डल बाजार में आ रहे है। सड़कों पर कारें ही कारें दिखाई देती हैं। सड़कें फोरलेन-सिक्सलेन बन रही है। हाईवे, एक्सप्रेसवे की चिकनी सड़कों पर गाड़ियां हवा से बात करती हैं। ‘फोरलेन‘ शब्द तो बच्चे-बच्चेे की जुबान पर चढ़ गया है। इसी तरह शिक्षा में भी क्रांति आ गई है। पहले इंजीनियरिंग, मेडिकल, बी.एड. कालेज गिनती के हुआ करते थे। आज एक-एक शहर में दस-दस कॉलेज है और उनमें सीटें खाली रहती है। पहलें चुनिंदा कान्वेंट स्कूल हुआ करते थे, अब इंग्लिश मिडियम स्कूल गली-गली, मोहल्ले में खुल गए है।
हमारी राष्ट्रीय आय छः, सात, आठ प्रतिशत की वृद्धि दर से बढ़ती जा रही है। दुनिया में 2007-08 में जो मंदी का झटका आया , वह भी हमें ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाया। इस बीच में हमने परमाणु बम भी बना लिए । हम दुनिया की महाशक्ति बनने का सपना देख रहे है। संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्य तो बन चुके है, स्थाई सदस्य बनने के लिए हम हाथ-पांव मार रहे है। ओबामाजी की मेहरबानी हो जाए, तो यह सपना पूरा होने की उम्मीद हम कर रहे है।
चकाचैंध के पीछे का अंधियारा
किंतु यह चमक-दमक कुछ खोखली मालूम होती है। इस चकाचैंध के पीछे कुछ अंधेरा बीच-बीच में सामने आता रहता है। जैसे, कुछ दिन पहले वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) का समाचार आया । दुनिया के 87 विकासशील देशों में भूख के हिसाब से भारत का स्थान काफी नीचे सड़सठवां निकला। हमारे पड़ोसी देशों का स्थान भी हमसे काफी ऊपर है – श्रीलंका (39), पाकिस्तान (52), नेपाल (56)। सिर्फ बांगलोदश (68) हमसे एक पायदान नीचे है। इसी रिपोर्ट में बताया है कि भारत में 5 वर्ष से छोटी उम्र के 42 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम है और 48 प्रतिशत बच्चों का शारीरिक विकास अवरुद्ध है। दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे लोग और कुपोषित बच्चे इस देश में निवास करते है। सबसे ज्यादा अशिक्षित, सबसे ज्यादा बेघर या कच्चे घरों में रहने वाले लोग, सबसे ज्यादा निमोनिया और मलेरिया से मरने वाले लोग भी इस देश में है। विडंबना यह है कि अमरीका के बाद दुनिया के सबसे ज्यादा धनी अरबपति भी इसी देश में है। मुंबई के मुकेश अंबानी के कई अरबों रुपयों से तैयार होने वाले महल ने तो पुराने राजा-महाराजाओं-नवाबों को अय्याशी में काफी पीछे छोड़ दिया है। यह सत्ताईस मंजिला घर है और एक मंजिल की ऊचाई औसत से दुगनी है। इसमें तीन हेलीपेड़ है, कई स्विमिंग पुल है, छः मंजिलों में 168 कारों की पार्किंग की जगह है। अंबानी के इस आलीशान महल और झोपडपट्टियों-गांवों में रहने वाले की कंगाली का गहरा संबंध है।
खबर यह भी है कि पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटनाओं में 8-9 लाख लोग मरते है, उनमें एक लाख लोग हिन्दुस्तान में मरते हैं। टेªफिक जाम बढ़ते जा रहे है ओर वाहनों से होने वाला प्रदूषण बढ़ता जा रहा हैं। सड़कों पर चलने की जगह नहीं बची। सड़कें चौड़ी होती जा रही हैं, किंतु उससे ज्यादा कारों की तादाद बढ़ रहीं है। दिल्ली में राष्ट्रमण्डल खेलों के नाम पर जो अनाप-शनाप पैसा लुटाया गया, उसका एक बड़ा हिस्सा सड़कों, पुलों और फ्लाईओवरों पर खर्च हुआ । विडंबना यह है कि उसके बाद भी ट्रेफिक जाम से मुक्ति नहीं है। घर से दफ्तर जाने में कई बार दो-दो घंटे लग जाते है। इतनी असुविधाओं और इतनें फिजूलखर्च के बाद भी यदि यातायात सुगम नहीं, दुर्गम हो रहा है और दिन के ज्यादा घंटे यातायात में बरबाद हो रहे है, तो कुल मिलाकर क्या इसे प्रगति कहा जा सकता है ? इससे तो गांव के किसान की जिंदगी अच्छी है, जो अपने बैल लेकर आधे घंटे में घर से खेत पहुंच जाता है।
दिल्ली में और देश के कई महानगरों में रोज सडकों पर कारों का विशाल रेला चलता है। कारें इतनी ज्यादा हो गई है कि चलती हैं तो मुसीबत और खड़ी होती है तो मुसीबत, क्योंकि पार्किंग की जगह नहीं है। इन महानगरों में आवासीय सोसायटियों ने जब अपनी इमारतें बनाई थी, तो जितनी कारों के खड़े होने की जगह रखी थी, अब उससे दुगनी-तिगुनी कारें हो गई है। मिंया के पास भी कार है, बीबी के पास भी कार हो गई है, तो वहाँ पार्किंग समस्या बन गई है। सड़क पर एक कार चलती है तो एक या दो व्यक्ति को ले जाती है। उसकी जगह बस चलती है तो पचास लोगों को ले जाती हैं। फिर भी कारें बढ़ती जा रही है और सरकार भी कारों को बढ़ावा दे रहीं है, इसी को प्रगति की निशानी मान रही है। देश में हाईवे और एक्सप्रेसवे भी मुख्यतः इन्हीं कारों के लिए बन रहे है। इनमें भी बड़े पैमाने पर खेती की जमीन ली जा रही है। यदि किसान विरोध करते है, तो उन पर लाठी व गोली चलाने में सरकारों को संकोच नहीं होता है।
विकास की तमाम परियोजनाएं खेतों को निगलती जा रही है, फिर चाहे विशेष आर्थिक जोन (सेज़) हो, औद्योगिक क्षेत्र या कारखाने हो, बड़े बांध हो, एक्सप्रेस मार्ग हो या शहरों का विस्तार हो। कभी हमने सोचा है कि इसका क्या नतीजा होगा ? आज जो अन्न संकट पहले से है, कई लोग भूखे रहते हैं, वह स्थिति कितनी भयानक हो जाएगी ? इसकी एक झलक हमें तीन चार साल पहले मिल गई थी, जब 15 रु किलों के भाव से आस्ट्रेलिया का सड़ा गेहूँ आयात करना पड़ा था। अपने किसानों को गेहूँ का समर्थन मूल्य साढ़े आठ रु. दिया था, किंतु विदेशों को 11 से 15 रु. किलो का भुगतान करना पड़ा था।
गांधीसागर नहीं, हिटलरसागर
दस दिन पहले, 19 नवंबर 2010 को इसी मालवा अंचल में एक घटना हुई, जिसकी ओर हमारा ध्यान जाना चाहिए। बड़े बांधों को हमारे पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ‘आधुनिक भारत के मंदिर‘ कहा करते थे। ऐसा ही एक मंदिर चंबल नदी पर विशाल गांधीसागर बांध के रुप मे बना । इसके पचास साल पूरे होने पर बड़े बाँधों के ऊपर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई तथा विस्थापितों का एक सम्मेलन हुआ। 50 साल होने के बाद भी इसके विस्थापित अपने पुर्नवास और अपने अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहे हंै। उस दिन उन्होंने प्रस्ताव पास किया कि गांधीसागर का नाम बदलकर हिटलरसागर किया जाना चाहिए। इस एक मांग में उनका गहरा दर्द छिपा है, जिस पर समाज व देश ने गौर करने की जरुरत नहीं समझी। इस संगोष्ठी में यह बात भी सामने आई कि इस बांध के कारण पूरे मालवा क्षेत्र में मरुस्थलीकरण को बढ़ावा मिला है। डा. रामप्रताप गुप्ता ने बताया कि गांधीसागर जलाशय जरुरत से ज्यादा बड़ा बन गया, जो दस में से नौ साल खाली रहता है। इसलिए राजस्थान सरकार की तरफ से लगातार दबाव रहा है कि गांधीसागर के जलग्रहण क्षेत्र में पानी रोकने वाली कोई सिंचाई योजना नहीं बननी चाहिए। नतीजा यह हुआ कि पूरे मालवा में नहरी सिंचाई योजनाओं का विकास रुक गया, सिंचाई का पूरा दारोमदार कुओं व ट्यूबवेलों पर यानी भूजल के दोहन पर आ गया । आज मालवा की जमीन का पानी तेजी से नीचे जा रहा है और जमीन बंजर हो रही है। पानी का जबरदस्त संकट आ रहा है। पिछले वर्ष गर्मियों में उज्जैन के नगरवासियों को पांच दिन में एक बार पानी की आपूर्ति करने जैसी नौबत आ गई थी। क्या इससे हमने कोई सबक लिया? दरअसल हमें विकास की पूरी दिशा पर नए सिरे से विचार करने की जरुरत है। आधुनिक सभ्यता ने विज्ञान व टेकनालाॅजी के चमत्कारों से अपने अहंकार में अभी तक यह माना है कि प्रकृति हमारी दासी है। इसका हम चाहे जैसा शोषण कर सकते है। इसको चाहे जैसा नचा सकते है, रौंद सकते है। प्रकृति भी अपना बदला ले सकती है, यह हम भूल गए।
एक गलती तो देश को आजादी मिलने के बाद हुई। 15 अगस्त 1947 को हम अंग्रेजों के राजनैतिक प्रभुत्व से तो आजाद हुए, लेकिन उनका मानसिक प्रभुत्व हमारे ऊपर बना रहा। पिछले 60-65 सालों में यह प्रभुत्व मजबूत हूआ है, कमजोर नहीं। हमने बगैर सोचे समझे विकास का वही रास्ता चुना जो यूरोप-अमरीका का रास्ता है। हमने दो बातें नहीं सोची। एक तो यह कि यह रास्ता हमारे लिए खुला है या नही? दूसरा इस रास्तें पर चलने या उसकी कोशिश का परिणाम हमारे लिए, देश व समाज के लिए और हमारी भावी पीढ़ियों के लिए क्या होने वाला है?
विकास का यह रास्ता अनिवार्य रुप से पूरी दुनिया के किसानों-मजदूरों के शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की बेहिसाब लूट पर आधारित है। अमरीका-यूरोप की वर्तमान समृद्धि के पीछे पिछली तीन-चार सदियों की पूरी दूनिया की लूट है। यदि भारत जैसे एशिया-अफ्रीका के देशों को गुलाम बनाने और बेतहाशा लूटने का मौका अंग्रेजों को न मिला होता, तो इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति संभव ही नहीं होती। आज के दोनों अमरीकी महाद्वीप भी गोरे लोगों द्वारा जीते हुए और कब्जा किये हुए भूभाग है। यहाँ के मूल निवासियों को खत्म करके, उन पर बर्बरता से अत्याचार करके , यूरोपीय सभ्यता आगे बढ़ी है। यहाँ तक कि जब अमरीका के मूल निवासी कम पड़ने लगे या उन्होंने गुलामी करने से इंकार कर दिया, तो वहाँ की खदानों, प्लांटेशनों व रेल्वे लाईनों पर काम करने के लिए अफ्रीका से लोगों को गुलाम बनाकर लाया गया। पैरों में बेड़ियाॅ डालकर अफ्रीकी गुलामों के जहाज भरकर लाए जाते थे। ऐसी ही कुछ कहानी आस्ट्रेलिया की है। आधुनिक सभ्यता की बुनियाद में लूट, बर्बरता, औपनिवेशिक शोषण और साम्राज्यवाद का चार-पांच सौ सालों का इतिहास है।
यदि यह सच. है तो भारत उस रास्ते पर चल ही नहीं सकता है। भारत के पास उपनिवेश नहीं है, दुनिया को लूटने का मौका नहीं है। फिर भी हम उस रास्तें पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, तो इस चक्कर में देश के अन्दर उपनिवेश बना रहे हैं। देश के पिछड़े व आदिवासी इलाके इसी तरह के आंतरिक उपनिवेश हैं। गांव और खेती भी उपनिवेश है। भारतीय खेती पर जो जबरदस्त संकट आया है, जिसमें लगातार लाखों किसान आत्महत्या कर रहे है, उसे इसी परिपेक्ष्य में समझा जा सकता है। आधुनिक विकास में यह अंतर्नीहित है कि इसे उपनिवेश चाहिए- बाहरी हो या आंतरिक, प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष। इस विकास में तय है कि थोडे़ से लोगों का ही विकास होगा, बाकी के लिए विस्थापन, गरीबी, भूखमरी व बेरोजगारी होगी। हमारे प्रधानमंत्री को बीच-बीच में समावेशी विकास (इन्क्लूजिव डेवलपमेंट) की बात करना पड़ती है, किंतु इस विकास में तो उल्टा हो रहा है और होगा ही। देश के विकास की गाड़ी 8 प्रतिशत, 9 प्रतिशत, 10 प्रतिशत वृद्धि दर की हाई स्पीड से चल रही है, चलने वाली है। किंतु देश के ज्यादातर लोग इस गाड़ी में सवार नहीं हो पा रहे हैं और पीछे छूटते जा रहे हैं। जो सवार है उनमें से भी कई गिरते जा रहे है। थोड़े से लोग पूरी स्पीड से दूसरों को छोड़ते, रौंदते , कुचलते हुए गाड़ी को लेकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। क्या ऐसे ही विकास के साथ इक्कीसवीं सदी मे जाने का सपना हमने देखा था।
अमरीका: कैसा आदर्श?
जिस अमरीका की हम नकल करने की कोशिश कर रहे है, वर खुद संकटों से घिरा है। पूंजीवादी सभ्यता के सिरमौर अमरीका और युरोप में दो साल पहले 2008 में जबरदस्त मंदी और वित्तीय संकट आया था जिसने उसे ऊपर से नीचे तक हिलाकर रख दिया। ऐसा दिखाई देता है कि अमरीका अब उससे उबर गया है। किंतु कंपनियां उबरी है, लोग नहीं उबरे हैं । अमरीका में काफी बेरोजगारी है, बेघर लोगों की संख्या बढ़ गई है। हाल ही में एक सर्वे की रपट में बताया था कि अमरीका में साढ़े चैदह प्रतिशत लोग ऐसे है, जिनको साल में कभी न कभी भूखा रहना पड़ता है। अमरीकी समाज में अपराध की दर भी काफी ज्यादा है। आबादी के हिसाब से जेल में बंद लोगों का अनुपात पूरी दुनिया में अमरीका में ही सबसे ज्यादा है। अमरीका में उपभोग भी सबसे ज्यादा है। किंतु इस प्रक्रिया में पर्यावरण का जो नाश हो रहा है, वह उसकी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता है। दुनिया में सबसे ज्यादा प्रतिव्यक्ति पेट्रोल की खपत संयुक्त राज्य अमरीका में है और सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी वहीं होता है। फिर भी उसने ग्रीनहाउस गैसों का उत्र्सजन कम करने के क्योटो समझौते पर दस्तखत नहीं किए और कोपनहेगन सम्मेलन में भी उसके अड़ियल रवैये के कारण कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई। हर तरीके से अमरीका आज दुनिया पर दादागिरी कर रहा है। ऐसे अमरीका का अनुसरण भारत के लिए कितना वांछनीय है और कितना संभव है- ये दोनों सवाल हमारे सामने है।
जानकारों ने हिसाब लगाया है कि अमरीका की जीवनशैली और वहाँ के जीवन स्तर को पूरी दुनिया के लोगों को अपनाना हो तो उसके लिए तीन पृथ्वियों की जरुरत होगी, एक पृथ्वी कम पड़ेगी। अमरीका की समृद्धि पूरी दुनिया के संसाधनों की लूट पर आधारित है ओर तथाकथित मुक्त व्यापार इसी का एक जरिया है। कहीं से उनके लिए पेट्रोल आता है कहीं से इस्पात आता है, कहीं से कैला और कहीं से बासमती चावल आता है, कहीं से मांस आता है, कहीं से आभूषण और कहीं से चाय-काफी आते हैं। उनके पास डॉलर है , इसलिए पूरी दुनिया के श्रम व संसाधनों को अपनी सेवा में लगा लेते हैं। भारत जैसे देशों की सरकारें खुश होती है कि हमारा निर्यात बढ़ रहा है। किंतु इस चक्कर में हम अपनी आबादी की जरुरतों की उपेक्षा करके उनकी सेवा में लग जाते है।
ऐसा नहीं है कि मुसीबत सिर्फ नीचे के गरीबों के लिए ही है। महानगरों के खाते-पीते लोगों की जिंदगी भी कोई अच्छी नहीं है। कई तरह के तनावों, व्यस्तता, भागदौड़ से उनका जीवन भी अशान्त है। आप मुम्बई जाइए तो वहाँ हर आदमी दौड़ता हुआ मिलेगा। किसी भी लोकल ट्रेन के स्टेशन पर खड़े होकर देखें- आदमी, महिलाएं, लड़कियाँ, बूढ़े सब दौड़ रहे हैं। उन्हें घर से कार्यस्थल तक पहुँचनें में दो से ढाई घण्टे लगते हैं और उतना ही समय लौटने में लगता है। सुबह पांच बजे उठकर जाने की तैयारी करनी पड़ती है। यह भी कोई जिंदगी है? बड़ी-बडी़ इमारतों के फ्लेट्स में रहने वाले परिवार अपने पड़ोसी को नहीं जानते, महीनों बातचीत नहीं होती, मुलाकात नहीं होती। घोर बेगानेपन, अकेलेपन और व्यक्तिवाद की यह जिंदगी है। इसमें सामूहिकता व मेलजोल खत्म होते जा रहे हैं। बगल के फ्लेट में कोई कत्ल करके भी चला जाए तो पता नहीं चलता। जब तीन-चार दिन बाद बदबू आने लगती है तो पता चलता है। किस तरह के जीवन को हम अपना आदर्श बना रहे है ?
शिक्षा: तीन कदमों की सहमति और विश्वासघात
जब हमारा देश आजाद हुआ, तो देश की शिक्षा के बारें में तीन बातों पर लगभग सहमति थी। एक, आजाद भारत का हर बच्चा शिक्षित होना चाहिए। दो, अंगे्रजों के साथ देश से अंग्रेजी भाषा की भी विदाई होगी। तीन, साम्राज्य की जरुरत के हिसाब से बनी मौकाले की शिक्षा पद्धति को आमूल बदलकर आजाद भारत की लोकतांत्रिक जरुरतों के हिसाब से नई शिक्षा पद्धति लाई जाएगी। अफसोस की बात है कि ये तीनों काम नहीं हुए। कई और मामलो की तरह शिक्षा के मामले में भी आजाद भारत की सरकारों ने जनता के साथ विश्वासघात किया।
एक नई जाति व्यवस्था
हमारा संविधान बना तो उसके नीति-निर्देशक तत्वों में लिखा गया था कि सरकार दस वर्ष के अंदर 14 बरस की उम्र तक देश के हर बच्चे की मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करेगी। किंतु दस तो क्या, साठ साल हो गये , यह काम आज तक नहीं हुआ। भले ही अब हमने इसका एक कानून बना दिया है, लेकिन काम तो उल्टा कर रहे है, जिससे इस लक्ष्य से और दूर जा रहे है। वह है शिक्षा का निजीकरण, व्यवसायीकरण , मुनाफाखोरी। अब हमने शिक्षा में विभाजन पूरा कर दिया हैः अमीरों के बच्चों के लिए निजी स्कूल, गरीब बच्चों के लिए सरकारी स्कूल। इस विभाजन के चलते अब सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीब बच्चें पढ़ते हैं, जिससे उनकी उपेक्षा व बदहाली बढ़ती जा रही है। उनमें पढ़ाई नहीं के बराबर होती है। शिक्षा में निजीकरण और मुनाफाखोरी का मतलब है भारी फीस। और जो फीस नहीं दे सकते हैं, ऐसे देश के बहुसंख्यक बच्चों के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद होते जा रहे है। एक तरफ हम ‘सर्व शिक्षा अभियान‘ चला रहे हैं, दूसरी तरफ देश के साधारण बच्चों को पैसे के अभाव में शिक्षा से वंचित करने की तैयारी कर रहे हैं। उनके लिए आगे बढ़ने के रास्ते में पहले अंग्रेजी की दीवार थी, अब पैसे की दूसरी ऊँची दीवार बनाई जा रही है। जो इस दीवार को फांद सकता है, वही समुचित शिक्षा पाने का अधिकारी होगा। देश में तो घोर असमानता है, किंतु शिक्षा में इस भेदभाव का मतलब है अवसरों की भी असमानता । यानी हम बच्चों में भी भेदभाव कर रहे हैं। देश की घोर असमानता को मजबूत करने और उसके सीमेन्टीकरण का काम कर रहे हैं। एक नई तरह की जाति व्यवस्था बना रहे हैं, जिसमें नीचे वाला नीचे ही रहेगा, ऊपर वाला ऊपर ही रहेगा।
बाजार, मुनाफे व लालच की सभ्यता
यह बाजारवाद बहुत खतरनाक है। सोवियत संघ व चीन के अनुभव के बाद हम यह तो नहीं कह सकते कि बाजार होना ही नहीं चाहिए। किंतु इस बाजार की कोई सीमा होगी या नहीं ? क्या जीवन के हर क्षेत्र को बाजार के हवाले कर देंगे ? गेहूँ, आलू, कपड़े, जूते, सोने, चांदी का बाजार तो ठीक है। किंतु शिक्षा का बाजार होना चाहिए क्या? पानी का बाजार होना चाहिए क्या ? स्वास्थ्य का बाजार ठीक है क्या ? पहले कभी हमने सोचा भी नहीं था कि पानी जो प्रकृति की मुफ्त देन है, वह भी बाजार में बिकेगा। पानी की बोतलों का बाजार बढ़ता जा रहा है। जितनी बिक्री बढ़ती है, उतनी ही मनमोहन सिंह की जी.ड़ी.पी (राष्ट्रीय आय) बढ़ती है। इसका मुनाफा भी जबरदस्त है। दो पैसे का पानी, पचास पैसे की पैकिंग और 12 रुपये की बोतल। इससे बढ़िया कमाई दुनिया में और क्या होगी ? और इस लूट में दो विदेशी अमरीकी कंपनिया सबसे ऊपर हैं। कोका कोला और पेप्सीको कंपनियों की दोनो ब्रांडों- किनले व एक्वाफिना- की ही बिक्री सबसे ज्यादा है। किंतु इस लूट के अलावा पानी के बाजार का एक और मतलब है। वह यह है कि जिसके पास पैसा होना, उसी को पानी मिलेगा। जिसके पास पैसा नहीं होगा, उसे पानी का भी हक नहीं होगा। इससे ज्यादा बर्बरता और क्या हो सकती है ? क्या यही सपना हमनें देखा था ? हमनें तो सपना यह देखा था कि आधुनिक युग में हर व्यक्ति की बुनियादी जरुरतें पूरी होगी। कोई भूखा नहीं रहेगा, कोई फूटपाथ पर नहीं सोएगा, कोई अशिक्षित नहीं रहेगा, इलाज के अभाव में किसी की मौत नहीं होगी। हमने क्या सोचा था ? और कहाँ पहुँचे हैं ? यह कौन सी सभ्यता है ? कभी हमारे देश मंे शिक्षक और चिकित्सक बहुत सम्मान के अधिकारी होते थे। आज वे घृणा और आक्रोश के पात्र बनते जा रहे हैं। क्योंकि वे बाजार के दास हो चुके है, लालच उनका आदर्श बनता जा रहा है। ऐसी घटनाएं आम होती जा रही है कि निजी अस्पताल से लाश तक नहीं उठने दी जाती है – पैसा दो और लाश ले जाओ। लालच और मुनाफा इस सभ्यता की बुनियादी चीजें हैं।
दुनिया के सारे शिक्षाशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिए। किंतु भारत के बच्चों पर विदेशी भाषा माध्यम थोपने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है, क्योंकि देश में अंग्रेजी का बोलबाला बना हुआ है। यह बच्चों के ऊपर बड़ा अत्याचार है । उनके ऊपर दौहरा बोझ आ जाता है- पहले भाषा समझना और फिर विषय को समझना । उसका तो नंबर ही नहीं आता है और बच्चे रटने की कोशिश करते हैं। किंतु एक विदेशी भाषा में रटना और भी मुश्किल है। दुनिया का कोई भी देश एक विदेशी भाषा को लाद कर आगे नहीं बढ़ पाया है । किंतु भारत जैसे गुलाम दिमाग वाले देश फिर भी वही करने की फिजूल कोशिश कर रहे हैं।
बच्चों पर अत्याचार, स्पर्धा के इस युग के चलते भी हो रहा है। हमने बच्चों का बचपन छीन लिया है। छुटपन से ट्यूशन, कोचिंग, होमवर्क व बस्ते के बोझ के साथ उसे स्पर्धा की तैयारी में झौंक दिया जाता है। जो बच्चे किसी भी कारण से इस अंधी दौड़ में पहले और दूसरे नंबर पर नहीं रह पाते है, वे कुंठित, हीनभावनाग्रस्त और अवसादग्रस्त हो जाते हैं। बच्चों में किताबी ज्ञान को रटने के अलावा कई तरह की अन्य प्रतिभाएं हो सकती हैं। वे एक अच्छे कलाकार, संगीतकार, खिलाड़ी, मिस्त्री या किसान भी हो सकते हैं। समाज में सब की जरुरत है। किंतु इन सब प्रतिभाओं का तिरस्कार करके बाबू और अफसर तैयार करने वाली शिक्षा पद्धति को हमने आज भी जारी रखा है। शिक्षा ही नहीं, अंग्रेजी राज का प्रशासन, कानून, न्याय सबका पूराना केन्द्रीकृत ढ़ांचा आज भी चल रहा है। उन्नीसवीं सदी के ढ़ांचों को हम इक्कीसवीं सदी में ढ़ो रहे हैं।
गांधी के तीन कथन
सवाल यह है कि विकल्प क्या है? पहले तो यह समझना होगा कि गड़बड़ी बहुत गहरी है। दोष आधुनिक सभ्यता की अंधी नकल और विकास की दिशा में है। इसका विकल्प खोजने के लिए महात्मा गांधी के तीन उद्धरण हमारे मददगार हो सकते हैं। ये तीनों सूत्र मार्गदर्शक का काम कर सकते हैं।
एक, कुदरत में सबकी जरुरतों को पूरा करने की गुंजाईश तो हैं, किंतु एक इंसान के भी लालच के लिए जगह नहीं है। ;
दो, जब कभी तुम दुविधा में हो, फैसला न कर पा रहे हो, तो आखिरी व्यक्ति को ध्यान में लाओ कि उसके ऊपर क्या असर पड़ेगा। इसे गांधी जी ने अचूक ताबीज कहा था।
तीन, गांधी जी का तीसरा कथन कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर से संवाद में कहा गया था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि क्या आप देश को कूपमंडूक बनाना चाहते हौ? क्या विदेशों से कोई लेनदेन व समन्वय-संवाद नहीं चाहते हो ? जबाव में गांधी जी ने कहां-
’‘मैं भी नहीं चाहता कि मेरा घर चारों तरफ दीवारों से घेर दिया जाए और खिड़िकयाँ भी बंद कर दी जाए । मैं चाहता हूँ कि सब देशों की संस्कृतियों की खुली हवा मेरे घर के आसपास खुले रुप से बहती रहे। किंतु आंधी से मेरे पैर ही उखड़ जाए, यह मूझे मंजूर नहीं है। मैं दूसरों के घर में घूसपैठिए, भिखारी या गुलाम बनकर रहने से इंकार करता हूँ।‘‘
इन तीन सूत्रों को लेकर यदि कोई नया भारत बनता है तो उसका भविष्य उज्जवल हो सकता है। तब एक बार फिर भारत पूरी दुनिया को नई दिशा दे सकेगा। किंतु यदि हम मौजूदा आत्मघाती रास्ते पर ही चलते रहें, तो इक्कीसवीं सदी में भारत का कोई भविष्य नहीं है। समय तो आगे बढ़ता जाएगा, किंतु हम आगे बढ़ेंगें या पीछे जाऐंगे, यह सवाल बहुत गहरे रुप से आज हमारे सामने है। इस सवाल पर आज हम सबको गहराई से सोचना है।
धन्यवाद ।
(भारतीय ज्ञानपीठ, उज्जैन द्वारा आयोजीत पद्यमभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन स्मृति अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला 2010 में 29 नवंबर 2010 को दिया गया व्याख्यान)
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Prabavshalee …aur Marmik !
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