तुम्हे जानना चाहिए कि हम
मिट कर फिर पैदा हो जायेंगे
हमारे गले जो घोंट दिए गए हैं
फिर से उन्हीं गीतों को गायेंगे
जिनकी भनक से
तुम्हें चक्कर आ जाता है !
तुम सोते से चौंक कर चिल्लाओगे
कौन गाता है ?
इन गीतों को तो हमने
दफना दिया था !
तुम्हें जानना चाहिए कि
लाशें दफनाई जा कर सड़ जातीं हैं
मगर गीत मिट्टी में दबाओ
तो फिर फूटते हैं
खेत में दबाये गए दाने की तरह !
- भवानीप्रसाद मिश्र .


वे सचमुच कविताओं और गीतों की फसल उगा गए .
‘मन्ना’ को पढना सदैव सुखद और प्रेरक होता है। जब-जब यह कविता पढता हूँ, खुद को हर बार अधिक ताकतवर पाता हूँ।
क्या यह कविता आपातकाल में लिखी गयी है और त्रिकाल संध्या से ली गयी है?
बहुत अच्छी है.
सुनील