कुछ साल पहले की बात है। उड़ीसा के कालाहांडी जिले के लांजीगढ़ क्षेत्र में नियमगिरी के पहाड़ों में बॉक्साईट खुदाई की वेदान्त कंपनी की परियोजना का काफी विरोध हो रहा था। यह काफी विवादास्पद बन गई थी। तभी खबर आई कि वेदान्त कंपनी पुरी के पास 10 हजार एकड़ भूमि में 15000 करोड़ रु. की लागत से एक विशाल विश्वविद्यालय बनाएगी। तब बात कुछ समझ में नहीं आई। मुनाफा कमाने पर पूरी तरह केन्द्रित एक व्यावसायिक कंपनी इतना पैसा शिक्षा पर क्यों लगाएगी ? शायद अपने विरोध को कम करने के लिए तथा उड़ीसा के नागरिक समाज में समर्थन जुटाने के लिए कंपनी ने समाज-सेवा का यह काम चुना है। किन्तु उसके लिए भी इतना ज्यादा पैसा खर्च करने की क्या जरुरत है ?
अब धीरे – धीरे यह गुत्थी सुलझ रही है। वेदान्त विश्वविद्यालय ने जिन आधा दर्जन गांवो की जमीन जा रही है, वहां के ग्रामीणों द्वारा इसके विरुद्ध संघर्ष समिति बनाकर आंदोलन किया जा रहा है। इस संघर्ष समिति ने जो जानकारी उपलब्ध कराई है, वह आंख खोलने वाली है। विरोध के कारण वेदान्त विश्वविद्यालय को दी जाने वाली जमीन का रकबा कुछ कम हो गया है, किन्तु फिर भी पुरी शहर के पास, समुद्र किनारे, पुरी-कोणार्क मरीन ड्राईव के बगल में, छः हजार एकड़ से ज्यादा बेशकीमती जमीन बहुत सस्ती दरों पर इस विश्वविद्यालय के नाम पर दी जा रही है। इस मायने में यह अभी तक देश का सबसे ज्यादा जमीन हड़पने वाला विश्वविद्यालय होगा। अभी तक देश में विश्वविद्यालयों या अन्य षिक्षा संस्थानों के जो सबसे बड़े परिसर हैं, उनसे कम से कम तीन-चार गुने से ज्यादा क्षेत्रफल में इसका परिसर होगा। (देखें बॉक्स) इसकी मालिक अनिल अग्रवाल फाउन्डेशन नामक एक निजी कंपनी होगी, जिसके चार संयुक्त मालिकों में से तीन वेदान्त कंपनी के मालिक अनिल अग्रवाल के परिवार के लोग है। इस भूमि पर यह कंपनी एक पूरा नगर भी विकसित करेगी। यहां पर स्कूल, मनोरंजन केन्द्र, आवासीय कालोनी, दुकानें, बाजार , बगीचे, सांस्कृतिक केन्द्र, आदि भी विकसित किए जाएंगे। बिजली आपूर्ति के लिए 600 मेगावाट का एक विषाल बिजली संयंत्र भी लगाने की वेदान्त कंपनी की योजना है।
उड़ीसा सरकार ने जमीन के अतिरिक्त प्रतिदिन 11 हजार लीटर पानी भी उपलब्ध कराने का वायदा किया है। पुरी जिले की पूरी आबादी को जितना पानी दिया जाता है, यह उसके 95 प्रतिशत के बराबर है। जाहिर है कि यह विश्वविद्यालय जमीन के अलावा स्थानीय आबादी का पानी भी हड़पने वाला है। उड़ीसा सरकार ने भुवनेश्वर हवाई अड्डे से इस विश्वविद्यालय तक चार लेन वाली सड़क भी बनाने का वादा किया है, जो करीब 60 कि.मी. लंबी होगी। इतना ही नहीं इस विश्वविद्यालय के नाम पर की जाने वाली समस्त खरीदी, निर्माण, अनुबंधों और व्यावसाय को आने वाले 20 वर्षों तक वेट, प्रवेष कर, स्टाम्प शुल्क आदि तमाम करों से मुक्त करने का भी वायदा उड़ीसा सरकार ने कर रखा है। उस पर तुर्रा यह भी कि इस विश्वविद्यालय को पूरी स्वायत्तता होगी और प्रशासन, विद्यार्थियों का दाखिला, फीस निर्धारण, पाठ्यक्रम, शिक्षकों की नियुक्ति आदि में पूरी आजादी होगी। किसी भी प्रकार का आरक्षण भी नहीं होगा। उड़ीसा सरकार और वेदान्त कंपनी के बीच 19 जनवरी 2006 को हुए समझौते में ये सब बातें स्पष्ट रुप से लिखी हैं।
बात बहुत साफ है । वेदान्त कंपनी के मालिक पूंजीपति के लिए वेदान्त विश्वविद्यालय की यह योजना कोई घाटे का सौदा नहीं हैं। न ही यह उसके एल्युमीनियम व्यवसाय के सामाजिक – पर्यावरणीय दुष्परिणामों को ढकने के लिए किया जा रहा परोपकार या समाजसेवा का उपक्रम है। यह तो अपने आप में भारी कमाई का एक शुद्ध व्यावसायिक प्रोजेक्ट है। विशेष आर्थिक जोन के कारखाने, टाटा की नैनो कार या वैश्वीकरण के इस दौर की अन्य परियोजनाओं की भांति इसमें भी सस्ती जमीन, कर छूट और सरकारी अनुदान के साथ भारी मुनाफा कमाने की पूरी आजादी निजी पूंजीपतियों को मिल रही है। ‘लागत सरकार (जनता) की और मुनाफा पूंजीपतियों का’ – पूंजीवाद का यह चिरंतन सूत्र पूरी बेहयाई से यहां भी लागू हो रहा है।
वेदान्त के मालिक ने इसमें एक तीर से कई शिकार किए हैं। पुरी नगर के पास महंगी जमीन को सस्ती दरों पर विषाल मात्रा में पाकर वह उसका व्यवसायिक उपयोग करके भी कमाई करेगा और शिक्षा का व्यवसाय भी चलाएगा। फीस निर्धारण और छात्र-षिक्षक चुनने की पूरी आजादी देकर उड़ीसा सरकार ने यह भी सुनिश्चित कर दिया है कि इस कथित ‘विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय’ का चरित्र पूरी तरह अभिजात्य होगा और इसके दरवाजे उड़ीसा जैसे गरीब प्रांत की 95 प्रतिशत जनता के लिए बंद होंगे।
वेदान्त विश्वविद्यालय दरअसल भारत में शिक्षा के तेजी से बढ़ते निजीकरण और व्यवसायीकरण का एक नमूना है। इससे कंपनी-सह-विष्वविद्यालय की नई प्रजाति अस्तित्व में आई है। देष में ऐसे कई निजी स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की बाढ़ आती जा रही है, जिनका एकमात्र मकसद मुनाफा कमाना है। उनकी कमाई इतनी है कि वे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन देते हैं। नगरों व महानगरों में बड़े-बड़े विज्ञापन वाले होर्डिंग लगाने में वे कार या मोबाईल कंपनियों से भी आगे निकल गए हैं। शिक्षा का यह घोर निजीकरण उस पुरानी निजी भागीदारी से अलग है, जिसमें समाजसेवा की कुछ भावना हुआ करती थी। पहले स्थापित हुए बिड़ला के पिलानी संस्थान या मुंबई में टाटा के संस्थानों की बात अलग थी। अब तो षिक्षा देष में सबसे तेज बढ़ता हुआ और संभवतः सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाला उद्योग बन गया है। मंत्री, नेता, व्यापारी, बनिए, फर्में, कंपनियां और बड़े उद्योगपति घराने सभी इस में कूद पड़े हैं। मुनाफे, लूट और षोषण के इस खेल में अब परोपकार या सेवा का कोई घालमेल नहीं हैं, कोई दिखावा भी नहीं है।
भारत सरकार षिक्षा के इस ‘मुक्त बाजार’ कोे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध और समर्पित है। यों तो इसके संकेत एक दषक पहले ही मिल गए थे, जब सरकार ने षिक्षा में ‘सुधार’ का सुझाव देने के लिए अंबानी-बिड़ला समिति बनाई थी। किन्तु भारत के नए मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के आने के बाद तो षिक्षा के व्यवसायीकरण – कंपनीकरण की गाड़ी अभूतपूर्व तेजी से दौड़ाने लगी है। विदेषी विष्वविद्यालयों को अनुमति देने का कानून बनने पर इसे और गति मिल जाएगी। ‘निजी-सार्वजनिक भागीदारी’ मंे जो स्कूल चलाने की बात हो रही है, उसमें भी जमीन हड़पने और सरकारी अनुदान पर निजी मुनाफा कमाने का ही काम होगा। नगरों व महानगरों के सरकारी स्कूलों की कीमती जमीन निजी हाथों में देने की योजनाएं बन चुकी हैं। भारत सरकार ने बैंको से षिक्षा ऋण दिलवाने और उसमंे ब्याज अनुदान देने की जो योजना चलाई है, वह भी दरअसल इन निजी व्यवसायिक षिक्षण संस्थानों की महंगी फीस भरने की सुविधा के लिए है। योजना आयोग ने एक ‘राष्ट्रीय षिक्षा वित्त निगम’ बनाने का भी प्रस्ताव किया है, जो विद्यार्थियों के साथ-साथ निजी षिक्षण संस्थानों को भी सस्ती दरों पर ऋण दिलवाएगा। कुल मिलाकर, शिक्षण संस्थानों को दुकानों व कारखानों में बदलने का काम तेजी से हो रहा है। लगभग ऐसा ही खेल स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहा है। भारत की राष्ट्रीय आय की ऊँची वृद्धि दर षायद इसी तरह से हासिल हो रही है।
शिक्षा के इस बढ़ते बाजार में दो ही किन्तु – परन्तु हैं। एक तो यह कि इसमें षिक्षा का स्वरुप भी बाजारु ही होगा, जिसका व्यक्ति, समाज और देष की जरुरतों से कम ही संबंध रहेगा और जो पूरी तरह बाजार व कंपनियों की जरुरतों को समर्पित रहेगी। वैसे तो अभी तक भी भारत की शिक्षा काफी दमघोंटू, घटिया, नकलची और जमीन से कटी रही है। किन्तु बाजारीकरण से इसकी विकृतियां और बढ़ जाएगी। दूसरा शिक्षा का यह बाजार बहुत बड़ी संख्या में इस गरीब देष के बच्चों को बहिष्कृत, कुंठित, तिरस्कृत करता जाएगा। सरकार चाहे सर्व शिक्षा अभियान चला ले और चाहे शिक्षा अधिकार कानून बना ले, शिक्षा के व्यवसायीकरण का मतलब देष के साधारण बच्चों व युवाओं को शिक्षा से वंचित करना और पछाड़ना है। क्या ये दोनों हालात दे्श के लिए चिन्ता की बात नहीं है ?
सुनील
लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111
मोबाईल 09425040452
शिक्षा और जमीन
वेदान्त विश्वविद्यालय के साथ ही शिक्षा भी अब जमीन हड़पने और किसानों को विस्थापित करने का एक जरिया बन रही है। देश व दुनिया के कुछ बड़े शिक्षण परिसरों का क्षेत्रफल इस प्रकार है: -
शिकागो विश्वविद्यालय 211 एकड़
हार्वर्ड विश्वविद्यालय 380 एकड़
प्रिंसटन विश्वविद्यालय 600 एकड़
वाशिंगटन विश्वविद्यालय 643 एकड़
भारतीय तकनालाजी संस्थान, दिल्ली 320 एकड़
भारतीय तकनालाजी संस्थान, चेन्नई 625 एकड
भारतीय तकनालाजी संस्थान, गुवाहाटी 712 एकड़
भारतीय तकनालाजी संस्थान, कानपुर 1055 एकड़
भारतीय तकनालाजी संस्थान, दिल्ली 320 एकड़
उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर 400 एकड़
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली 1000 एकड़
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी 1300 एकड़
केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद 2300 एकड़
(प्रस्तावित) वेदांत विश्वविद्यालय, पुरी 6270 एकड़


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