हिन्दी चिट्ठेकारी के प्रति समर्पित तीन ’जनप्रिय लेखकों” को केन्द्र में रखकर काफ़ी लिखा जा रहा है। यह तीनों लम्बे समय से चिट्ठे लिखने में सातत्य बनाये हुए हैं ,जो इस माध्यम के लिए बहुत जरूरी है । ईस्वामी , चौपटस्वामी , काकेश , देबाशीष , ईपंडित , जीतेन्द्र जैसे कितने ही धुरन्धर चिट्ठेकारों की तरह ये तीनों ठण्डे नहीं पड़ गये हैं । ये ठण्डे पड़े मित्र यदि आज भी सक्रिय होते तो चिट्ठेकारी का घटियापन निश्चित ही इतना अधिक न होता । यदि बतौर चिट्ठों के पाठक वे अब भी हिन्दी चिट्ठेकारी से जुड़े हों तो मेरे कष्ट को समझने की कोशिश करेंगे ।
बहरहाल , ज्ञानदत्त जी की बेबाक पोस्ट को देखकर मुझे बहुत खुशी हुई थी । निश्चित ही वे मेरी हार्दिक बधाई ग्रहण करें। संघ परिवार में बुद्धिमान अल्पसंख्यक हैं । उस अल्पसंख्यक तबके में दत्तोपंत ठेंगड़ी एक थे। वे ’बौद्धिकों ’ में किस्सा सुनाते थे जिसका निचोड़ होता था कि-’ किस्म-किस्म के कम्युनिस्ट एक दूसरे की आलोचना करते हैं,एक दूसरे को गलत बताते हैं। हम सिर्फ़ यह कहते हैं कि वे सब सही हैं । ’ मुझे इन जनप्रिय लेखकों के बारे में कही गयी नकारात्मक बातें बिलकुल सही लगीं ।
जिन लोगों को लग रहा है कि ज्ञानदत्तजी की प्रवि्ष्टी से काफ़ी बदमजगी हुई है वे कम -से-कम इतना मान कर चलें कि इन तीनों को कोई घातक आघात नहीं लगा होगा। कुछ समय के लिए मान लिया जाए कि मेरा अनुमान गलत है तब मेरा एक नम्र सुझाव पेश है। फ्रान्स के गांधी कहे जाने वाले लान्जा देल वास्ता के आश्रम में जब कभी आश्रमवासियों में बदमजगी होती तब आश्रमवासियों के सम्मेलन में कहा जाता कि वे उन विचारों को दिमाग में लायें जो वे जिनसे उनका विवाद है उनकी श्रद्धान्जली-सभा में लाते। इस तरकीब से अक्सर विवाद दूर हो जाते। शायद श्रद्धान्जली देते वक्त हम शत्रु की भी अच्छाई के बारे में ही सोचते हैं ,इसलिए?
चिट्ठेकारी की दुनिया व्यापक समाज की एक छोटी सी उप-व्यवस्था है । वहीं चिट्ठेकारी की अपनी भी एक छोटी सी दुनिया है। इसलिए व्यापक समाज के अन्तर्विरोधों का अक्स यहां भी दीखता है। रचनात्मक संघर्ष की जरूरत यहाँ भी होगी।



मौज लेते समय भी संघ आ ही गया।
इस अतार्किक और अनावश्यक विवाद में आपकी ही कमी थी, सो आज पूरी हो गई…
तीनों बहुत बड़े ब्लागर हैं, सो मैं तो पतली गली से कट लेता हूं…
[...] This post was mentioned on Twitter by afloo. afloo said: तीनों जनप्रिय लेखक एक दूसरे को श्रद्धांजली दे सकते हैं,क्या ?: http://wp.me/p1Qng-cS http://wp.me/p1Qng-cS [...]
बहुत सुंदर, हमें अपनी आलोचना को सदैव सम्मान देना चाहिए।
ठीक बात की है आपने
बड़ा ही क्रांतिकारी सुझाव है, खुद को ही श्रद्धांजलि…
जय हिंद…
वाह! क्या बात है! दिल खुश कर दिया आपने यह पोस्ट लगा कर!
आखिर किसी ने तो इस दृष्टि से भी सोचा!
लेकिन यह रचनात्मक संघर्ष वाली बात कुछ जमी नहीं.
और फिर इनमें किसी शत्रुता या प्रतिद्वंदता के लक्षण भी कम-से-कम मुझे तो कभी नहीं दिखे. समर्थकों ने जो जूतमपैजार की उसकी बात अलग है.
ये ठण्डे पड़े मित्र यदि आज भी सक्रिय होते तो चिट्ठेकारी का घटियापन निश्चित ही इतना अधिक न होता । यदि बतौर चिट्ठों के पाठक वे अब भी हिन्दी चिट्ठेकारी से जुड़े हों तो मेरे कष्ट को समझने की कोशिश करेंगे ।
आपकी इन पंक्तियों में कुछ तो है जो समझा तो जा सकता है मगर बयाँ से बाहर है ख़ैर।
apan to is mudde par dineshray jee se sehmat hain
आपसे सहमति है. संघर्ष अगर रचनात्मक है तो वह सुधारात्मक होगा और उसके बुरे परिणाम क्योंकर होंगे . तीनों बहुत समझदार और सुलझे हुए व्यक्ति है. सच को सच की तरह कहा जाय तो सच को सच की तरह लेना चाहिए. भले ही वह आलोचनात्मक क्यों न हो.
न लिख पाने के लिए शर्मिंदा हूं . वादा करने की कोई तुक नहीं है, पर कोशिश करूंगा.
इससे एक बात जो समझ में आई वह यह कि ब्लॉगजगत इस बहुत संवेदनशील है। बेबात भड़कने की अद्भुत क्षमता है ब्लॉग जगत में।
खुद को श्रृद्धांजलि (अश्रुपूरित) देकर दो ठो अगरबत्ती जलाकर माला पहिने और आँख मींचे बैठे हैं, आपकी सलाह पर. और बताईये.
@ समीर लाल ,
मेरे सुझाव में अन्य दोनों जनप्रिय लेखकों को भी श्रद्धांजली देनी होगी।
खुद को दी यह शायद उससे भी ऊँची बात है ।
सप्रेम,
इतना हल्ला मचते देख पहले तो हम कन्फ्यूजिया गये थे के कही ब्लॉग शलोग पे कोई पदम- श्री तो नहीं मिल रहा जो इत्ती सर फुट्टवल हो रही है …
पुरूस्कार बांटने की परम्परा तो कई महीनो से चल रही है ….रोज सुबह उठ कर देखता हूँ…..कोई भला आदमी उठकर घोषणा कर देता है ….फलां पुरूस्कार के विजेता .फलां……लोग पुरुस्कार लेकर बैठ जाते थे …..प्यार -मोहब्बत से वितरण समारोह निबट जाता था … ……अब हल्ला काहे ??????? कन्फ्यूज़न !!!!!!!
दो दिन पहले शहर में एक जगह जाम लगा था ..मालूम चला के एक गेट से फलां बाबा जी निकल रहे थे ….गाड़ी में बैठ कर .दूसरी तरफ से एक स्कूटर वाला आ रहा था …फोन पे बात करता हुआ …….बदकिस्मती से टकरा गया …बस बाबा जी के अपमान का शोर मच गया !!!! लाठिया लेकर लोग निकल पड़े ..बड़ी मुश्किल से बाबा जी ने समझाया …..तब बात बनी…भले आदमी थे बेचारे बाबा जी…..बस भक्त थोड़े इमोशनल हो जाते है …..
हम तो कहते है तीनो को आजीवन महान ब्लोगर घोषित कर दो……तीन साल ब्लोगिंग में होने को आये ओर ..अनूप शुक्ल ……समीर लाल …..ओर ज्ञानदत्त पांडे को मैंने भी महापुरुष नहीं माना……अब इतना हल्ला मचा तो सोचा फोटो देखूं…कही पीछे एक प्र्जवालित आभा मंडल तो दिखाई न दे रहा …..नहीं दिखा .लेप टॉप हिलाया तसदीक हो गयी…..कोई आभा मंडल नहीं है…एक ठो माइक्रोस्कोप लगायी ….तो भी नहीं……..
फिर कन्फ्यूज़न !!!!
वो थ्योरी थी… ….”चिरकुटाई के लिए कोई उम्र नहीं होती “….उसके लेखक को हेंस प्रूव्ड कहने का मन है !!
देखें :
http://samakaal.wordpress.com/2010/05/16/self-analysis-friendship/
तिकड़ी के मध्य संघ परिवार का आना समझ के परे है, आप तीन का नाम ले रहे है किन्तु आप स्वयं को भूल जाते है मेरा मानना है कि आप किसी अन्य हिन्दी चिट्ठाकारों से कम योगदान आपका नही रहा है। आप भी यहाँ 4 सालो से टिके हुये है ये भी कम नही है।
मै आपसे इस बात से सहमत हूँ कि हीं चिट्ठेकारी की अपनी भी एक छोटी सी दुनिया है यह एक दुनिया ही नही एक बृहद परिवार है।
क्या भाई प्रमेन्द्र !
संघ परिवार के ठेंगड़ी जी के बौद्धिक की लाईन से भी आपत्ति ? बिना आदेश-निर्देश के आपत्ति न प्रकट किया करो !
[...] डॉ. अनुराग की टिप्पणी [...]
ढेर मौज लेते हैं! अब अपनी श्रद्धांजलि भी करें। कोई भला काम बताया जाये।
रचनात्मक संघर्ष की जरूरत यहाँ भी होगी।.nice
इस विवाद पर बेहतर सोच !
सुन्दर प्रविष्टि ! आभार ।
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