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Archive for the ‘dushyant’ Category

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फिर धीरे-धीरे यहाँ का मौसम बदलने लगा है ,

वातावरण सो रहा था अब आँख मलने लगा है ।

पिछले सफ़र की न पूछो , टूटा हुआ एक रथ है ,

जो रुक गया था कहीं पर , फिर साथ चलने लगा है ।

हमको पता भी नहीं था , वो आग ठंडी पड़ी थी ,

जिस आग पर आज पानी सहसा उबलने लगा है ।

जो आदमी मर चुके थे , मौजूद हैं इस सभा में ,

हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है ।

ये घोषणा हो चुकी है , मेला लगेगा यहाँ पर ,

हर आदमी घर पहुँचकर , कपड़े बदलने लगा है ।

बातें बहुत हो रही हैं,मेरे-तुम्हारे विषय में ,

जो रास्ते में खड़ा था पर्वत पिघलने लगा है ।

- दुष्यन्त कुमार ( साभार:’ साये में धूप ‘ )

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[ पचखा ऐसी अशुभ और मनहूस अवधि होती है कि उसमें मट्टी  (लाश) फूँकना भी अशुभ होता है । कल गंगा दशहरा का नहान था । जो लोग कल  सन्तोष के घर, उसके भभुआ के करीब के गाँव से आए थे उन्होंने पचखा ( शायद भद्रलोक ’भद्रा’ कहते हैं ?) के कारण गंगा स्नान नहीं किया ।

    बौद्ध धर्म के प्रकाण्ड विद्वान जगन्नाथ उपाध्याय की अन्तिम क्रिया के समय कुछ ऐसा 'वक्त' रहा होगा। उनके ब्राह्मण रिश्तेदारों ने पचखा के कारण अन्तिम क्रिया रोक दी थी । जगन्नाथ उपाध्याय के अपने तो जापानी बौद्ध-प्रार्थना 'नम हो रेंग्ये क्यो' का जाप कर रहे थे।उनकी एक भतीजी रीना ने मेरी पत्नी से कहा कि ,'देखिये आजीवन ब्राह्मणवाद और कर्मकाण्ड का विरोध करने वाले के साथ यह लोग क्या कर रहे हैं?'

     बसपा के उद्भव के काफ़ी पहले जगन्नाथ उपाध्याय , कृष्णकान्त और रमेश तिवारी जैसे कुछ

समतावादी विद्वानों ने बौद्ध दीक्षा ग्रहण की थी ।

  तो , पचखा के माएने का कुछ अन्दाज इन दो प्रसंगों से लग गया होगा । आज का दिन देश के इतिहास में १९ महीने के पचखा-योग की अँग्रेजी तारीख है ।

  चिट्ठाकार राहुल के चिट्ठे पर रोक लगाने के बाद से नारद भी पचखा - योग से गुजर रहा है। इस 'खर-योग' में भवानीप्रसाद मिश्र , बाबा नागार्जुन , दुष्यन्त कुमार जैसे कवियों की रचनाएँ मन्त्र के रूप में पढ़ने पर, गुनने पर दुष्प्रभावों से लड़ने की ताकत मिलती है । आज दुष्यन्त कुमार के अत्यन्त लोकप्रिय गज़ल-संग्रह 'साये में धूप' से चन्द गज़लें प्रस्तुत कर रहा हूँ। ]

१.

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,

इस परकटे परिन्दे की कोशिश तो तो देखिए ।

 

गूँगे निकल पड़े हैं जुबाँ की तलाश में ,

सरकार के ख़िलाफ़ ये साजिश तो देखिए ।

 

बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन ,

सूखा मचा रही ये बारिश तो देखिए ।

 

उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,

चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए ।

 

जिसने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ ,

इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए ।

 

२.

तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं ।

 

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,

मैं इन नज़ारों का अन्धा तमाशबीन नहीं ।

 

तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह ,

तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं ।

 

तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जायें ,

अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं ।

 

तुझे क़सम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,

तू इस मशीन का पुर्जा है , तू मशीन नहीं ।

 

बहुत मशहूर हैं आयें जरूर आप यहाँ ,

ये मुल्क देखने के लायक तो है ,हसीन नहीं ।

 

ज़रा-सा तौर-तरीकों में हेर-फेर करो ,

तुम्हारे हाथ में कालर हो , आस्तीन नहीं ।

 

३.

हालाते जिस्म , सूरते जाँ और भी ख़राब ,

चारों तरफ़ ख़राब, यहाँ और भी ख़राब ।

 

नज़रों में आ रहे हैं नजारे बहुत बुरे ,

होंठों में आ रही है ज़ुबाँ और भी ख़राब ।

 

पाबंद हो रही है रवायत से रोशनी ,

चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब ।

 

मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गई ,

पहले से हो गया है जहाँ और भी ख़राब ।

 

रौशन हुए चिराग़ तो आँखें नहीं रहीं ,

अँधों को रोशनी का गुमाँ और भी ख़राब ।

 

आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम ,

राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब ।

 

सोचा था उनके देश में मँहगी है ज़िन्दगी ,

पर ज़िन्दगी का भाव वहाँ और भी ख़राब ।

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