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Archive for the ‘kavita’ Category

थोड़ी-सी जगह

थोड़ी सी जगह जरूरी है
किसी और के लिए
चाहे वह ईश्वर हो या फिर कोई और
थोड़ा सा भोजन उसके लिए
जो अभी नहीं आया है
लेकिन जो आ सकता है कभी भी

थोड़ा सा धैर्य – जो दुख में है
उसकी नाराजगी और क्रोध के लिए
थोड़ा सा बोझ दूसरों की विपत्ति को
बांट लेने और बचा लेने के लिए

थोड़ी सी संभावनाएं बची रहनी चाहिए
नए अविष्कारों के लिए भी
और थोड़ी सी ऊब
नए प्रश्नों के लिए
थोड़ा सा मन
नैराश्य के अंतिम क्षणों के विरुद्ध
थोड़ी सी चुप्पी और थोड़ा सा संवाद
एक संवेदनशील मन
और सुरक्षित जीवन के लिए…
- रामप्रकाश कुशवाहा
कवि का संपर्कः बी १ साईं अपार्टमेंट,टडिया,करौंदी,सुन्दरपुर, वाराणसी २२१०००५
( सामयिक वार्ता , जनवरी २०१३ से साभार। वार्षिक सदस्यता शुल्क- सौ रुपये,पांच वर्षीय ६ सौ रुपये,आजीवन २००० रुपये
मनी आर्डर से – सामयिक वार्ता,द्वारा चन्द्रशेखर मिश्र,दूसरी लाइन,इटारसी,जि होशंगाबाद,म.प्र. ४६११११ पर भेजें। varta3@gmail.com )

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भालू की आँखें तुझे देख रही हैं
तूने उसे जो पानी का सोता दिखाया था
वह ऊपर गुफा तक जाता है
भालू की आँखें कहती हैं
तुझे गुफा तक ले जाऊँ
वहाँ तू भालू को सीने से लगा सोएगी
बीच रात उठ पेड़ों से डर मेरा कंधा माँगेगी
भालू पड़ा होगा जहाँ तू सोई थी
कीट पतंगों की आवाज के बीच बोलेगी चिड़िया
तुझे प्यार करने के लिए
भालू को पुचकारुँगा
तू ले लेगी भालू को फिर देगी अपना नन्हा सीना
बहुत कोशिश कर पूछेगी
बापू भालू 
मैं सुनूँगा भालू भालू 
गाऊँगा सो जा भालू सो जा भालू 
नहीं कह पाऊँगा उस वक्त दिमाग में होगी सुधा
छत्तीसगढ़ में मजदूर औरत की बाँहों से तुझे लेती
तब तक कहता रहूँगा  सो जा भालू सो जा 
जब तक तेरी आँखों में फिर से आ जाएगा जंगल
जहाँ वह सोता है
जो ऊपर गुफा तक जाता है..........

किस डर से आया हूँ यहाँ
डरों की लड़ाई में कहाँ रहेगा हमारा डर
तेरा भविष्य बोस्निया से भागते अंतिम क्षण
हे यीशुः कितनी बार क्षमा


क्या अयोध्या में आए सभी निर्दोषों को करेगा ईश्वर मुआफ
तू क्या जाने ईश्वर बड़ा पाखंडी
वह देगा और ताकत उन्हें जो हमें डराते
भालू को थामे रख
यह पानी का सोता जंगल में बह निकल जहाँ जाता है
वहाँ पानी नहीं खून बहता है
तब चाँद नहीं दिखता भालू डर जाएगा.........

भालू को थामे रख
वह नहीं हिंदू मुसलमान
खेल और गा भालू खा ले आलू
कोई मसीहा नहीं जो भालू को बचा पाएगा
कोई नहीं माता पिता बंधुश्चसखा
इस जंगल से बाहर ...

भालू को थामे रख।

(रविवारी जनसत्ता  १९९२)
 

 

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हत्यारे ने उस औरत को मारने में दो मिनट लगाए

उस पर दो शताब्दियों तक चलता है मुकदमा

जिसने सार्वजनिक कोष से साफ़-साफ़ उड़ा लिए सैकड़ों करोड़ रुपये

उसकी सत्तर साल तक जांच करता है जांच आयोग

कोई किसी से पूछता है, क्यों यह समय इतना निरपेक्ष और किसी

अक्षम्य पाप जैसा है

जब नहीं सुनता कोई किसी की बात तो एक उपेक्षित कवि

अपने कान समूची पृथ्वी पर लगाता है

हर अँधेरे में सुलगती हैं उसकी पीड़ित आत्मा की खुफिया आँखें

अप्रासंगिकताएं क्यों हावी हैं इस कदर तमाम अच्छी और ज़रूरी चीज़ों पर

जो ठीक-ठाक हैं और जो चाहिए तमाम लोगों को

उनका विज्ञापन क्यों नहीं दिखाई देता कहीं ?

उनकी कोई कीमत क्यों नहीं बची, कुछ बताएंगे आप ?

एक छोटी-सी जेब में समा जाने वाली कंघी,

खैनी, राई, अरहर और गुड के लिए

अपने कपडे क्यों नहीं उतारतीं मधु सप्रे और अंजलि कपूर

बीडी के बण्डल का रैपर क्यों नहीं बनाते अलेक पदमसी

वो कौन हैं जिनके लिए है इतना सारा उद्योग

रात भर कई सालों से गिरती हैं आकाश से सिसकियाँ और खून

स्वप्न चुभतेहैं उसके तलवों में जो भी इस समाज से गुज़रता है

एक गरीब धोबी जो टैगोर हो सकता था

सारे शहर के कपडे धोता है आधी रात अपने आंसुओं से

एक स्त्री जोर-जोर से हंसती है अपनी ह्त्या के ठीक एक पल पहले

कोई विश्वास
होता है हर बार, जिस पर घात होता है हर बार

सबलोग यह जानते हैं पर खामोशी ही लाजिमी है

जो व्यक्त करता है यथार्थ को

वह मार दिया जाता है अफवाहों से |

(‘रात में हारमोनियम’, १९९८, वाणी प्रकाशन)

उदय प्रकाश

कवि की पीड़ित खुफिया आंखे

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तुम्हे जानना चाहिए कि हम

मिट कर फिर पैदा हो जायेंगे

हमारे गले जो घोंट दिए गए हैं

फिर से उन्हीं गीतों को गायेंगे

जिनकी भनक से

तुम्हें चक्कर आ जाता है !

तुम सोते से चौंक कर चिल्लाओगे

कौन गाता है ?

इन गीतों को तो हमने

दफना दिया था !

तुम्हें जानना चाहिए कि

लाशें दफनाई जा कर सड़ जातीं हैं

मगर गीत मिट्टी में दबाओ

तो फिर फूटते हैं

खेत में दबाये गए दाने की तरह !

- भवानीप्रसाद मिश्र .

 

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धूप का पहाड़

पहाड़ उस दिन सबेरा था रंगीला और

स्वच्छ हमारी सांझ के स्नेह की तरह

फैला हुआ क्षितिज के छोरों तक

या कहो तालाब में सफेदी भीगी

बतखों की तरह तैरता हुआ

या कहो गीला और चमकदार

धूप में बरसते मेह की तरह

 

चमकदार गगन स्पर्शी किसी देह की तरह

देख सका था मैं उसके आर पार

जैसे देख पाता हूं

धूप में बरसते मेह के आर पार

स्वच्छ अपने स्नेह के आर पार !

- भवानीप्रसाद मिश्र .

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श्यामबहादुर ‘नम्र’ आज सुबह गुजर गए | अविश्वसनीय | सम्पादक , कवि , क्रान्तिधर्मी सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में हमारे दिलों में वे हमेशा रहेंगे | अमन , अनुराग और अनुराधा बहन के कष्ट और शोक में हम सब शरीक हैं | नन्हे -से अमन को हल्की सी चपत लगा कर ‘मार खाओ’ कहने पर  वह उस जगह से ‘मार’ को अपने हाथ में लेकर मुंह में डालता और चबाकर खाने लगता – यह था श्यामबहादुर भाई द्वारा घुट्टी में हिंसा की अप्रासंगिकता पिलाना , सिखाना |उनकी स्मृति को प्रणाम | उनकी तीन कवितायें जिन्हें पहले भी प्रकाशित किया था |

1

हमे नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार,
जो गैर-जरूरी बातें जबरन सिखाये ।
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये,

हमें नहीं चाहिए ऐसा स्कूल
जहाँ जाकर जीवन के हुनर जाँए भूल।
हमें नहीं चाहिए ऐसी किताब
जिसमें न मिलें हमारे सवालों के जवाब

हम क्यों पढ़ें वह गणित,
जो न कर सके जिन्दगी का सही-सही हिसाब।
क्यों पढ़ें पर्यावरण के ऐसे पाठ
जो आँगन के सूखते वृक्ष का इलाज न बताये॥
गाँव में फैले मलेरिया को न रोक पायें
क्यों पढ़ें ऐसा विज्ञान,
जो शान्त न कर सके हमारी जिज्ञासा ।
जीवन  में जो समझ में न आये,

क्यों पढ़ें वह भाषा ।
हम क्यों पढे़ वह इतिहास जो धार्मिक उन्माद बढ़ाए
नफ़रत का बीज बोकर,
आपसी भाई-चारा घटाये।

हम क्यों पढ़ें ऐसी पढ़ाई जो कब कैसे काम आएगी,
न जाए बताई ।
परीक्षा के बाद, न रहे याद,
हुनर से काट कर जवानी कर दे बरबाद ।

हमे चाहिए शिक्षा का अधिकार,
हमे चाहिए सीखने के अवसर
हमे चाहिए किताबें ,
हमें चाहिए स्कूल।
लेकिन जो हमें चाहिए हमसे पूछ कर दीजिए।
उनसे पूछ कर नहीं जो हमें कच्चा माल समझते हैं ।
स्कूल की मशीन में ठोक-पीटकर
व्यवस्था के पुर्जे में बदलते हैं,

हमें नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार जो
गैर जरूरी बातें जबरन सिखाये
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये ।

-श्याम बहादुर ’ नम्र ’

2

एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है
वह लकडियां बटोरकर घर लाती है
फिर मां के साथ भात पकाती है
एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है
शाम को थकी मांदी घर आती है
वह स्कूल से मिला होमवर्क मां-बाप से करवाती है
बोझ किताब का हो या लकडी का
बच्चियां ढोती हैं
लेकिन लकडी से चूल्हा जलेगा
तब पेट भरेगा
लकडी लाने वाली बच्ची यह जानती है
वह लकडी की उपयोगिता पहचानती है
किताब की बातें कब किस काम आती हैं
स्कूल जाने वाली बच्ची
बिना समझे रट जाती है
लकडी बटोरना
बकरी चराना
और मां के साथ भात पकाना
जो सचमुच घरेलू काम हैं
होमवर्क नहीं कहे जाते
लेकिन स्कूलों से मिले पाठों के अभ्यास
भले ही घरेलू काम न हों
होमवर्क कहलाते हैं
कब होगा
जब किताबें
सचमुच
होमवर्क से जुडेंगी
और लकडी बटोरने वाली बच्चियां भी
ऐसी किताबें पढेंगी

श्याम बहादुर “नम्र”

3.


तुम तरुण हो या नहीं

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

 

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

 

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

 

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

 

इससे ही फैसला होगा -

 

कि तुम तरुण हो या नहीं -

 

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

 

 

तरुणाई का रिश्ता उम्र से नहीं, हिम्मत से है,

 

आजादी के लिए बहाये गये खून की कीमत से है ,

 

जो न्याय-युद्ध में अधिक से अधिक बलिदान करेंगे,

 

आखिरी साँस तक संघर्ष में ठहरेंगे ,

 

वे सौ साल के बू्ढ़े हों या दस साल के बच्चे -

 

सब जवान हैं ।

 

और सौ से दस के बीच के वे तमाम लोग ,

 

जो अपने लक्ष्य से अनजान हैं ,

 

जिनका मांस नोच – नोच कर

 

खा रहे सत्ता के शोषक गिद्ध ,

 

फिर भी चुप सहते हैं, वो हैं वृद्ध ।

 

 

 

ऐसे वृद्धों का चूसा हुआ खून

 

सत्ता की ताकत बढ़ाता है ,

 

और सड़कों पर बहा युवा-लहू

 

रंग लाता है , हमें मुक्ति का रास्ता दिखाता है ।

 

 

 

इसलिए फैसला कर लो

 

कि तुम्हारा खून सत्ता के शोषकों के पीने के लिए है,

 

या आजादी की खुली हवा में,

 

नई पीढ़ी के जीने के लिए है ।

 

तुम्हारा यह फैसला बतायेगा

 

कि तुम वृद्ध हो या जवान हो,

 

चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक निकम्मे हो

 

या बर्बर अत्याचारों की जड़

 

उखाड़ देने वाले तूफान हो ।

 

 

 

इसलिए फैसले में देर मत करो,

 

चाहो तो तरुणाई का अमृत पी कर जीयो ,

 

या वृद्ध बन कर मरो ।

 

 

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

 

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

 

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

 

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

 

इससे ही फैसला होगा -

 

कि तुम तरुण हो या नहीं -

 

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

 

 

- श्याम बहादुर नम्र

 


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यह तो कुमार विकल को भी ठीक ठीक नहीं पता था

कि वह पीता क्यों था

हम नाहक़ दोस्तों को कोसते रहे

पीने के वजहें सबसे अधिक तब मिलती हैं

जब पास कोई न हो

अनजान किसी ग्रह से वायलिन की आवाज़ आती है

आँखों में छलकने लगता है जाम

उदास कविताएँ लिखी जाती हैं

जिन्हें बाद में सजा धजा हम भेज देते हैं

पत्रिकाओं में

कोई नहीं जान पाता

कि शब्दों ने मुखौटे पहने होते हैं

मुखौटों के अंदर

रो रहे होते हैं शब्द ईसा की तरह

सारी दुनिया की यातनाएँ समेटे।

लिख डालो, लिख डालो

बहुत देर तक अकेलापन नहीं मिलेगा

नहीं मिलेगी बहुत देर तक व्यथा

जल्दी उंडेलो सारी कल्पनाएँ, सारी यादें

टीस की दो बूँदें सही, टपकने दो इस संकरी नली से

लिख डालो, लिख डालो।

बहुत देर तक बादल बादल न होंगे

नहीं सुनेगी सरसराहट हवा में बहुत देर तक

जल्दी बहो, निचोड़ लो सभी व्यथाएँ, सभी आहें

अभ्यास ही सही, झरने दो जो भी झरता स्मृति से

लिख डालो, लिख डालो।

लाल्टू

[ कवि-मित्र लाल्टू के जन्म दिन पर उन्हीकी कविता सप्रेम पेश ]

लाल्टू की कुछ और कवितायें :  वह प्यार

लाल्टू से सुनो  ,  

लाल्टू की अभिव्यक्ति

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तुम तरुण हो या नहीं

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

इससे ही फैसला होगा -

कि तुम तरुण हो या नहीं -

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

तरुणाई का रिश्ता उम्र से नहीं, हिम्मत से है,

आजादी के लिए बहाये गये खून की कीमत से है ,

जो न्याय-युद्ध में अधिक से अधिक बलिदान करेंगे,

आखिरी साँस तक संघर्ष में ठहरेंगे ,

वे सौ साल के बू्ढ़े हों या दस साल के बच्चे -

सब जवान हैं ।

और सौ से दस के बीच के वे तमाम लोग ,

जो अपने लक्ष्य से अनजान हैं ,

जिनका मांस नोच – नोच कर

खा रहे सत्ता के शोषक गिद्ध ,

फिर भी चुप सहते हैं, वो हैं वृद्ध ।

 

ऐसे वृद्धों का चूसा हुआ खून

सत्ता की ताकत बढ़ाता है ,

और सड़कों पर बहा युवा-लहू

रंग लाता है , हमें मुक्ति का रास्ता दिखाता है ।

 

इसलिए फैसला कर लो

कि तुम्हारा खून सत्ता के शोषकों के पीने के लिए है,

या आजादी की खुली हवा में,

नई पीढ़ी के जीने के लिए है ।

तुम्हारा यह फैसला बतायेगा

कि तुम वृद्ध हो या जवान हो,

चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक निकम्मे हो

या बर्बर अत्याचारों की जड़

उखाड़ देने वाले तूफान हो ।

 

इसलिए फैसले में देर मत करो,

चाहो तो तरुणाई का अमृत पी कर जीयो ,

या वृद्ध बन कर मरो ।

 

तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,

जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।

तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,

सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?

इससे ही फैसला होगा -

कि तुम तरुण हो या नहीं -

जनता के साथ हो या और कहीं ।

 

- श्याम बहादुर नम्र

अंकुर फार्म , जमुड़ी , अनूपपुर , मप्र – ४८४२२४

namrajee@gmail.com

 

 

 

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कोहरा/ विनायक सेन

कल शाम से गहरा गया है कोहरा,

कमरे से बाहर निकलते ही गायब हो गया मेरा वजूद,

सिर्फ एक जोड़ी आँखें रह गयी अनिश्चितता को आंकती हुई,

अन्दर बाहर मेरे कोहरा ही कोहरा है,

एक सफ़ेद तिलिस्म है है मेरे और दुनिया के बीच,

लेकिन मेरे अन्दर का कोहरा कहीं गहरा है इस मौसमी धुंध से

मैं सड़क पर घुमते हुए नहीं देख पा रहा कोहरे के उस पार

मेरे-तुम्हारे इस देश का भविष्य

मेरा देश कुछ टुकड़े ज़मीन का नहीं हैं जिसे लेकर

अपार क्रोध से भर जाऊं मैं और कर डालूँ खून उन सभी आवाजों का

जो मेरी पोशाक पर धब्बे दिखाने के लिए उठी हैं,

मेरा देश उन करोड़ों लोगों से बना है,

जिनकी नियति मुझ से अलग नहीं है,

जो आज फुटपाथ पर चलते-फिरते रोबोट हैं,

जो आज धनाधिपतियों के हाथ गिरवी रखे जा चुके हैं,

जो आज सत्ता के गलियारों में कालीन बनकर बिछे हैं,

जो आज जात और धर्म के बक्सों में पैक तैयार माल है जिन्हें बाजार भाव में बेचकर

भाग्य विधाता कमाते हैं ‘पुण्य’ और ‘लक्ष्मी’,

घने कोहरे के पार कुछ नहीं दिखाई देता मुझे,

शायद देखना चाहता भी नहीं मैं,

वह भयानक घिनौना यंत्रणापूर्ण दृश्य जो कोहरे के उस पार है,

वहाँ हर एक आदमी-औरत एक ज़िंदा लाश है,

वहाँ हर एक सच प्रहसन है

वहाँ हर एक सच राष्ट्रद्रोह है,

वहाँ हर उठी उंगली काट कर बनी मालाओं से खेलते हैं

राहुल -बाबा-नुमा बाल-गोपाल-अंगुलिमाल,

और समूचा सत्ता-प्रतिसत्ता परिवार खिलखिला उठता है,

इस अद्भुत बाल-लीला पर,

इस घने कोहरे से सिहर उठा हूँ मैं,

और कंपकंपी मेरी हड्डियों तक जा पहुँची है,

आज सुबह मैंने आईने में चेहरा देखा

तो सामने सलाखों में आप नज़र आये

विनायक सेन……

- इकबाल अभिमन्यु

*तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन*

जब तुम एक बच्चे को दवा पिला रहे थे

तब वे गुलछर्रे उड़ा रहे थे

जब तुम मरीज की नब्ज टटोल रहे थे

वे तिजोरियां खोल रहे थे

जब तुम गरीब आदमी को ढांढस बंधा रहे थे

वे गरीबों को उजाड़ने की

नई योजनाएं बना रहे थे

जब तुम जुल्म के खिलाफ आवाज उठा रहे थे

वे संविधान में सेंध लगा रहे थे

वे देशभक्त हैं

क्योंकि वे व्यवस्था के हथियारों से लैस हैं

और तुम देशद्रोही करार दिए गए

जिन्होंने उन्नीस सौ चौरासी किया

और जिन्होंने उसे गुजरात में दोहराया

जिन्होंने भोपाल गैस कांड किया

और जो लाखों टन अनाज

गोदामों में सड़ाते रहे

उनका कुछ नहीं बिगड़ा

और तुम गुनहगार ठहरा दिए गए

लेकिन उदास मत हो

तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन

तुम हो हमारे आंग सान सू की

हमारे लिउ श्याओबो

तुम्हारी जय हो।

-राजेंद्र राजन



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गंगा मस्जिद

यह बचपन की बात है, पटना की।

गंगा किनारे वाली ‘गंगा मस्जिद’ की मीनार पर,

खड़े होकर घंटों गंगा को देखा करता था।

गंगा छेड़ते हुए मस्जिद को लात मारती,

कहती, “अबे मुसलमान, कभी मेरे पानी से नहा भी लिया कर”।

और कह कर बहुत तेज़ भागती दूसरी ओर हँसती हँसती।

मस्जिद भी उसे दूसरी छोर तक रगेदती हँसती हँसती।

परिन्दे ख़ूब कलरव करते।

इस हड़बोम में मुअज़्ज़िन की दोपहर की नीन्द टूटती,

और झट से मस्जिद किनारे आ लगती।

गंगा सट से बंगाल की ओर बढ़ जाती।

परिन्दे मुअज़्ज़िन पर मुँह दाब के हँसने लगते।

मीनार से बाल्टी लटका,

मुअज़्ज़िन खींचता रस्सी से गंगा जल।

वुज़ू करता।

आज़ान देता।

लोग भी आते,

खींचते गंगा जल,

वुज़ू करते, नमाज़ पढ़ते,

और चले जाते।

आज अट्ठारह साल बाद,

मैं फिर खड़ा हूँ उसी मीनार पर।

गंगा सहला रही है मस्जिद को आहिस्ते आहिस्ते।

सरकार ने अब वुज़ू के लिए

साफ़ पानी की सप्लाई करवा दी है।

मुअज़्ज़िन की दोपहर,

अब करवटों में गुज़रती है।

गंगा चूम चूम कर भीगो रही है मस्जिद को,

मस्जिद मुँह मोड़े चुपचाप खड़ी है।

गंगा मुझे देखती है,

और मैं गंगा को।

मस्जिद किसी और तरफ़ देख रही है।

- फ़रीद ख़ान

………………………………………06/12/2010

*मुअज़्ज़िन – आज़ान देने वाला।

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