क्या पहली अप्रैल को पूरे देश को मूर्ख बनाया जा रहा है ?
1 अप्रैल 2010 को देश में ‘मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून’ लागू हो रहा है। यह बताया जा रहा है कि यह एक क्रांतिकारी काम है। इससे देश के सारे बच्चों को शिक्षित करने का काम हो जाएगा। लेकिन सच क्या है ? आइए, विचार करें -
* इस कानून की शर्तें पूरी करने के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति तो हो रही है, किन्तु वे अस्थायी, ठेके पर, अप्रशिक्षित पैरा शिक्षक हैं। इस कानून में ‘पैरा-शिक्षक’ (जैसे संविदा शिक्षक, अतिथि शिक्षक, गुरुजी, शिक्षा मित्र आदि) लगाने पर कोई रोक नहीं है। इसका मतलब है कि सरकारी स्कूलों में और सस्ते निजी स्कूलों में गरीब बच्चों की पढ़ाई ‘राम-भरोसे’ रहेगी। क्या स्थायी, प्रशिक्षित, पर्याप्त वेतन वाले शिक्षकों का कैडर बनाए बगैर देश के बच्चों की शिक्षा ठीक से हो सकेगी ?
* इस कानून में शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता और न्यूनतम वेतन की बात तो है, लेकिन इतना कम रखा गया है कि सरकारी स्कूलों में पैरा-शिक्षक जारी रहेंगे और निजी स्कूलों में शिक्षकों का शोषण जारी रहेगा।
* इस कानून में न्यूनतम विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात प्राथमिक शालाओं में 30 बच्चों पर 1 शिक्षक रखा गया है। इसका मतलब है कि कई छोटे स्कूलों में (जहां विद्यार्थी संख्या 120 से नीचे है) तीन या चार शिक्षक ही होंगे। यानी गरीब बच्चों को एक कक्षा पर एक शिक्षक भी नसीब नहीं होगा।
* इस कानून में स्कूल में जितने शिक्षक जरुरी है, उतने ही शाला भवन में कमरे रखना जरुरी होंगे। यानी छोटे स्कूलों में एक कक्षा के लिए एक कमरा भी नहीं होगा। दो या तीन कक्षाओं को एक साथ पढ़ाया जाएगा। क्या यह गरीब बच्चों की शिक्षा के नाम पर मजाक नहीं होगा ?
* इस कानून में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को चुनाव और जनगणना के काम में लगाने पर भी रोक नहीं लगाई है। यानी गरीब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती रहेगी।
* इस कानून में निजी स्कूलों की फीस बढ़ाने पर कोई रोक नहीं है। यानी वे मनमानी फीस बढ़ाते रहेगें। इन स्कूलों के प्रबंध में किसी तरह की अभिभावकों, समाज या सरकार की भागीदारी भी जरुरी नहीं होगी।
* इस कानून में शिक्षा में बढ़ती गैरबराबरी और भेदभाव को रोकने की कोई बात नहीं है। बल्कि सरकार उसे और बढ़ावा देने का काम कर रही है। इससे सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीब बच्चे ही रह जाएंगे, और उनकी उपेक्षा व दुर्दशा और बढ़ेगी। इस कानून के बाद नाम के लिए तो हर बच्चे को स्कूल की शिक्षा पाने का अधिकार होगा, किन्तु गरीब बच्चों के लिए बहुत घटिया, अधकचरी शिक्षा होगी (जिसमें 5वीं और 8वीं में आ जाने पर भी बच्चे को न्यूनतम पढ़ना-लिखना भी नहीं आएगा।)
* इस कानून में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने (उनकी फीस सरकार देगी) का बहुत प्रचार किया जा रहा है। किन्तु बाकी बच्चों का क्या होगा ? उनके हिस्से में वही घटिया, अधूरी नाममात्र की शिक्षा रहेगी।
* इस कानून में 8वीं से पहले कोई परीक्षा नहीं होगी। इसका मतलब है कि सरकारी और सस्ते निजी स्कूलों में आधी-अधूरी शिक्षा के बाद भी बच्चों को अगली कक्षा में धकाया जाता रहेगा।
* इस कानून में मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान करते हुए भी कुछ स्कूलों व कुछ बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की गुंजाईश छोड़ दी है। इस तरह देश में दोहरी शिक्षा व्यवस्था चालू रहेगी।
* इस कानून में देश में शिक्षा के बढ़ते धंधे और मुनाफाखोरी पर रोक लगाने की कोई मंशा नहीं है। उल्टे सरकार निजी-सरकारी भागीदारी के नाम पर सरकारी भूमि और मदद देकर पूंजीपतियों को इस धंधे में बुला रही है और बढ़ावा दे रही है।
* उच्च शिक्षा और कोचिंग का निजीकरण व बाजार भी बहुत बढ़ता जा रहा है। बी.एड. और डी.एड. में भी जिस तरह से निजी कॉलेजों की बाढ़ आई है, लूट एवं धांधली मची है, बिना किसी पढ़ाई के डिग्री बांटी जा रही है, उससे तैयार शिक्षक क्या पढाएंगे ?
* देश में शिक्षा का बाजार बढ़ाने के मकसद से विदेशी विश्वविद्यालयों को भी इजाजत देने की तैयारी चल रही है, जिससे शिक्षा में लूट और मुनाफाखोरी और बढ़ेगी।
* देश के सारे बच्चे तभी भलीभांति शिक्षित हो सकेंगें, जब सरकारें इसकी जिम्मेदारी लेंगी और देश में समान स्कूल प्रणाली लागू होगी। दुनिया में जिस भी देश ने अपनी पूरी आबादी को शिक्षित किया है, किसी-न-किसी तरह की समान स्कूल प्रणाली के दम पर ही वे यह कर पाए हैं। किन्तु यह कानून इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाए, उल्टी दिशा में देश को ले जाता है।
यह साफ है कि यह कानून एक धोखा है। इसकी आड़ में देश के साधारण जनों को झूठमूठ समझा कर सरकार इस देश में शिक्षा का जबरदस्त बाजार एवं धंधा बढ़ाने का काम कर रही है। इससे देश के साधारण बच्चे शिक्षा से वंचित और कुंठित होंगे। बच्चों की आत्महत्याएं और बढ़ेंगी। देश के नौजवान और ज्यादा बेरोजगारी, गैरबराबरी, हिंसा एवं उग्रवाद की और बढ़ेंगे। क्या यही भारत का भविष्य होगा ?
आइए, हम सब मिलकर इसका विरोध करें। शिक्षा के बाजारीकरण और व्यापार के खिलाफ आवाज उठाएं। देश के हर बच्चे को अच्छी और समान शिक्षा का हक मिले और सरकारें अपनी संवैधानिक जवाबदारी पूरी करें, इसके लिए संघर्ष करें।
एक अप्रैल 2010 को पूरे देश में अपने स्तर पर सरकार की इस धोखाधड़ी के विरोध में कार्यक्रम करें।
शिक्षा अधिकार मंच


देखिए साहब, शिक्षा न देकर ही तो कांग्रेस ने इतने साल शासन कर लिया.. और देश की जनता को इतने भागों में विभक्त होने दिया..
आजादी मिलने के बाद शिक्षा सबको दी जाती और आमूल-चूल परिवर्तन किया जाना चाहिये था मैकाले की पद्धति में…
लोग शिक्षित होते तो दूरद्रष्टा होते और छुद्र स्वार्थों के स्थान पर देशहित के बारे में सोचते .. इसलिये..
इतने शुभ कार्य के लिए पहली अप्रैल का ही इंतजार क्यों ? विकास चाहे मूर्खता का ही हो उसके लिए इंतजार करना बेमानी है। जितनी जल्दी हो सके सभी कार्य त्वरित होने चाहिए। आखिर देश और उसके वासियों के विकास का मामला है।
पता नहीं इस देश के नीतिनिर्धारकों की बुद्धि घास चरने चली जाती है या कि इन्हे वास्तविकता का कुछ भान ही नहीं है। ये लोग बस गरीब आदमी के हाथ में झुंझुना पकडाकर उसे अपने में ही मग्न रखना चाहते हैं….
nice
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