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Archive for अगस्त 18th, 2010

इस स्वतंत्रता दिवस पर जब प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा झंडा फहरा रहे थे और पूरे देश में खुशियां मनाई जा रही थी, तब राजधानी से मुश्किल सौ कि.मी. दूरी पर किसान परिवार मातम मना रहे थे। पिछली शाम को वहां पुलिस की गोली से तीन किसान मारे गए और दर्जनों घायल हुए। पुलिस का एक जवान भी इस हिंसा में मारा गया। किसानों की जमीन नोएडा (दिल्ली) से आगरा के बीच बन रहे यमुना एक्सप्रेस वे में जा रही है। वे अपनी जमीन का मुआवजा बढ़ाने की मांग कर रहे थे। इस गोलीचालन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके मुआवजे में कुछ बढ़ोत्तरी की घोषणा भी कर दी। क्या यह हमारी सरकारों का नियम ही बन गया है कि जब तक खून-खराबा न हो और दो-चार लोगों की जान न जाए, वह जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देती ?
यमुना एक्सप्रेसवे उत्तरप्रदेश की मायावती सरकार की दो महत्वाकांक्षी सड़क योजनाओं में से एक है। दूसरी है गंगा एक्सप्रेसवे। नोएडा से आगरा तक 165 कि.मी. की आठ-लेन की सड़क बनाने का ठेका देश की सबसे बड़ी ठेकेदार कंपनी जेपी समूह को दिया गया है। इस में 42 छोटे पुल, 1 बड़ा पुल और एक रेलपुल के साथ 10 टोल नाके होंगे। इतना ही नहीं, इसके साथ आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त 49 वर्ग कि.मी. में फैली पांच बड़ी नगरीय बस्तियां भी विकसित की जाएगी। इसके किनारे सेज व औद्योगिक कॉम्प्लेक्स भी बनाए जाएंगे। जेपी कंपनी की असली कमाई दिल्ली के नजदीक बनने वाली इस विशाल जमीन-जायदाद में ही है। इस योजना के लिए ली जाने वाली किसानों की जमीन की मात्रा भी इसके कारण काफी बढ़ गई है। इस योजना से नोएडा, ग्रेटर नोएडा, आगरा, मथुरा, अलीगढ़ और हाथरस जिलों के 334 गांवो के करीब 50 हजार किसान प्रभावित हो रहे हैं।
गंगा एक्सप्रेसवे की योजना इससे काफी बड़ी है। नोएडा (दिल्ली) से बलिया तक गंगा किनारे बनाए जाने वाले एक्सप्रेसवे में एक कि.मी. चौड़ी भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा और इसके साथ ही नगरीय बस्तियां, सेज ( विशेष आर्थिक क्षेत्र ), होटल, रेस्तरां, पेट्रोल पंप आदि बनाए जाएंगे। इस का ठेका भी जेपी कंपनी को दिया गया है। ये दोनों एक्सप्रेसवे बनने के बाद संभवतः रिलायन्स और जेपी ये दो कंपनियां इस देश में शहरी जायदाद की सबसे बड़ी मालिक और जमींदार बन जाएंगी। किन्तु बड़ा सवाल यह है कि यदि मात्र 165 कि.मी. के यमुना एक्सप्रेसवे के लिए इतना बड़ा विस्थापन और खून खराबा हो रहा है तो 1047 कि.मी. के गंगा एक्सप्रेसवे में पता नहीं क्या होगा ?

अमीरों की सुविधा के लिए कितना विनाश

यमुना एक्सप्रेसवे के बारे में कहा जा रहा है कि इसके बन जाने से आगरा से दिल्ली पहुंचने में 90 मिनिट की बचत होगी। इसी तरह का तर्क गंगा एक्सप्रेसवे के लिए भी दिया जा रहा है। किन्तु भारी टोल-शुल्क के कारण इन राजमार्गों पर तो मुख्यतः अमीर कार-मालिक ही चल पाएंगे या फिर डीलक्स एसी बसें चलेंगी। क्या देश के मुट्ठी भर अमीरों के ऐश-आराम के लिए, उन्हें जल्दी पहुंचाने के लिए इतने बड़े पैमाने पर कृषि भूमि को नष्ट करना और किसानों को बेदखल करना जरुरी है ? पिछले कुछ सालों से देश में राजमार्गों और एक्सप्रेसमार्गों के ताबड़तोड़ निर्माण और विस्तार का एक पागलपन चल रहा है, जिस पर पुनर्विचार करने का वक्त आ गया है।
देश का पहला एक्सप्रेस-मार्ग संभवतः मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे था जो 2001 में बनकर पूरा हुआ। यह 94 कि.मी. लंबा है और इस पर 2136 करोड़ रु. खर्च हुए। इसमें भी कई गांवो और आदिवासियों की जमीन गई और यह शुरु से विवादास्पद रहा। चूंकि मुंबई व पुणे के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग नं० 4 का पुराना रास्ता भी चालू रहा, कई वर्षों तक एक्सप्रेसवे पर चलने वाली गाड़ियों की संख्या उम्मीद से कम रही। इसे बनाने वाला महाराष्ट्र सड़क विकास निगम काफी घाटे व करजे में आ गया। तब 2004 में इसे तथा राष्ट्रीय राजमार्ग नं० 4 दोनों को एक निजी कंपनी को दे दिया गया। देश में राजमार्गों का यह पहला निजीकरण था। किन्तु इसने मुंबई और पुणे के बीच यात्रा करने वालों को स्थायी रुप से दो हिस्सों में बांट दिया। अमीरों के लिए जनसाधारण से अलग सड़क बन गई।

अमीर अलग, गरीब अलग

अमीरों और साधारण लोगों में तेजी से बढ़ता अलगाव और बढ़ती खाई उदारीकरण के इस जमाने की खासियत है। एक्सपे्रस मार्गों और राजमार्गों पर तो बैलगाड़ियां व साईकिलें चल भी नहीं सकती है। ऐसे कई मार्ग जमीन से काफी ऊपर उठे रहते हैं, तथा उनके दोनों तरफ दीवालें बना दी जाती हैं, ताकि कोई स्थानीय गांववासी, पशु या वाहन उनमें घुसकर अमीरों की यात्रा में खलल न डाले। इन राजमार्गों से अक्सर गांवो को आपसी आवागमन मुश्किल हो जाता है। किसानों को अपने घर से खेत तक बैलों या ट्रैक्टर से जाने के लिए काफी घूम कर जाना पड़ता है।
देश में जहां भी एक्सप्रेसवे बन रहे हैं या राजमार्गों का चैड़ीकरण हो रहा है या उनके लिए नए बायपास बन रहे हैं, स्थानीय लोगों के लिए संकट आ रहा है तथा विरोध हो रहा है। सड़कों के कारण इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा, पहले कभी सोचा भी नहीं जा सकता था। बंगलौर-मैसूर एक्सप्रेसवे के खिलाफ किसानों का आंदोलन पिछले तीन सालों से चल रहा है। पूरे केरल को दो भागों में बांटने वाले दो मीटर ऊंचे केरल एक्सप्रेसवे के खिलाफ भी जोरदार जन आंदोलन खड़ा हो गया है। कई जगह गांववासियों, विधायकों और विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि 60 मीटर यानी 200 फीट चैड़ी सड़क बनाने की क्या जरुरत है ? हमारे मंत्री और अफसर शायद संयुक्त राज्य अमरीका की सड़कें देखकर आए हैं, तथा उसकी नकल करना चाहते हैं। किन्तु वे यह भूल गए हैं कि अमरीका में आबादी का घनत्व काफी कम है तथा जमीन बहुतायत में उपलब्ध है। नकल में अकल लगाने की जरुरत उन्होंने नहीं समझी।

राजमार्ग निर्माण सर्वोच्च प्राथमिकता

पिछले पांच-छः वर्षों से भारत सरकार देश के कई अन्य जरुरी कामों को छोड़कर सिर्फ सड़कें राजमार्ग और एक्सप्रेसवे बनाने में लगी है। और देश के संसाधनों का बड़ा हिस्सा उसमें लगा दिया है। छः वर्ष पहले ‘राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम‘ शुरु किया गया तथा उसे क्रियान्वित करने के लिए ‘भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण’ बनाया गया। ‘सुनहरा चतुर्भुज’ यानी देश के चारों महानगरों – दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चैन्नई को जोड़ने वाले राजमार्गों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। फिर उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम कोरिडोर और बंदरगाहों को जोड़ने वाले मार्गों को 4 लेन या 6 लेन मार्ग बनाने का काम किया गया। इसके अतिरिक्त, देश के सारे राष्ट्रीय राजमार्गों को चार लेन या मानक दो लेन बनाने का काम भी चल रहा है। देश के कई हिस्सों में ‘फोर लेन’ तथा ‘बायपास’ के अंग्रेजी शब्द आम बोलचाल में आ गये हैं। नबंवर 2009 तक सब मिलाकर 33,642 कि.मी. राजमार्ग निर्माण या उन्नयन के लक्ष्य में से 12,531 कि.मी. चार लेन बनाया जा चुका था और 5,995 कि.मी. पर काम चल रहा था। अब अगले पांच वर्षों में 7000 कि.मी. प्रतिवर्ष की दर से 35,000 कि.मी. राजमार्ग बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। जमीन अधिग्रहण के काम में तेजी लाने के लिए देश में 192 विशेष भूमि-अधिग्रहण इकाईयां बनाई जा रही है।
एक्सप्रेस-मार्ग निर्माण का भी महत्वाकांक्षी कार्यक्रम हाथ में लेते हुए 2022 तक तीन चरणों में देश में 18,637 कि.मी. एक्सप्रेस-मार्ग बनाने का लक्ष्य रखा गया है। एक ‘राष्ट्रीय एक्सप्रेस-मार्ग नेटवर्क’ बनाने की योजना है। ‘भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण’ में एक एक्सप्रेस-मार्ग विभाग बनाया गया है तथा अलग से ‘भारतीय एक्सप्रेस-मार्ग प्राधिकरण’ बनाने पर भी विचार किया जा रहा है।

विकास माने सिर्फ सड़कें

इनके अलावा उत्तर-पूर्व के राज्यों में सड़क विकास का एक विशेष कार्यक्रम लिया गया है, जिसमें 5,184 कि.मी. राष्ट्रीय राजमार्गों तथा 4,756 कि.मी. प्रांतीय राजमार्गों को चार-लेन या दो-लेन या उन्नत करने का लक्ष्य रखा गया है। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सड़के बनाने के लिए 1900 करोड़ रु. का एक कार्यक्रम अलग से लिया गया है। आन्ध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा और उत्तरप्रदेश के आठ राज्यों के 33 जिलों में 1202 कि.मी. राष्ट्रीय राजमार्ग तथा 4362 कि.मी. प्रांतीय राजमार्ग को इसमें शामिल किया गया है। ऐसा लगता है कि सरकार ने हर समस्या का समाधान सड़क निर्माण ही समझ लिया है।
यही बात भारत के गांवों के मामले में लागू होती है। ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना’ के तहत पिछले पांच वर्षों में (दिसंबर 2009 तक) 50,000 करोड़ रु. से ज्यादा लागत की 1,83,510 कि.मी. सड़के बनायी जा चुकी है। किन्तु दूसरी ओर गांव-विरोधी व खेती-विरोधी विकास एवं आर्थिक नीतियों के कारण गांवों में गरीबी, बेकारी, कुपोषण, शिक्षा-स्वास्थ्य की बिगड़ती हालत आदि से मुर्दानगी छाई हैं। ऐसी हालत में ये सड़कें सिर्फ देशी-विदेशी कंपनियों के सामानों की गांवों में घुसपैठ व बिक्री बढ़ाने तथा गांवों से सस्ता मजदूर शहरों में लाने का जरिया ही बन रही है। शायद यही सरकार की विकास नीति का अभीष्ट भी है।

जनता पर तिहरा बोझ

बेतहाशा सड़कें, राजमार्ग और एक्सप्रेसमार्ग बनाने के लिए पैसा कहां से आ रहा है ? खुद जनता की जेब से। रोड टैक्स तथा अन्य करों के अलावा पिछले कई सालों से भारत सरकार ने पेट्रोल एवं डीजल पर 2 रु. प्रति लीटर का अधिभार लगा रखा है। इस अधिभार से संग्रहित विशाल राशि का बड़ा हिस्सा ‘राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम’ के लिए दे दिया जाता है। इसके अतिरिक्त विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक तथा जापान भी भारत में राजमार्गों के विकास के लिए कर्ज दे रहे हैं। कर्ज की राशि कुल खर्च का बहुत बड़ा हिस्सा नहीं होती है, किन्तु उससे भारत की नीतियों और प्राथमिकताओं को तय करने और बदलने का अधिकार इन विदेशी ताकतों को मिल जाता है। ‘पीपीपी’ यानी निजी-सरकारी भागीदारी और ‘बीओटी’ यानी ‘बनाओ-चलाआ-कमाआ-वापस कर दो’ जैसी योजनाएं व तरकीबें उनके जरिये ही भारत में आई हैं, जिनसे भारत के सड़क क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी कंपनियों का पदार्पण हुआ है। यमुना एक्सप्रेसवे जैसे हादसे इसी नीति की देन है। दूसरी ओर अब लगभग हर सड़क पर चलने का टोल शुल्क कदम-कदम पर देना पड़ता है। एक तरह से भारत के लोग अब सड़कों पर चलने के लिए तिहरा शुल्क दे रहे हैं – रोड टैक्स, पेट्रोल डीजल पर अधिभार तथा टोल टैक्स।
निजीकरण से अब सरकार विदेशीकरण की ओर जाना चाहती है। भारत सरकार के भूतल-परिवहन मंत्री श्री कमलनाथ ने पिछले एक साल में यूरोप, अमरीका और सिंगापुर की यात्राएं करके विदेशी कंपनियों को भारत के राजमार्गों में पूंजी लगाने  और कमाने का न्यौता दिया। आम तौर पर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने के लिए सौ-सौ कि.मी. के टुकड़ों का ठेका दिया जाता है। किन्तु विदेशी कंपनियों को एकाधिकारी सुविधा देने के लिए अब 400 से 500 कि.मी. के महा-प्रोजेक्ट बनाए जा रहे हैं, जिनकी लागत करीब 100 करोड़ डॉलर या 5000 करोड़ रु.से कम नहीं होगी। ऐसी हालत में, भारत के सड़क-निर्माण में बड़े-बड़े ठेकेदार और कंपनियां भी प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएंगें। भारत की सड़कों पर विदेशी महा-कंपनियों का कब्जा हो जाएगा।

असली हित वाहन कंपनियों का

भारत के राजमार्गों के निर्माण में जापान की रुचि व भागीदारी का कारण भी समझा जा सकता है। भारत के वाहन उद्योग में जापान की अनेक कंपनियां मौजूद हैं, जैसे सुजुकी, यामाहा, होण्डा आदि। भारत का ऑटो-वाहन उद्योग काफी हद तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे में है। जितने राजमार्ग बनेंगे और सड़कें चिकनी बनेगी, उतनी ही ज्यादा उनकी बिक्री बढ़ेगी। भारत में पिछले कई सालों से वाहनों का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है और मंदी का भी कुछ खास असर उन पर नहीं पड़ा है। सबसे ज्यादा प्रगति कारों और मोटरसाईकिलों में हुई है, जिनकी बिक्री 20 से 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। दूसरी ओर जिस शानदार साईकिल उद्योग में भारत दुनिया में अग्रणी हुआ करता था, उसका उत्पादन नीचे जा रहा है। भारत की वाहन क्रांति दरअसल ‘कार क्रांति’ बन कर रह गई है। एक तरह से देखा जाए तो भारत के राजमार्गों व एक्सप्रेस मार्गों का विकास भी भारत की आम जनता के लिए न होकर इन वाहन कंपनियों की सेवा में ही समर्पित है। इससे भारत की राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर के आंकड़े जरुर अच्छे दिखाई दे रहे हैं जिनसे मनमोहन सिंह या मोंटेक सिंह खुश हो सकते हैं। किन्तु भारत की आम जनता के लिए यह विकास विस्थापन, विकृतियों, विनाश और विषमता की नई त्रासदियां पैदा कर रहा है।
( ईमेल – sjpsunil@gmail.com )

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लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

सम्पर्क :
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111 मोबाईल 09425040452

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