बचपन से ही केन्द्र-शासित अंडमान – निकोबार द्वीप समूह के प्रति आकर्षण उन द्वीपों की भौगोलिक स्थिति के कारण भी था। भूमध्य रेखा से मात्र ६ डिग्री उत्तर से इनकी दक्षिणी सीमा का शुरु होना तथा भारतीय मानक समय निर्धारित करने वाली देशान्तर रेखा से करीब १० डिग्री पूर्व में होना ! यानि सदाबहार वन और मई के अन्त में भी पारिजात की सुवास तथा भोर ४.१५ – ४.३० बजे पौ फटना !
अण्डमान और निकोबार जैसे दुनिया के छोटे टापुओं से लगायत ऑस्ट्रेलिया जैसे विशाल टापुओं तक की स्थिति समुद्र की छोटी मछलियों की तरह रही है । बड़ी मछलियों की आधीनता और इस क्रम में मूल निवासियों का सफ़ाया । अंग्रेजों ने डच लोगों से इन द्वीपों को खरीदा था।
जी , द्वीप खरीदे जाते हैं , दान में भी मिलते हैं और गत दिनों दीवालिया होने वाला मुल्क आईसलैण्ड भी एक द्वीप ही है । स्कॉटलैण्ड का एक द्वीप किसी पोद्दार ने स्वामी रामदेव को अनशन शुरु करने के ऐन पहले दान में दिया । पोर्ट ब्लेयर पहुंच कर मालूम हुआ कि डॉ. फ़ारूख़ अब्दुल्लाह एक टापू के नामी (अथवा बेनामी?) मालिक हैं । इस टापू को खरीद कर काश्मीर से जुड़ी भारतीय संविधान की धारा ३७० की निहायत जरूरत की रक्षा करने की पात्रता को डॉक्टर साहब गँवा देते हैं । राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद की नुमाइन्दगी करने वाली भाजपा जब फिरकापरस्त सोच से इस धारा को हटाने की माँग उठाती है तब उसे हिमाचल और पूर्वोत्तर के राज्यों में लागू उसी प्रकार के प्रावधानों का हवाला दिया जाता है जिनके तहत ’पर-प्रान्तीय” नागरिक वहां जमीन नहीं खरीद सकते । दलित तथा आदिवासी की जमीनें भी न छीनी जा सकें इसलिए उनकी जमीनें खरीदने पर भी लाजमी तौर पर रोक रहती है । अण्डमान के हैवलॉक द्वीप का राधानगर समुद्र-तट बहुत सुन्दर है । सुना है कि टाटा इस पूरे तट को ले रहा है । मुमकिन है कि तट की खूबसूरती का लुत्फ़ तब टाटा के पांच -सितारा होटेल में टिके पर्यटक ही उठायें ।
पिछले दिनों जयललिता की सरकार ने तमिलनाडु में विधान परिषद को समाप्त करने का फैसला लिया।विधान सभाओं को दो तिहाई बहुमत से इन्हें (उस राज्य की विधान परिषद को) समाप्त करने का हक है। अपने दल में विधान परिषद के औचित्य पर चर्चा के क्रम में मैंने कहा था कि आम लोगों के वोट से जीत कर आने का जिन सबल – समूहों में सामर्थ्य नहीं है उन्हें विधायिका तक पहुंचाने का यह एक उपाय है – विलोमारक्षण का नमूना । स्नातकों और शिक्षकों के लिए विधान परिषदों में सीटे होती हैं – सिर्फ़ दलित,सिर्फ़ रिक्शाचालक ,सिर्फ पटरी व्यवसाई ,सिर्फ़ खेतीहर मजदूर के वोटों से उनके नुमाइन्दों को विधायिका में भेजने का प्रावधान क्यों नहीं होता ? इस चर्चा को यहाँ बेवजह नहीं घसीटा गया है । केन्द्रशासित होने के कारण अण्डमान-निकोबार में स्थानीय निकायों का महत्व अन्य सूबों की तुलना में बहुत अधिक है । यह सिर्फ़ ग्राम प्रधानों के भव्य दफ़्तरों को देख कर यह नहीं कह रहा हूँ । अण्डमान और निकोबार शिक्षा निदेशालय द्वारा बाँग्ला , तमिळ, तेलुगु और हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूल चलाए जाते हैं । निकोबारियों की पंचायत यह निर्णय लेती है कि हमारे इलाके में पर-प्रान्तीय लोग न आये – स्थानीय प्रशासन इस निर्णय को लागू करने के लिए बाध्य है । यहाँ बताना जरूरी है कि निकोबारी एक मात्र आदिम जाति समूह है जो कथित आधुनिक मुख्यधारा में शरीक है ।
हमारी आधुनिक व्यवस्था ने अण्डमान और निकोबार के मूल निवासी आदिम जाति समूहों को अदृश्य करने की ठान ली है । अमानवीय लापरवाही इन समूहों से होने वाले सरकारी-असरकारी सम्पर्क का मूल द्योतक है । मानों दो वृत्त हों जो कथित आधुनिक सभ्यता की शुरुआत से अब तक असंपृक्त रहे हों । ’ग्रेट अण्डमान ट्रंक रोड’ के द्वारा आदिम जाति समूह के वृत्त का प्रतिच्छेदन ( intersection) किया गया है । पोर्ट ब्लेयर शहर से बाराटांग,रंगत,बेतापुर और डिगलीपुर जैसे कस्बों को जोड़ने के लिए समुद्र-मार्ग का उपयोग होता रहा होगा और अब भी हो सकता है। इस सड़क ने इस जमीन के मूल निवासियों को दिए हैं अजीबोगरीब खाद्य और तम्बाकू-पान से लेकर शराब जैसे मादक द्रव्य ।
बारातांड के निकट तोताटापू व चूना-पत्थर की गुफ़ाओं से लौटते वक्त एक जारवा महिला ने हमारे वाहन के ड्राइवर को यह फलों का गुच्छा दिया । ड्राइवर ने उसे तम्बाकू वाले एक पान की पुड़िया पहले ही दे दी थी। यह आदान-प्रदान पल-दो-पल में हुआ । कुछ किशोर तीर-धनुष लिए मोटरगाड़ी वालों के समक्ष नाच रहे थे। अधेड़ स्त्री-पुरुषों की र्निविकार निरीह दृष्टि । यह फल पहली बार चखा । पतला किन्तु कड़ा छिलका,सफ़ेद गूदा और हल्के गुलाबी तीन बीज । अगली सुबह जब यह तसवीर खीची तब गूदा भी रंगीन हो चुका था । गुच्छा वानस्पतिक रेशों से बँधा है(चित्र में प्लास्टिक डोर लग रहा होगा) । स्वाद में एक खट्टापन था । पोर्ट ब्लेयर के नृतत्वशास्त्रीय संग्रहालय में एक संरक्षित गुच्छा तिबीलाछू नाम से रखा गया है। लीची और तिबीलाछू एक ही कुनबे के फल लगे।
जारवा लोगों के इलाके की सीमा पर वन विभाग की चौकी है। निर्धारित समय पर पुलिस पार्टी के साथ वाहनों का काफ़िला चलता है।झारखण्ड के गिरीडीह जिले के एक हिस्से में नक्सलवादियों से डर कर ऐसे काफ़िले चलते हैं,याद आया । इस चौकी पर लिखा है कि यह फोर्स जारवा लोगों की सुरक्षा के लिए है ! काफ़िले में शरीक सभी मान कर चलते हैं कि जारवाओं से सुरक्षा के लिए पुलिस साथ है। सौभाग्य से इस चौकी पर ही अन्डमान आदिम जाति विकास समिति के एक कर्मचारी नवदीप बारोई से मुलाकात हो गई । जनगणना जैसे सरकारी काम के लिए सरकार को इनकी मदद मिलती है । वे जारवा भाषा भी जानते हैं । तीन इलाकों में कुल चार हजार की आबादी का अनुमान नवदीप ने बताया । पोर्ट ब्लेयर में एक मित्र ने कुछ चौंकाने वाली सूचनायें दीं । २०११ की जनगणना में अण्डमान-निकोबार की आबादी के घटने की आँकड़े जुटे थे – इस सही या गलत सूचना से प्रशासनिक हल्कों में हड़कम्प मच गया । आंकड़े ’सुधारे गए’ । इन्होंने बताया कि सरकार के द्वारा दिए जाने वाले राशन में भी तम्बाकू आदि शामिल कर लिया जाता है। आदिम जाति विकास समिति में जारवा भाषा जानने वाले तीन कर्मचारी हैं जो नीचे के पदों पर ही हैं । निश्चित तौर पर इस सड़क को बन्द कर दिया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बाबत एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसे तोड़ने-मरोड़ने के तरीके निकल चुके हैं और हमारा अतिक्रमण जारी है ।
( जारी )




अंडमान यात्रा के संदर्भ में आपका मेल मिला था । पर मैं पूरे हफ्ते राउरकेला व फिर भद्रावती की यात्रा पर था। इसलिए समय रहते जवाब नहीं दे पाया। बहरहाल आपकी यात्रा सुखद रही जान कर प्रसन्नता हुई।
आदिम जनजातियाँ से बाहरी लोगों का संपर्क बढ़ने व रोड के चालू रहने का सबसे बड़ा कारण पर्यटन एवम दिगलीपुर तक बसे लोगों को आने जाने की सहूलियत की वज़ह से है। हम जब गए थे तो जारवा गाड़ी के पीछे आकर प्लास्टिक की बोतले ले जाते थे और बीड़ी मिलने से बेहद खुश हो जाते थे। बाराटाँग जेटी पर तो एक जारवा फोटो की एवेज में रुपये तक माँगने लगा था।
बेहतर…
बहुत बढ़िया।