१२ दिसम्बर को मणिपुर में सरकारी छुट्टी मनाई गई । उन साहसी महिलाओं की स्मृति में जिन्होंने अंग्रेज संगीनों और मारवाड़ी व्यापारियों की मिली – भगत से हुए षड़यंत्र का मुकाबला अपनी एकजुटता दिखा कर किया था । यह गौरतलब है कि इन बहादुर महिलाओं की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित करने वाले भाजपा महिला मोर्चा और मणिपुर मुस्लिम शहीद स्मृति समिती से लगायत प्रतिबन्धित क्रान्तिकारी जन मोर्चा तक के लोग थे । स्वाभाविक है कि राज्यपाल और मुख्य मन्त्री भी किसी न किसी आयोजन में शामिल हुए ।
’नूपी लान’ यानी महिलाओं द्वारा युद्ध या लड़ाई । मणिपुरी महिलाओं के युद्ध का इतिहास १८५१ से ही शुरु होता है।
पहली नूपी लान १९०४ में हुई। जनता द्वारा अंग्रेज सहायक रेसिडेन्ट का बंग्ला जला दिया गया था। इसके फलस्वरूप अंग्रेज फौजी अफ़सर लेफ़्टिनेन्ट कर्नल मैक्सवेल ने हुक्म जारी किया था कि १७-६० वर्ष तक के हर पुरुष को प्रत्येक चालीस दिनों में १० दिन की बेगारी करनी होगी। लाजमी तौर पर मणिपुरी महिलायें भी बेगारी के इस हुक्म से पीडित थीं ।
इसके साथ ही महिलाओं के गुस्से का एक अन्य प्रमुख कारण भी था । मणिपुर में चावल की एक किस्म हुआ करती थी जो अत्यन्त स्वादिष्ट होने के साथ साथ पौष्टिक भी थी । देश के अन्य भागों की तरह अंग्रेज यहां भी स्थानीय राजा के काम काज,दमन-शोषण में दखल नहीं देते थे। बदले में उन्हें राजा से नियमित लगान मिल जाया करता था । अंग्रेज अधिकारियों ने मारवाड़ी व्यापारियों से मिली-भगत कर चावल निर्यात करवाना शुरु कर दिया जिसके फलस्वरूप मणिपुर की जनता भुखमरी की कगार पर आ गई। फुटकर धान बेचने वाली महिलाओं की गुहार का अंग्रेज अधिकारों के बहरे कानों पर पर कोई असर नहीं हुआ ।
इन दोनों प्रमुख कारणों से मणिपुरी महिलाओं का गुस्सा फूटा । ५ , अक्टूबर १९०४ के ऐतिहासिक दिन मणिपुर का अंग्रेज पॉलिटिकल एजेन्ट जब सुबह की सैर से लौटा तो उसने पाया तो उसने पाया कि करीब ३००० महिलायें उसके बंग्ले को घेरे हुए थीं तथा कुछ ही देर में २००० अन्य महिलायें भी वहां आ जुटीं। इनमें कई फुटकर धान बेचने वाली महिलायें थीं । इस घटना का विवरण मैक्सवेल ने इन अल्फ़ाज़ में किया है :
’ जंगली बिल्लियों की ऐसी भीड़ के साथ क्या सलूक किया जाए यह सोचना बहुत कठिन है लेकिन अगली बार इतनी बड़ी तादाद में वे जुटती हैं उसके पहली ही उन्हें तितर-बितर करने के उपाय मैं कर लूँगा’ ।
अंग्रेज अफ़सरों ने असम राईफ़ल्स के जवानों को बुला भेजा । इन जवानों ने अपनी बन्दूकों की संगीन से महिलाओं पर हमला कर दिया । कई महिलाएँ जख्मी हो गयीं लेकिन वे तितर बितर नहीं हुईं ।
भयभीत अंग्रेज अफ़सरों को आखिरकार धान निर्यात रोकने का आदेश देना पड़ा । मणिपुर की जनता की आवश्यकताओं को नजरअन्दाज करते हुए मारवाड़ी व्यापारी इसके बावजूद ’लाल पास (Red Pass) की मदद से इस रोक का उल्लंघन करते रहे । 
[ काशी विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करम मणिमोहन सिंह द्वारा लिखी पुस्तक - नूपी लान तथा अखबारों की खबरों के आधार पर । ]



इस प्रेरक जानकारी से अवगत कराने का शुक्रिया।
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ये तो बहुत ही आसान पहेली है?
धरती का हर बाशिंदा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे।
jite raho. chiddha badhia jutate ho.
मणिपुरी महिलाओं की संघर्ष-चेतना को सलाम
जीवन के लिए संघर्ष की हर धारा ऐसे ही फूटती है। सारे देश को नूपीलान की जरूरत है।
अदभुत साहस का परिचय हमेशा महिलाओं ने दिया है, पूर्वोत्तर राज्यों में विशेषकर
अन्याय के विरूद्ध जनाक्रोश जागरूखता की निशानी है. सलाम. बाद में हालात कैसे बदले यह भी जानने की इच्छा है.
पोस्ट से हट कर यह जानना भी चाहुंगा की व्यापारियों ने निर्यात वहाँ के राजा की अनुमति से किया या ऐसे ही. साथ ही चावलों के मूल्य चुकाए गए या लूंट कर लिये गए. क्या ऐसी व्यवस्था हो सकती थी कि उचीत मूल्य मिले और किसान अपनी इच्छा से ही उगाया धान बेचे.
@ संजय ,
जिन सवालों को आपने उठाया है उनके जवाब जानने की कोशिश मैं भी करूंगा। आप ज्यादा जल्दी जवाब हासिल कर सकते हैं ,ऐसा अनुमान है ।
इस बारे में आज तक मुझे कोई जानकारी नहीं थी। सच में ये एक बेहतरीन पोस्ट है।
अफलातून जी आप मेरी यायावरी में आए। शुक्रिया। आपका ईमेल खोजता यहां पहुंच गया हूं। नूपीलान के बारे में पढ़कर रोमांचित हूं।
मैं बंगलौर में पिछले दस महीने से अजीमप्रेमजी फाउंडेशन में हूं। फाउंडेशन भी शिक्षा में काम कर रहा है। फाउंडेशन ने शिक्षकों के लिए एक पोर्टल बनाया है टीचर्स आफ इंडिया http://www.teachersofindia.org । यह आठ भाषाओं में है। मैं हिन्दी संस्करण का संपादन कर रहा हूं।
नूपी लान का यह जो स्कल्पचर है उसे यही है वह जगह यानि काहिविवि के छात्र बनमाली शर्मा ने बनाने में अहम भूमिका निभाई है। बनमाली तुम आजकल कहां हो।
@ अनिल ,
बनमाली के बारे में मृगेन्द्र से पूछ लूँगा । मृगेन्द्र यहीं शिक्षक हैं ।
manipuri mahilaaoan ke sanghrsh ko salaam!
yah jankari deney ke liye apka dil se shukriya:)
अफलातून जी, इस संघर्ष की जानकारी देकर आपने पाठकों को उपकृत किया है. आभारी हूँ.
vayvastha garibi ki janani hai. garibi darasal sarkar dwara hamesa se pradtt hoti hai. chahe woh angrejo ki sarkar ho ya aajadi ke bad ki. kamjor hamesa se shoshan ke sikar hote rahe hai. islile hame nupilaan yani manipur ki mahilaon se kuchh sabak sikhini chahiye.
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