सुयश सुप्रभ Suyash Suprabhने रामकृष्ण परमहंस की बाबत अपने विचार प्रकट किए हैं। यहां मैं किशन पटनायक के रामकृष्ण परमहंस के बारे में विचार दे रहा हूं :
” रामकृष्ण परमहंस कई अर्थों में एक नवीन भारत के धार्मिक संस्थापक थे ।विवेकानन्द और केशवचन्द्र सेन के माध्यम से उन्हें पश्चिम का स्पर्श मिला होगा । उनका तरीका बौद्धिक नहीं था , अलौकिक था। उनके संदेश सांकेतिक थे। उनके जीवन प्रसंगों में ही उनका संदेश निहित था । उनके जीवन के चार प्रसम्गों को हम लें। अपने प्रियतम शिष्य को उन्होंने मोक्ष के लिए नहीं,समाज जागरण के काम में लगाया ।खुद हिन्दू मंदिर का पूजक होकर इस्लाम और ईसाई धर्म की भी साधना की । चांडालो कें घरों में जाकर झाड़ू लगाई और उनका पाखाना साफ किया ।पत्नी को संन्यासिनी किया और विधवा को सुहागिन बनाया ।भारतीयता के पुनर्जागरण के लिए ये सारे संकेत थे- समाज सुधार को प्राथमिकता देना,गैर भारतीय संस्कृति के मूल्यों का आदार करना और अपनाना , मनुष्य की गरिमा को स्वीकृति देना,नारी जीवन को स्वतंत्र और सकारात्मक बनाना । शारदा देवी के प्रसंग मे दोनों बातें ध्यान देने योग्य हैं-पति के साथ संन्यासिनी और पति के बाद सुहागिन ।” (१ जनवरी,१९८८)


फ़ेसबुक पर पढ़ चुका हूँ। परमहंस की इस तरह से समीक्षा अच्छी लगी। लेकिन यह ध्यान रहे परमहंस वही व्यक्ति हैं जो किसी के द्वारा दिए प्रसाद या खाने की वस्तु को सिवाय नरेंद्र को खाने को नहीं देते। और कहते हैं कि तू इसे खा-पचा सकता है। तू यह है, तू वह है। हँसी भी आती है जब परमहंस नरेंद्र से मिलते हैं और बातें करते हैं। उनकी अमृतवाणी उनके विचारों का लाजवाब संग्रह है। हाँ, उससे तर्क करने की या सोचने की कला और विज्ञान दोनों सीखा जा सकता है, और वह भी बेहद अच्छे तरीके से। …तो उस खाने की बात हम उनमें छुआछूत के दर्शन भी कर सकते हैं?…बातों को व्याख्यायित किया जा सकता है, अलग-अलग तरीके से।
https://www.facebook.com/suyash.suprabh/posts/10150414130119696
जहाँ डेट और टाइम लिखा होता है वही पोस्ट का लिंक होता है फेसबुक में।
अच्छी प्रस्तुति