धूप का पहाड़
पहाड़ उस दिन सबेरा था रंगीला और
स्वच्छ हमारी सांझ के स्नेह की तरह
फैला हुआ क्षितिज के छोरों तक
या कहो तालाब में सफेदी भीगी
बतखों की तरह तैरता हुआ
या कहो गीला और चमकदार
धूप में बरसते मेह की तरह
चमकदार गगन स्पर्शी किसी देह की तरह
देख सका था मैं उसके आर पार
जैसे देख पाता हूं
धूप में बरसते मेह के आर पार
स्वच्छ अपने स्नेह के आर पार !
- भवानीप्रसाद मिश्र .

