आज सुबह से तमाम हत्यारे भाई दिमाग में घूम रहे हैं । अपनी बहन की हत्या करने वाले । पिछले साल भर में ऐसे हत्यारों की तादाद का कोई अन्दाज है ? निश्चित तौर पर अब तक की सर्वाधिक संख्या रही होगी , इस प्रकार के जुर्म करने वालों की। जिनकी बहनों ने अपनी पसंदगी से शादी की , कईयों ने अपने गोत्र में की – यह अपराध उनके भाइयों के आन-बान-शान पर इतना बड़ा धब्बा था कि इन तरुण जोड़ों की जान ले ली जाए ।
आज रक्षा बन्धन के मौके पर समाज में तेजी से बढ़ी इस बीमारी के मद्देनजर लोहिया को याद कर रहा हूँ :
हिन्दुस्तान आज विकृत हो गया है ; यौन पवित्रता की लम्बी चौड़ी बातों के बावजूद , आमतौर पर विवाह और यौन के सम्बन्ध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं ।
… नाई या ब्राह्मण के द्वारा पहले जो शादियाँ तय की जाती थीं उसकी बनिस्बत फोटू देख कर या सकुचाती शरमाती लड़की द्वारा चाय की प्याली लाने के दमघोंटू वातावरण में शादी तय करना हर हालत में बेहुदा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी घोड़े को खरीदते समय घोड़ा ग्राहक के सामने तो लाया जाए , पर न उसके खुर छू सकते हैं और न ही उसके दाँत गिन सकते हैं ।
..लड़की की शादी करना माँ बाप की जिम्मेदारी नहीं ; अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दे देने पर उनकी जिम्मेदारी ख़तम हो जाती है । अगर कोई लड़की इधर उधर घूमती है और किसी के साथ भाग जाती है और दुर्घटना वश उसके अवैध बच्चा , तो यह औरत और मर्द के बीच स्वाभाविक सम्बन्ध हासिल करने के सौदे का एक अंग है , और उसके चरित्र पर किसी तरह का कलंक नहीं ।
लेकिन समाज क्रूर है । और औरतें भी बेहद क्रूर बन सकती हैं । उन औरतों के बारे में , विशेषत: अगर वे अविवाहित हों और अलग अलग आदमियों के साथ घूमती फिरती हैं , तो विवाहित स्त्रियां उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं उसे देख कर चिढ़ होती है । इस तरह के क्रूर मन के रहते मर्द का औरत से अलगाव कभी नहीं खतम होगा।
….समय आ गया है कि जवान औरतें और मर्द ऐसे बचकानेपन के विरुद्ध विद्रोह करें । उन्हें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि यौन आचरण में केवल दो ही अक्षम्य अपराध हैं : बलात्कार और झूठ बोलना या वादों को तोड़ना । दूसरे को तकलीफ़ पहुँचाना या मारना एक और तीसरा भे जुर्म है,जिससे जहां तक हो सके बचना चाहिए।
…. धर्म , राजनीति , व्यापार और प्रचार सभी मिल कर उस कीचड़ को संजो कर रखने की साजिश कर रहे हैं जिसे संस्कृति के नाम पुकारा जाता है । यथास्थिति की यह साजिश अपने आप में इतनी अधिक शक्तिशाली है कि उससे बदनामी और मौत होगी । मुझे पूरा यकीन है है कि मैंने जो कुछ लिखा है उसका और भी भयंकर बदला चुकाया जाएगा , चाहे यह लाजमी तौर पर प्रत्यक्ष या तात्कालिक भले ही न हो ।
जब जवान मर्द और औरतें अपनी ईमानदारी के लिए बदनामी झेलते हैं , तो उन्हें याद रखना चाहिए कि पानी फिर से निर्बन्ध बह सके इसलिए कीचड़ साफ़ करने की उन्हें यह कीमत चुकानी पड़ती है ।
आज जाति और योनि के इन वीभत्स कटघरों को तोड़ने से बढ़ कर और कोई पुण्यकार्य नहीं है। वे सिर्फ इतना ही याद रखें कि चोट या तकलीफ़ न पहुँचाएँ और अभद्र न हों,क्योंकि मर्द और औरत के बीच का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है । हो सकता है,हमेशा इससे न बच पायें। किन्तु प्रयत्न करना कभी नहीं बंद होना चाहिए । सर्वोपरि , इस भयंकर उदासी को दूर करें,और जोखिम उठा कर खुशी हासिल करें ।
१९५३, जनवरी । (जाति-प्रथा,समता विद्यालय न्यास,हैदराबाद)
फैसला करो कि कैसा संसार रचाना है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि सबसे अच्छी बात होगी , नर-नारी के सम्बन्ध में,एकव्रत रहें, यानी एक तरफ़ पतिव्रत और दूसरी तरफ़ पत्नीव्रत । यह सबसे अच्छी चीज है ,लेकिन अगर वह नहीं रहता है तो फिर क्या अच्छी चीज है । आधुनिक दिमाग के सामने एक संकट आ गया है कि जब तक संसार रहेगा, तब तक मनुष्य रहेगा और तब तक यह आफ़त रहेगी कि बलात्कार और व्यभिचार,दो में से कोई एक प्राय: निश्चित ही रहेगा । अब किसको चाहते हो ? बलात्कार को या व्यभिचार को चाहते हो ? जिस समाज में व्यभिचार को इतना ज्यादा बुरा कह दिया जाता है कि उसको पाप सिर्फ़ नहीं नरक(मिलेगा) और उसके लिए यातना सजा ऐसी कि बहुत बुरी बुरी , उस समाज में बलात्कार हो करके रहता है और बहुत अधिक होता है। आधुनिक दिमाग पसंद करेगा वही एकव्रत वाली अवस्था को । कहीं गलत मत समझ लेना कि मैं व्यभिचार पसंद कर रहा हूँ। लेकिन फिर दूसरे नम्बर की चीज में कहेगा कि मनुष्य है ही ऐसा,तो फिर किया क्या जाए ? बलात्कारी से व्यभिचारी अच्छा। यह आगे देखू दृष्टि है ।
१९६२ ,सितम्बर


…और औरतें भी बेहद क्रूर बन सकती हैं । उन औरतों के बारे में , विशेषत: अगर वे अविवाहित हों और अलग अलग आदमियों के साथ घूमती फिरती हैं , तो विवाहित स्त्रियां उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं उसे देख कर चिढ़ होती है ।…
Ma it is out of relative deprivation of being bound to one man and lack of options for life time…
If women’s social status was not bound to men related to them through marriage and family they’ll not need to judge those different than them.
Like wise, if men’s honor did not rest in the control of women related to them through marriage and family honor killings and rape as weapon of dishonoring men won’t exist…
Great post for the occasion of rakshabandhan. These brothers chose to protect honor than sisters…
…हो सकता है,हमेशा इससे न बच पायें। किन्तु प्रयत्न करना कभी नहीं बंद होना चाहिए । सर्वोपरि , इस भयंकर उदासी को दूर करें,और जोखिम उठा कर खुशी हासिल करें ।…
Perfect message… only if the youth does not wake up half way through seeing angry or sulking mommy dear in the dream (read my family won’t accept it).
Peace,
Desi Girl