम्प्यूटर पर मैंने ‘बाराहा’ डाल दिया और उन्हें बाराहा द्वारा गुजराती तथा हिन्दी ऑफ़लाईन टंकण के बारे में बता दिया। साढ़े तिरासी साल की उम्र में इस नयी जानकारी से वे उत्साहित थे ।

    संजाल के प्रति उन्हें आकर्षित करने लायक एक और घटना हुई । १४ सितम्बर को उन्हें गुजराती में लिखी गाँधीजी की जीवनी( મારૂ જીવન એજ મારી વાણી ) के लिए ज्ञानपीठ का मूर्तीदेवी पुरस्कार अहमदाबाद में मिला। समारोह की खबर अहमदाबाद्द से प्रकाशित दो अंग्रेजी दैनिकों में आई,गुजराती दैनिकों में सन्नाटा था । प्रमुख गुजराती दैनिक ‘दिव्य भास्कर’ के सम्पादक प्रकाश शाह स्वयं उस कार्यक्रम में मौजूद थे । गुजरात नरसंहार के बाद , ‘गुजरात की जनता तक गाँधी का सन्देश पहुँचाने में विफल रहे-इसका गुनाहगार मैं भी हूँ’ - यह मानते हुए पूरे प्रान्त में घूम कर वे गाँधी-कथा सुनाते हैं । इस पृष्टभूमि में मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश के हिन्दी अखबारों की ‘९२ के दौर में अपनायी भूमिका की याद सहज ही आई।तब मुखपृष्ट पर ‘ राम लला की मूर्ति गायब !’ आठ कॉलम के बैनर में छपी थी(’आज’ के सभी संस्करणों में)। जब इस पर प्रेस आयोग द्वारा रघुवीर सहाय की अध्यक्षता में जाँच दल भेजा गया था तब बनारस में एक जुलूस के रूप में पहुँच कर हम लोगों ने सहायजी के समक्ष गवाही दी थी। गुजराती अखबारों ने मूर्तिदेवी पुरस्कार समारोह की खबर को नजरअन्दाज भले ही किया किन्तु तरकश के साथियों ने पत्रकारीय कौशल के साथ बगैर विलम्ब रपट छापी। तरकश के जिम्मेदार साथियों को भी गुजराती अखबारों द्वारा इसे अनदेखा करना समझ में नहीं आया,हाँलाकि मुझे पूरा भरोसा है कि इस मामले में मेरे अनुमान से वे पूरी तरह असहमत होंगे। दो हजार पृष्टों की जीवनी लिखने के बावजूद पिताजी ने जनता तक पहुँचने के लिये ‘कथा’ का पुराना माध्यम चुना है। ‘संजाल’ पर लेखन के बारे में उनकी आलोचना में दम है।उनकी तीन पुस्तिकाये छापने के कारण बारडोली की सुरुचि छापशाला सरकारी तालाबन्दी का शिकार हुई थी,‘दु:शासन पर्व’ में ।इन्टरनेट पर वैसी सेन्सरशिप मुमकिन नहीं होगी ,शायद वे यह समझ सकेंगे।उन्हें तरकश की रपट दिखाई ।

    हमारे एक नेता रामइकबाल बरसी ने कहा था,‘अखबारों की सुर्खियों में आने की लालसा रखने वाले इन्क़लाब नहीं लाते ।’ इस पर हम पूरी तरह खरे नहीं उतरते , बाप उतरते हैं। लोहिया ने रामइक़बाल बरसी को ‘पीरो का गाँधी’ कहा था। आज उनका सिर्फ़ एक किस्सा ।

  रामइक़बालजी एक भूखे और बीमार व्यक्ति को ले कर थाने पहुँचे। दरोगा से कहा,’ इसे खिलाओ,इलाज कराओ’।दरोगा चकराया।बोला,’क्यों? यह थाना है।’ रामइक़बालजी ने कहा , ‘इस हल्के के नागरिकों के जान-माल की रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है ।’ इस खाँटी तेवर का असर होना ही था ।

हर लमहा ख़बरदार है अखबारनवीसी : सलीम शिवालवी

July 10, 2007

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  सलीम शिवालवी

[ 'अखबारनवीसी' पर सलीम शिवालवी की रचना का पहला भाग मेरे एक चिट्ठे पर पिछले दिनों छपा । पहले भाग पर दो प्रतिष्ठित चिट्ठेकारों - अनामदास और प्रियंकर ने पत्रकारिता के उज्जवल पक्ष की ओर इंगित करते हुए काव्य-टिप्पणियाँ दीं । सलीम की रचना का दूसरा भाग यहाँ दिया जा रहा है । यह भी , अखबारनवीसी के उज्जवल पक्ष पर प्रकाश डालता है । ]

आवाम का हथियार है अख़बार नवीसी , आइना-ए-संसार है ,अख़बारनवीसी

ऐ अहल-ए-नज़र गौर से पढ़कर तो जरा देख,एक ख़ुद-ब-ख़ुद अख़बार है,अख़बारनवीसी॥

मैदान-ए-जंग हो , के सुलगता हुआ शहर , हर मोड़ पर बेदार है अख़बारनवीसी ।

आता है इन्हें खूब ही ख़तरों से खेलना , समझो न के लाचार है अख़बारनवीसी ॥

चूके तो गये और बचे ग़र तो कामयाब , तलवार की एक धार है अख़बारनवीसी ।

जिसको सलाम करते हैं यारों बड़े-बड़े , वो मालिक-ए-मेयार है अख़बारनवीसी ॥

अफ़सोस जब से ये कई खेमों में बँट है , तब से ही कुछ बीमार है अख़बार नवीसी ।

बे-मिस्ल बहुत काम ये अन्जाम दे गयी , तारीफ़ की हक़दार है अख़बारनवीसी ।

तारीकियाँ हों , या के के उजाला हो ऐ ‘सलीम’ , हर लमहा ख़बरदार है अख़बारनवीसी ॥

- सलीम शिवालवी.

 

नाम - विचार के बहाने

June 29, 2007

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     इस विषय पर पिछली पोस्ट में तीन सुधी पाठकों की दिलचस्पी से वाकिफ़ हो कर बहुत उत्साहित हूँ । घुघूती बासूती और प्रत्यक्षा ने   बदलती हुई स्थिति में औरत के नाम और उसकी पहचान से जुड़ी कठिनाइयों पर अपने दृष्टिकोण रखे । अनामदास ने जाति - प्रथा के नामों पर प्रभाव पर अपना नजरिया रखा । अनामदास ने जिस ओर इशारा किया है उस से जुड़े कुछ मसलों पर आज चर्चा कर रहा हूँ ।

    कथित हिन्दी भाषी सूबों की बहुजन आबादी खड़ी बोली में नहीं सोचती । उन्हें सपने भी खड़ी बोली में नहीं आते । शहरी मध्य वर्ग के माता - पिता अपने बच्चों के दिमाग में जैसे अंग्रेजी ठूसने की कोशिश करते हैं ठीक वैसे ही खड़ी बोली ठूसने के प्रयास मैं अपने आस-पास देखता हूँ । इन इलाकों से मुम्बई या दिल्ली जाने वाले प्रवासी की भोजपुरी , वज्जिका या मैथिली नहीं बिगड़ती है । अलबत्ता खड़ी बोली का स्थान बम्बइय्या बोलचाल की हिन्दी या दिल्ली-हरियाणा की बोली लेती है ।

    शब्द भण्डार और व्याकरण में खड़ी बोली की तुलना में भोजपुरी , वज्जिका ,मैथिली की  ओड़िया से अधिक समानता दिखती है।        ‘ लुग्गा ओद बा ‘ भोजपुरी के इस वाक्य की निकटता ओडिया के ‘ लुगा ओदा अछि ‘ से हुई या हिन्दी में ‘ कपड़ा गीला है ‘ से ?

    नामों पर आने के पहले एक दिलचस्प तथ्य पर ध्यान आकृष्ट करा दूँ । देश के बहुत बड़े इलाके में अंग्रेजों द्वारा अपना प्रशासनिक ढाँचा थोपने के बाद पहली बार अन्य इलाकों से सवर्णों का आगमन हुआ । मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के अधिकांश सवर्णों की जड़ें इतनी ही पुरानी हैं ।

    भाषा में इस अन्तर का असर नामों पर भी पड़ता है । इस अन्तर के कारण नाम बिगड़ते ही हों ऐसा नहीं । अपने इलाके में पाये जाने वाले कुछ पसन्दीदा नामों का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ । खड़ी बोली बोलने वालों में यह नाम नहीं मिलते :

    समदेई , सुरजी , मूर्ति , मुर्ता , चिन्ता , प्यारी , लालमुनिया , जीरा , धानमुनी ,गुरुवारी , शनिचरा

    घरभरन , खुरमुल्ली , कुंभकर्ण , गट्टर ,नागे , टानी , बमबम , फागू , सोमारू , मंगलू , बुद्धू , पल्टू ,घुरहू ,कतवारू

    मन्दिरों में प्रवेश से रोके गए समाज के एक बड़े तबके ने अपने नाम के साथ ‘ राम ‘ को जोड़ कर रखा ।

    बनारस के जुलाहों में विशिष्ट नामों का चलन है । अब्दुल बिसमिल्लाह के बहुचर्चित उपन्यास ‘ झीनी - झीनी बीनी चदरिया ‘ में जो अलग ढंग के नाम आए हैं वे काल्पनिक नहीं हैं, हकीकत में हैं ।

काएदे कानून समझाने लगें हैं : दुष्यन्त कुमार सावधान !

June 16, 2007

 

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बहुत शिद्दत के सथ कल एक चिट्ठे पर ‘शीर्षक-विचार’ किया गया है । शीर्षक-विचार यानी चिट्ठों के शीर्षकों पर विचार । चिट्ठालोक जिस सानेहा से गुजरा है उससे साथी चिट्ठाकार प्रभावित है । मौजूदा कारगुजारियों से मैं भी प्रभावित हूँ । अपने चिट्ठों (प्रविष्टियों के अर्थ में ) पर विचार कर रहा था और दुष्यन्त ,भवानीप्रसाद ,सर्वेश्वर और महेश्वर की कविताएँ और गज़ल पढ़ रहा था ।

मुझे लगता है कि ‘ श्रद्धान्जलि-श्रद्धान्जलि ‘ खेल का समय आ गया है । इस खेल की चर्चा मैं ने मौजूदा किच्चाइन से बहुत पहले एक टिप्पणी में की थी।

मसलन अनूप शुक्ल या देबाशीष की याद मुझे दुष्यन्त के इस मिसरे को पढ़ते हुई आती है ,एक उम्मीद के साथ-

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या कहो

इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है

दोनों चिट्ठेकार मुझसे ज्यादा जवान और कम बूढ़े हैं । हिन्दी चिट्ठेकारी के शुरुआती युग से लिख रहे हैं इस कारण शेर में इस लफ़्ज़ का इस्तेमाल मुझे आपत्तिजनक नहीं लगता । दुष्यन्त ने जेपी को याद करते हुए कहा था जिन्हें हम बहत्तर साल का युवा मानते ही थे । उस दौर में अमृतलाल नागर ने भी ‘ नाच्यो बहुत गोपाल’ अपने प्रिय पाठक जयप्रकाश को समर्पित की थी। जेपी बीमारी के बिस्तर पर लेटे-लेटे ‘मानस का हंस’ सुनते थे।

चलो , अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें

कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा ।

घुघूति बासूति या सुनील दीपक का हँसमुख चेहरा और उनसे सम्बन्धित यादें इस शेर को पढ़ते हुए मेरी कल्पना में तिर जाती हैं ।

  पहरेदारी से बचते हुए दुष्यन्त के यह दोनों शेर शायद दरवाजे से भीतर प्रवेश कर जाँए ।

  और नारद जो कबूतर की तरह हम तक सभी चिट्ठाकारों का पैगाम पहुँचाता रहा है , उस पर लिखी पोस्ट  का शीर्षक यदि , ‘ इस कबूतर को जरा प्यार से पालो यारों ‘  या ‘ अब कोई ऐसा तरीका निकालो यारों ‘ दिया जाए तब ? अनामदास , प्रमोद कुमार , धुरविरोधी , अभय या चौपटस्वामी की चिन्तायें उक्त प्रविष्टि में व्यक्त की जा सकती हैं । खींच-तान के यह भी शायद कैडबर्रीज़ के पप्पू की तरह पास हो जाए ।

और नारद प्रतिदावे के इस हिस्से का क्या होगा , कालिए ?

नारद सिर्फ एक मशीनी, स्वचालित एकत्रक (एग्रीगेटर) है जो कि सार्वजनिक आरएसएस फ़ीड स्रोतों से पोस्ट का सारांश संकलित कर प्रस्तुत करता है. अतः चिट्ठों (ब्लॉगों) के आरंभिक पोस्टों पर आधारित फ़ीड को चयनित करने के उपरांत उनकी निगरानी संभव नहीं है. हम चिट्ठों की सामग्री के लिए उत्तरदायी नहीं हैं और न ही चिट्ठे हमारे विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

मौजूदा स्थिति फैसलों से यह हिस्सा घोर आपत्तिजनक और अप्रासंगिक हो चुका है , इसलिए दोषी करार दिया जाएगा । संशोधन के लिए शायद अमेरिकी अदालत में तो न जाना पड़े , संचालक मण्डल को ।

    धुरविरोधी के चिट्ठे पर जब जब उनसे और मुझसे स्कूल - मास्टर शैली में सवाल दागे गए तब दिमाग में आया -

‘ हमने सोचा था जवाब आएगा

एक बेहूदा सवाल आया है ।

या

इस अंधेरे में दिया रखना था ,

तू उजाले में ही बाल आया है ।

दुष्यन्त के ये मिसरे निश्चित तौर पर आपत्तिजनक माने जाते । इसमें तो बेहूदा जैसी गाली भी है !

या

वो सलीबों के करीब आए तो हमको

कायदे - कानून समझाने लगे हैं ।

अथवा उसी गजल से

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,

ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं ।

इन पर पाबन्दी की गारन्टी है । क्या अन्य फूल नहीं कुम्हलाते ?

( कुछ अन्य साथी चिट्ठाकारों के प्रति श्रद्धा - सुमन भविष्य में । चिट्ठाकारों के कौन से विचार अब आपत्तिजनक हो करार दिए जाएँगे इन पर भी , जल्द ही )

राजा की शान , उदयप्रकाश

June 13, 2007

[ २४ नवम्बर , १९८७ को   ८ से १४ मार्च , १९८१ के दिनमान में यह कविता पढ़ी । कविता के सन्दर्भ को  देश से परिवार में ( या चिट्ठा-परिवार ?? ) में सिकोड कर भी देखा जा सकता है। संग्रह : सुनो कारीगर ,रेवती कुंज , हापुड , मूल्य रुपए २० ( तब ) ]

राजा की शान

  मेमने को खा जाने के बाद

जंगल का राजा

अपनी परछाई देखता है

धूप में

और घमंड में गुर्राता है

 

उसे शानदार लगती है

अपनी चाल

अपनी कद काठी

अपने नाखून और दाँत उसे

शानदार लगते हैं ।

 

सबसे ज्यादा शानदार और

भव्य उसे लगती है

अपनी झब्बेदार पूँछ

 

अपनी पूँछ

ऊपर उठा कर

गर्व से चलता है

जंगल का राजा

 

तो उसकी

कौन से चीज खुली रह जाती है ?

- उदयप्रकाश .

पडोसी पंछी

May 29, 2007

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