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Archive for अगस्त 3rd, 2012

मित्र गोपाल राठी ने सूचित किया है की आज मैथिलीशरण गुप्त की जन्म तिथि है । अपने नाना के संग्रह से उनकी लिखी एक छोटी सी पुस्तिका लाया हूं – ‘भूमि-भाग ‘। विनोबा के भूदान के दौर में लिखी गई कविताओं का संग्रह है ।

एक खेत

रहते हम यों जीवित-मृत क्यों ? ज्यों मरघट के भूत-प्रेत ,

कहीं हमारा भी होता हां ! छोटा-मोटा एक खेत ,

बैल न होते , हम तो होते ,

श्रम-जल सींच जोतते बोते ,

उगते आशा के-से अंकुर रहता फिर क्यों रक्त श्वेत ?

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

बांध मचान रखाते गाते  ,

हम कितना आनंद मनाते ,

जग में हरा खेत हैं जिनका भरा उन्हींका है निकेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

आती फिर गोमाता मोटी ,

बच्चे खाते  माखन – रोटी ,

देती उन्हें गर्व से गृहिणी घर के तिल गुड़ के समेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

क्या-क्या फूल फूलते-फलते ,

रंहट और रंहटे सब चलते ,

मोती बरसाती तब मिट्टी मणि-कणिकाएं धुल रेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

स्वप्न देखते हैं हम झूठे ,

देश काल दोनों हैं रूठे ,

दुर्लभ हुई धुल भी हमको , व्यर्थ कल्पना , चित्त ,चेत ।

कहीं हमारा भी होता यदि छोटा-मोटा एक खेत !

- मैथिलीशरण गुप्त

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