इन दिनों बिहार में एक विवाद छिड़ा हुआ है। इसे मोतीहारी बनाम गया, नीतीश बनाम सिब्बल या राज्य बनाम केन्द्र का झगड़ा कहा जा सकता है। वर्ष 2009 में संसद में एक कानून पास करके देश के 12 प्रांतांे में एक-एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलने का फैसला लिया गया था। इससे गोवा को छोड़कर देश के हर प्रांत में कम से कम एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय हो जाएगा। किंतु बिहार का केन्द्रीय विश्वविद्यालय कहां हो, इस पर मामला फंस गया है। नीतीश सरकार चाहती है कि यह मोतीहारी में हो, जिससे इस पिछड़े इलाके के विकास में मदद मिलेगी। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल इसे गया में खोलना चाहते है। उनकी दलील है कि मोतीहारी बहुत अंदर है और मुख्य रेलमार्ग व हवाई मार्ग से कटा है, इसलिए वहां केन्द्रीय विश्वविद्यालय ठीक से चल नहीं पाएगा। अच्छे प्रोफेसर भी वहां नहीं जाना चाहेंगे।
अब यह विवाद दो सरकारों से नीचे चलकर जनता के बीच पहंुच गया है। केन्द्रीय विश्वविद्यालय अपने यहां खोलने की मांग को लेकर दोनों जगह कई नेता और संगठन मैदान में आ गए है। हड़तालों, बंद आदि का आयोजन हो रहा है।
सवाल यह है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय को लेकर लोग इतने लालायित क्यों है ? दरअसल बिहार के स्थानीय विश्वविद्यालयों और काॅलेजों की हालत इतनी खराब है कि पढ़े-लिखे लोगों को लगता है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय आने से शिक्षा का स्तर सुधरेगा। केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पैसा भी खूब आता है और सुविधाओं की कमी नहीं होगी। इससे स्थानीय युवाओं को अपने इलाके में अच्छी स्तरीय शिक्षा के अवसर उपलब्ध हो सकेंगे। उन्हें दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद आदि जगहों पर नहीं जाना पड़ेगा।
किंतु स्थानीय लोगों की यह उम्मीद शायद पूरी नहीं होने वाली है। इस मामले में मध्यप्रदेश में सागर का अनुभव गौरतलब है। सागर का डाॅ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय एक बहुत पुराना और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय रहा है, किंतु इधर के सालों में इसकी हालत काफी बिगड़ी है। इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने की बात काफी समय से चल रही थी। सागरवासियों ने आंदोलन भी किए। आखिरकार तीन साल पहले केन्द्र सरकार ने इसे अपने हाथ में ले लिया। किंतु अगले साल ही सागर के नौजवानों को झटका लगा, जब उसमें उनके दाखिले बंद हो गए। केन्द्रीय विश्वविद्यालय होने से इसमें प्रवेश के लिए अखिल भारतीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा होने लगी और स्थानीय विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम हो गई। इस तरह केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने से उसके दरवाजे सागरवासियों के लिए बंद हो गए। उनके लिए अब वह एक सजावट और प्रदर्शन की वस्तु जरूर हो गई।
यही हाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय आने पर मोतीहारी या गया में होने वाला है। अच्छी उच्च शिक्षा हासिल करने की इच्छा रखने वाले ज्यादातर स्थानीय विद्यार्थियों केा इसमें जगह नहीं मिलेगी। उन्हें बिहार के अन्य 15 विश्वविद्यालयों तथा उनसे जुड़े हजारों काॅलेजों मे ही शिक्षा हासिल करना पडेगा, जहां साधनों और शिक्षकों का काफी अभाव है, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है तथा शिक्षा का स्तर बहुत बिगड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि नीतीश कुमार केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लिए तो एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैे और नालन्दा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय को अपने लिए एक तमगे के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहे है किंतु उन्होनें प्रदेश की उच्च शिक्षा को सुधारने की कोई विशेष पहल अभी तक नहीं की है। बिहार के 90 फीसदी विद्यार्थी तो इसी सड़ी-गली, उपेक्षित उच्च शिक्षा में कंुठित-हैरान होने के लिए अभिशप्त रहेंगे।
जो बात बिहार के बारे में सही है, वही देश के स्तर पर भी सही है। पूरे देश में इस वक्त करीब 504 विश्वविद्यालय है जिनमें मात्र 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं तथा केन्द्रीय कानून के तहत बने, आईआईटी, आईआईएम जैसे 33 राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान हंै। इनके लिए संसाधनों की कमी नहीं है और ये देश के लाड़ले संस्थान हैं। करीब 130 डीम्ड विश्वविद्यालय हैं। 53 प्रांतीय निजी विश्वविद्यालय हैं और प्रांतीय कानूनों से बने 5 उच्च शिक्षा संस्थान हैं जो डिग्री देते हैं। किंतु सबसे बड़ी संख्या 243 प्रांतीय विश्वविद्यालयों की हैं। देश के 26,000 काॅलेजो में से ज्यादातर इन्हीं से जुड़े हैं। देश में उच्च शिक्षा के 70 से 80 फीसदी विद्यार्थी इन्हीं में अध्ययन कर रहैं हैं। किंतु वे ही सबसे ज्यादा उपेक्षित, वंचित, साधनहीन और बुरी हालत में हैं।
भारत के उपराष्ट्रपति श्री मो. हमीद अंसारी ने दिसंबर 2010 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस का व्याख्यान देते हुए देश का ध्यान इसी ओर खींचने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अक्सर प्रांत के एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय का बजट उस प्रांत के अन्य सारे विश्वविद्यालयों के कुल संयुक्त बजट के बराबर या उससे भी ज्यादा होता हैं। कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति श्री सुरंजन दास ने मार्च 2012 में एक भाषण में फिर शिकायत की कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रांतीय विश्वविद्यालयों के साथ सौतेला बरताव करता हैं। यूजीसी का 60 प्रतिशत बजट थोड़े से केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को दे दिया जाता हैं। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी कम होते है किंतु उनका बजट प्रांतीय विश्वविद्यालयों से कई गुना होता है। प्रति विद्यार्थी बजट का हिसाब लगाएं तो यह गैरबराबरी और बढ़ जाती है।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के मध्यावाधि मूल्यांकन में भी यह स्वीकार किया गया कि कलकत्ता, मुंबई, पूणे, चैन्नई जैसे पुराने व प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भी साधनों की कमी से जूझ रहे है, क्योंकि वे केन्द्रीय विश्वविद्यालय नहीं है।
दसअसल यह विसंगति भारत के संघीय ढांचे में एक बुनियादी असंतुलन के कारण पैदा होती है। इस ढांचे में करो तथा राजस्व के काफी स्त्रोत केन्द्र सरकार के पास है। इसीलिए राज्य सरकारों को हर काम के लिए केन्द्र सरकार का मुंह देखना पउता है और केन्द्र सरकार अवसर बंदरबांट करती है। केन्द्रीय मदद के साथ कई बार शर्ते भी लगाई जाती है। भारत में वैश्वीकरण प्रेरित सुधारों को प्रांतीय सरकारों पर इसी तरीके से लादा गया है।
पहले शिक्षा पूरी तरह राज्य सरकार का विषय था। फिर आपातकाल के दौरान 1976 में एक संविधान संशोधन के जरिये इसे समवर्ती सूची में डाला गया। तब से शिक्षा में केन्द्र का हस्तक्षेप व नियंत्रण बढ़ता गया है और शिक्षा में लाड़ले-सोतले का भेद बढ़ता जा रहा है।
भारत के नए मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल शिक्षा में इस गैरबराबरी और भेदभाव को कम करने के बजाय बढ़ाते जाना चाहते हंै। देश के सारे विश्वविद्यालयों को बराबर और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने का उपाय करने के बजाय वे हर प्रांत को एक-दो केन्द्रीय विश्वविद्यालय या कोई राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान का लाॅलीपाॅप पकड़ाना चाहते है। खबर यह भी है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना में देश के 374 पिछड़े जिलों में एक-एक विशेष काॅलेज खोले जाएंगे, जिन्हें काफी संसाधन दिए जाएंगे और आधा खर्च केन्द्र सरकार उठाएगी। किंतु इसका मतलब यह भी होगा कि बाकी काॅलेज और विश्वविद्यालय और ज्यादा उपेक्षित-वंचित हो जाएंगे। इन लाॅलीपाॅपों से सम्मोहित नेता, बुद्धिजीवी वर्ग और समाज का जागरूक-वाचाल तबका उनको भूल जाएगा। स्कूली शिक्षा में भी माॅडल स्कूल, नवोदय विद्यालय, कस्तूरबा विद्यालय, केन्द्रीय विद्यालय आदि की यही भूमिका रही।
वैश्विक पूंजीवाद के नए दौर की यह खासियत है कि ‘‘कल्याणकारी राज्य’’ की अवधारणा केा पूरी तरह दरकिनार करके यह शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आदि बुनियादी सुविधाओं को भी मुट्ठी भर लोगो तक सीमित करना चाहता है। नीतिष कुमार और कपिल सिब्बल वैसे चाहे विरोधी दिखाई दें, इस मामले में वे एक मालूम पड़ते है। बहुसंख्यक विद्यार्थियों की षिक्षा पर दोनों का ध्यान नहीं है और वह उनकी प्राथमिकता में नहीं है।


शिक्षा व्यवस्था और केंद्रीय विश्व विद्यालय की परिपाटी का बेहतरीन विश्लेषण करती पोस्ट
नीतीश कुमार शिक्षा के परम शत्रु हैं… … इसके नमूनों की कमी नहीं होगी… … बस उनके लुभावने भाषण से बचते हुए रहा जा सका तब…
मैंने भी शिक्षा संबंधी कुछ योजनाओं पर लिखा था कुछ महीने पहले। नीतीश के आने के बाद फीस फीसदियों के बढे हैं… मुझे याद है कि जिसकी फीस 2000-2500 रुपए थी 2005 में, आज 16- 18- 20000 पहुँच गई है।
जब तक शिक्षा को आर्थिक लाभ देने वाला व्यवसाय समझा जायेगा ये संघर्ष चलता रहेगा।
एक सारण जिले का उदाहरण देता हूँ राजापट्टी (एक स्टेशन है) से चलकर सीधे एक दूसरे स्टेशन(सोनपुर) तक की दूरी 80 किमी से ज्यादा है… और सारण जिले में पढने के लिए स्नातकोत्तर स्तर के हाथ की अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले 2-4 महाविद्यालय हैं, स्नातक को तो छोड़ ही दें तो बेहतर।
uchcha-shiksha ki soorate-haal per yeh behad santulit rapat rahi….Shiksha ka mudda hamari bouddhik charcha ka pramukh vishay bana rahe toh bahut kuchh sambhav hai…sarkaren nahin sochteen …log sochte hain…!
इस मामले में लोहिया की बात ही मानी जानी चाहिए – सारे निजी स्कूल फौरन बन्द कर दिए जाने चाहिए।