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Archive for अप्रैल, 2012

चेन्नई सम्मेलन – दृष्टि, कार्यक्रम और अपेक्षाएं

(पहला प्रारूप)

(30 जून-01 जुलाई 2012)

पृष्ठभूमि

अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच एवं समान स्कूल व्यवस्था के लिए राज्य मंच, तमिलनाडु (स्टेट प्लेटफ़ार्म फ़ॉर कॉमन स्कूल सिस्टम, तमिलनाड़ु) के संयुक्त तत्वावधान में 30 जून-01 जुलाई 2012 को चेन्नई में ‘शिक्षा का बाजारीकरण खत्म करने और समान स्कूल व्यवस्था का निर्माण करने के लिए अखिल भारत सम्मेलन‘ का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन समकालीन भारत के एक खास ऐतिहासिक क्षण पर किया जा रहा है। यह वह ऐतिहासिक क्षण है जब सन् 1991 की वैष्वीकरण की घोषणा के 20 साल बीतने पर और कई मोर्चों पर लगातार संघर्ष के तजुर्बों      से आम जनता को साफ हो गया है कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान आज़ाद भारत का जो सपना देखा गया था उसे भारत का शासक वर्ग ताक पर रखने और उन सपनों के मुताबिक जो संविधान तैयार हुआ था, उसे नजरंदाज़ करने का फैसला कर चुका है। आज देश का हर संसाधन – जल, जंगल, जमीन, जीविका, जैव-विविधता, ज्ञान, उत्पादन, भाषा, कौशल, शिक्षा, सेहत और सांस्कृतिक विरासत – वैश्विक बाजार में बिकाऊ माल बन चुका है। जनता देख रही है कि ऐसा अपने-आप नहीं हुआ है। इसके लिए शासक वर्ग ने कारपोरेट पूंजी के हित में तमाम नीतियां बनाईं, बजट व कानून पारित करवाए, समर्थक ढांचे खड़े किए और जरूरत पड़ने पर जनता के बढ़ते हुए प्रतिरोध को दबाने के लिए गैर-लोकतांत्रिक ढंग से मीडिया, पुलिस व देशभक्त फौज का भी इस्तेमाल किया। इस दौरान हर जनपक्षी और देशप्रेमी सुझाव को ठुकराया गया।

यही कहानी शिक्षा की भी रही है। आज शिक्षा की नीतियों का निर्माण और व्यवस्था को पूरी तौर पर कारपोरेट पूंजी और दुनिया को बाजार के हवाले किया जा चुका था। सरकार शिक्षा के प्रति अपनी संवैधानिक जवाबदेही से बरी होने के लिए इसे तेजी के साथ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, निजी कारोबार व एन.जी.ओ. को सौंप रही है। जिस शिक्षा को संविधान में लोकतांत्रिक, समतामूलक, न्यायशील, धर्मनिरपेक्ष और प्रबुद्ध भारत के निर्माण के जरिए के रूप में देखा गया है उसी को आज समाज को बांटने, भेदभाव बढ़ाने, 80 फीसदी से अधिक जनता को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित करने और वैश्विक बाजार के लिए बाजारपक्षी मूल्यों से सिंचित गुलाम कामगारों की फौज खड़ा करने का साधन बना दिया है। आज वह वक्त आ गया है जब हमें तय करना है कि हम कैसा भारत चाहते हैं, ऐसे भारत का निर्माण करने में शिक्षा की क्या भूमिका हो व उसके लिए उपयुक्त व्यवस्था कैसी हो और इस को मुमकिन कराने के लिए हमें क्या करना है। यही ऐतहासिक महत्व हागा चेन्नई सम्मेलन का।

सरोकार व मुद्दे

चेन्नई सम्मेलन में इन सब सवालों पर खासकर स्कूली शिक्षा के संदर्भ में विचार किया जाएगा यानी पूर्व-प्राथमिक स्तर (नर्सरी, के.जी.) से लेकर 12वीं कक्षा तक के संदर्भ में। आज की गैर-बराबरी और भेदभाव की बुनियाद पर खड़ी की गई बहु-परती स्कूल व्यवस्था को ध्वस्त करके पडोसी स्कूल पर आधारित और पूरी तौर पर सार्वजनिक वित्त (सरकारी कोष) से पोषित समान स्कूल व्यवस्था को कैसे स्थापित किया जाए? मुफ्त शिक्षा के मायने क्या हैं? क्या इसका अर्थ महज निःशुल्क शिक्षा (यानी फीस नहीं लेना) देना है या ऐसी शिक्षा की गारंटी देना है जिसको पाने के लिए किसी भी बच्चे या उसके अभिभावक पर किसी भी तरह का आर्थिक बोझ न पड़े? जाहिर है कि ऐसी स्कूल व्यवस्था का प्रबंधन आज की प्रबंधन व्यवस्था जैसा नहीं हो सकता। सार्वजनिक वित्तसे पोषित होने के बावजूद समान स्कूल व्यवस्था का प्रबंधन लोकतांत्रिक, विकेंद्रित और सहभागी कैसे बने? स्कूली व्यवस्था से समाज में सदियों से व्याप्त तरह-तरह की विषमताओं (वर्गीय, जातीय, सांप्रदायिक, लिंग-आधारित, भाषाई, विकलांगता-संबंधित, आंचलिक आदि) को बाहर कैसे किया जाए और देशभर की जनपक्षी विविधताओं को शामिल कैसे किया जाए? हालांकि संवैधानिक नजरिए का भारत बनाने के लिए पाठ्यचर्या (करीकुलम) की एक राष्ट्रीय रूपरेखा या खाके को स्वीकारना होगा लेकिन उसमें बच्चों व शिक्षकों की सृजनशीलता, भू-सांस्कृतिक विविधता व बहुभाषीयता, सीखने-सिखाने के तौर-तरीकों में नवाचार और वैज्ञानिक कसौटी पर परखकर स्थानीय ज्ञान को जोड़ने एवं अन्य चुनौतियों क¨ शामिल करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश कैसे बन पाए? स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा के बीच के तमाम विरोधाभास (जैसे कोचिंग का कारोबार) को खत्म करके उनके बीच सहज संबंध कैसे बने? यानी ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक पूरी तौरपर मुफ्त शिक्षा और 12वीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा पाने के लिए सभी बच्चों को समान अवसर की गारंटी कैसे मिले, यह भी सम्मेलन का एजेंडा होगा। कुल मिलाकर हमारी लड़ाई केवल समान स्कूल व्यवस्था तक सीमित नहीं है वरन् ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक समान शिक्षा व्यवस्था की है। चेन्नई सम्मेलन में ऐसे कई सवालों पर जनपक्षी वैकल्पिक एजेंडे के निर्माण की कवायद की जाएगी।

उद्देश्य

सम्मेलन के निम्नांकित उद्देष्य होंगे -

1. भारत के सभी बच्चों को संवैधानिक मूल्यों से सिंचित पूर्व-प्राथमिक स्तर (नर्सरी, के.जी.) से कक्षा 12 तक बगैर किसी भेदभाव के मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मौलिक अधिकार देने के लिए पूरी तौर पर सार्वजनिक वित्त (सरकारी कोष) से पोषित व पडोसी स्कूल पर टिकी हुई समान स्कूल व्यवस्था की अवधारणा को विकसित करना और उसको ‘राज्य‘ की संवैधानिक जवाबदेही के रूप में स्थापित करना।

2. 12वीं कक्षा के बाद गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के लिए समान अवसर का संवैधानिक अधिकार उपलब्ध करने के लिए ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक पूरी तौर पर सार्वजनिक वित्त (सरकारी कोष) से पोषित समान शिक्षा व्यवस्था को जन आंदोलन का मुद्दा बनाना।

3. समान शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए शिक्षा के बाजारीकरण को खत्म करने और वर्तमान नवउदारवादी नीतियों को पलटकर संवैधानिक एजेंडे को पुनस्र्थापित करने की पूर्वशर्त के पक्ष में जन आंदोलन की रणनीति तय करना।

प्रमुख सत्र

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में शिक्षा की सामाजिक परिवर्तनकारी भूमिका, षिक्षा और संवैधानिक मूल्यों के बीच अंतर्संबंध, ‘मैकॉले से लेकर मनमोहन‘ तक शिक्षा के अधिकार की लड़ाई के इतिहास, शिक्षा पर नवउदारवादी हमला व उसके बाजारीकरण का प्रतिरोध और समान स्कूल व्यवस्था की दृष्टि का नवनिर्माण आदि विषयों पर विचार पेश किए जाएंगे। इसके अलावा सम्मेलन में निम्नांकित उल्लेखनीय सत्र होंगे -

अंतरराष्ट्रीय सत्र – इस सत्र में उन मुल्कों के अनुभवों को जानने, समझने व उनसे भारत के संदर्भ में सबक सीखने की कोशिश की जाएगी जहां किसी-न-किसी रूप में सार्वजनिक वि्त्त-पोषित समान स्कूल व्यवस्था अपनाई गई, चाहे वे मुल्क पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के रहे हों, चाहे समाजवादी अर्थव्यवस्था के। इसके लिए अमरीका, कनाडा, क्यूबा, जर्मनी, जापान, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, फ़िनलैंड, ब्राझील, भूटान आदि को चिन्हित किया गया है। इसमें उन अनुभवों की भी पड़ताल की जाएगी जिनमें पिछले दो-तीन दशकों में नवउदारवादी नीतियों के चलते समान स्कूल व्यवस्था को विकृत या ध्वस्त करने की कोशिश हुई है।

कानूनी सत्र – इस सत्र में कानून विषेषज्ञों की मदद से यह समझा जाएगा कि 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002), शिक्षा अधिकार कानून (2009) और इस मामले में हाल में हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में शिक्षा में गैर-बराबरी व भेदभाव बढ़ाने और बाजारीकरण की नीतियों को तेज करने के जो प्रावधान या विचार हैं उनके खिलाफ़ क्या संवैधानिक कदम उठाए जा सकते हैं। खासकर अनुच्छेद 19(1)(छ) के दायरे से शिक्षा व स्वास्थ्य को बाहर करने व अनुच्छेद 19(6) की अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(क) और 21 के संदर्भ में वर्तमान सीमाओं को तोड़ने के मकसद से किस तरह के संवैधानिक संशोधनों, कानूनी कदमों या राजनीतिक कार्रवाइयों की जरूरत होगी।

राजनीतिक दलों के साथ सत्र – विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ होने वाले इस सत्र में हरेक के सामने 10-12 सवाल रखकर उनके दलों के नजरिए का खुलासा करवाया जाएगा और संसद व विधान सभाओं में इस संदर्भ में उनके द्वारा की जानेवाली कार्रवाई का आश्वासन मांगा जाएगा। उनसे सवाल-जवाब करके उनके नजरिए के बारे में सफाई मांगी जाएगी और जरूरत पड़ने पर उसमें मौजूद गैर-संवैधानिक व जनविरोधी पक्षों को उजागर भी किया जाएगा ताकि उनकों पुनर्विचार के लिए मजबूर किया जा सके।

जन आंदोलन विकसित करने की रणनीति निर्माण सत्र – इस सत्र में शिक्षा के बाजारीकरण की नीतियों को पलटवाने और सार्वजनिक वित्त-पोषित समान स्कूल व्यवस्था को स्थापित करने के लिए जन आंदोलन खड़ा करने की रणनीतियों पर विचार होगा। इसके लिए उन राज्यों के अनुभवों की खासतौर पर पड़ताल की जाएगी जहां इस दिशा में आंदोलन आगे बढ़ा है और सबक सीखे जा सकते हैं।

अंत में रैली, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सार्वजनिक सभा के जरिए जन आंदोलन के लिए आह्वान दिया जाएगा।

चेन्नई घोषणापत्र

सम्मेलन से शिक्षा का बाजारीकरण खत्म करने और समान शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए जन आंदोलन का आह्वान देने के मकसद से एक चेन्नई घोषणापत्र जारी किया जाएगा जिसे संविधान की 8वीं अधिसूची में शामिल देश की 22 भाषाओं में प्रसारित किया जाएगा।

अनुवाद

तमिल-हिंदी-अंग्रेजी तीनों भाषाओं में परस्पर दोतरफा अनुवाद की व्यवस्था के लिए पुरजोर कोशिश होगी। यदि आप में से कोई साथी इस महत्वपूर्ण काम में सक्रिय योगदान के लिए तैय्यार हैं तो तुरंत संपर्क करें।

सहभाग का आमंत्रण व उसकी कसौटियां

सम्मेलन में विभिन्न विद्यार्थी, शिक्षक व शिक्षा अधिकार की लड़ाई में शामिल संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ व्यक्तिगत हैसियत से कई बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, न्यायाधीशों व समाजकर्मियों के सहभाग की अपेक्षा है। कुल मिलाकर 2,000 प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे, तमिलनाड़ु से 1,500 प्रतिनिधि और देश के विभिन्न राज्यों से 500 प्रतिनिधि। उन सभी संगठनों व व्यक्तियों को सहभागी होने के लिए आमंत्रित किया जाता है जो निम्नांकित तीनों शर्तों पूरा करते हैं। पहला, वे शिक्षा का बाजारीकरण करने व शिक्षा को बिकाऊ माल बनाने एवं सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पी.पी.पी.) के जरिए सार्वजनिक धन निजी एजेंसियों व कारपोरेट घरानों को पहुंचाने की नीतियों का स्पष्ट विरोध करते हैं। दूसरा, वे पूरी तौरपर सार्वजनिक वित्त से पोषित और पडौसी स्कूल पर टिकी हुई समान स्कूल व्यवस्था का समर्थन करते हों।  तीसरा, वे ‘के.जी. से पी.जी.‘ तक मुफ्त व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बिना किसी भेदभाव को सबको समान अवसर मुहैया करने वाली सार्वजनिक वित्त से पोषित लोकतांत्रिक, समतामूलक, नयायशील, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने की मुहिम में शामिल होने को तैयार हों।

यदि आप या आपके साथीगण उक्त तीनों शर्तों को पूरा करते हैं तो अपने संगठन की ओर से या व्यक्तिगत हैसियत से सम्मेलन में सहभागी बनने के लिए निम्नांकित को संपर्क करके अपने व साथियों बारे में जानकारी (नाम, संगठन, फ¨न नं., डाक व ईमेल पता सहित) दें -

1. डॉ. विक्रम अमरावत, कार्यालय सचिव, अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच: मो – 8128293711; फोन – 079-23274360 (घर).

2. श्री प्रिंस गजेंद्र बाबू, महासचिव, स्टेट प्लेटफ़ार्म फ़ॉर कॉमन स्कूल सिस्टम, तमिलनाड़ु:फोन – 044-28341456 (दफ्तर); 044-28443660 (घर).

चेन्नई के बाहर से आनेवाले प्रतिनिधियों को अपनी यात्रा के खर्च का खुद इंतजाम करना होगा लेकिन स्थानीय आवास व भोजन की पूरी जिम्मेदारी आयोजन समिति की होगी। सम्मेलन के खर्च के लिए स्टेट प्लेटफ़ार्म फ़ॉर कॉमन स्कूल सिस्टम, तमिलनाड़ु, चेन्नई शहर में स्वयंसेवकों की टीमें बनाकर आम जनता से पैसा इकट्ठा कर रहा है।

आप सब से अपील है कि इस ऐतिहासिक सम्मेलन में अपने साथियों के साथ पूरे जोश-खरोश के साथ हिस्सा लेकर शिक्षा को मौलिक अधिकार व समान शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए राष्ट्र-व्यापी आंदोलन खड़ा करने और भारत के नवनिर्माण में अपना योगदान दें।

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