भारतीय शिल्प (३) : राममनोहर लोहिया

पिछले भाग : एक , दो

विष्णु ने मात्र  भारतीय शिल्पकारों को शिव के जैसा प्रभावित नहीं किया है । तो भी विष्णु के विशेषतापूर्ण कई शिल्प-रूप मालूम होते हैं । मुझे अक्सर लगता है कि विष्णु अपने वस्त्र आवरण के नीचे कुछ छिपा रहा है । हालाँकि वह छिपाना मानवी हित के लिए और और मानव के लोभ को मर्यादित करने हेतु एवं उसके व्यापक संरक्षण की खातिर हो सकता है । विष्णु बिलकुल आराम करते हुए लेटे हैं । जय-पराजय से होने वाले हर्ष विषाद की कक्षा लांघ गये हैं । लगता है अखंड निद्रा लेते हुए वह अपने कृपालय के नीचे रहने वाले विश्व की निगरानी कर रहा है । उदयगिरी का विष्णु का शिल्प मुझे सबसे ज्यादा पसंद है । उसमें दिखाया गया है कि विष्णु वराह का रूप धारण करके एक अलौकिक सुन्दर कुमारिका को ,साक्षात ,  पृथ्वी की मुक्तता कर रहा है । यह पृथ्वी ही विष्णु की पत्नी है । समुद्र उसका वसन और पर्वत , वक्षस्थल । यह वर्णन एक स्तोत्र में है ।

उदयगिरी , वराह अवतार - विष्णु

उदयगिरी , वराह अवतार - विष्णु

आश्चर्य लगता है कि भारतीय शिल्पकारों को राम का कुछ भी आकर्षण क्यों नहीं लगा और कृष्ण को भी उन्होंने अपने कलाविष्कार के विषय में स्थान क्यों नहीं दिया । शायद उन्होंने राम और कृष्ण की शिल्पाकृतियाँ बनाई भी होंगी । एक तो वे नष्ट हुई होंगी या अब तक अज्ञात रही होंगी । अब तक अस्तित्व में दिखाई देने वाला द्वारिका कृष्ण मन्दिर का बालकृष्ण चतुर और होशियार प्रतीत होता है ।

भारतीय शिल्पों के सौन्दर्य की खोज करते समय मुझे उन शिल्पों में प्रकट होने वाले भारतीय इतिहास का अधिकाधिक और बार-बार दर्शन होता गया । रोम के कोलिशियम मानस्तम्भ और कहिरा के पिरामिड्स या स्फिन्क्स जैसे अवशेष जिस तरह इतिहास का दर्शन कराते हैं वैसे ही अन्य पाषाण , ईंटें , धातुओं के टुकड़े वगैरह खास कर जिन पर कुछ खोदा गया है ऐसी चीजें इतिहास खोलकर बताती हैं । हालांकि उनके द्वारा मालूम होने वाला इतिहास प्रत्यक्ष घटित इतिहास होता है ।

ये इतिहास साधन कहीं केन्द्रीय जगह पर वस्तु संग्रहालय में रखे जाते हैं । अन्यत्र कहीं पर मूल रूप में प्रत्यक्ष होने वाली वस्तुओं का वे एक जगह रखे हुए नमूने मात्र होते हैं । अलग – अलग काल की सात दिल्लियों में ऐसे कई ऐतिहासिक पाषाण और धातु के नमूने देखने को मिलते हैं । भिन्न भिन्न सात काल खण्डों की उए सात या आठ दिल्लियाँ एक ही इलाके में बसी हुई हैं ।उनकी रचना का काल और पद्धतियों में एक तरह की विसंगति मालूम होती है । उनमें से हरेक दिल्ली में कुछ आसानी से ध्यान खींचने वाली विशेषताएं भी व्यक्त होती हैं । और उस वजह से ही सभी दिल्लियों की रचना का विशिष्ट काल भी ध्यान में आता है तथापि उनमें से ज्यादातर दिल्लियों की बनावट एक दूसरे जैसी दिखाई देती है । इन दिल्लियों में चार असाधरण सुन्दर वस्तुएं हैं । उनकी रचना कुछ हाले ही के काल की है । मैजिक लैंन्टन की मदद से दिखाई जाने वाली किसी छाया चित्र कथा की चित्र माला के समान मन पर जो छाप छूटती है वह आदमी के सहज भूलने की शक्ति की और भारत के गत हजारों वर्षों की नादानी की । बदकिस्मती से मैं अथेना कभी नहीं जा सका किन्तु मुझे लगता है कि अथेना के अवशेष अथेनियन एवं ग्रीक इतिहास के प्रतीक हैं ।हिन्दुस्तान का उल्टा है । यहाँ का इतिहास ही यहाँ के अवशेषों का चिन्ह हैं ।

अन्य देशो में ऐतिहासिक अवशेष और प्राचीन कला वस्तुओं की अपेक्षा लिखित इतिहास ज्यादा विपुल पैमाने पर मिला है । भारत में मात्र लिखित इतिहास की तुलना में प्राचीन कला वस्तु और अवशेष ज्यादा पैमाने पर मिलते हैं । मानवी विस्मृति  अपने को मिटा न पाये , अपनी कला की अभिव्यक्ति अधिक लम्बे समय तक टिकने वाले धार्मिक माध्यम से करना संभव हो  और स्त्री सुन्दरता एवं मानवी जीवन की खुशनुमा कृतियाँ  बढ़िया ढंग से चित्रित की जाए इस दृष्टि से भारतीय कलावंतों ने कोशिश की और उनके प्रयत्नों के कारण ही सही माने में भारतीय इतिहास के वे श्रेष्ठ उद्गाने बने । उनकी कलाकृतियों में केवल भारतीय इतिहास के प्रसंग नहीं चित्रित किए गए , तो भारतीय आत्मा की कथा चित्रित की हई है । प्रत्येक बदलने वाले युग के साथ भारतीय आत्मा ने अलग अलग  रूप धारण किया है ।

संपूर्ण इटली में अथवा पूरे इजिप्त में देखना असंभव ऐसी शिल्प कला खजुराहो , भुवनेश्वर , कोणारक , धारवाड़ भाग के एक एक शिल्प में दिखाई देती है । अजंता , वेरूल या चितुर के बारे में तो बोलना ही नहीं चाहिए । इस विशाल देश में जगह जगह ऐसे साठ से अधिक शिल्प फैले हैं । विविध मानवी समाजों द्वारा शिल्पकला और वास्तुकला में की  हुई प्रगति तोलने के लिए तराजू के एक पलड़े में भारतीय कला वस्तुएँ और दूसरे पलड़े में उर्वरित सारी दुनिया की कला वस्तुएँ रखो तो पलड़ा किस तरफ़ झुकेगा कहना मुश्किल है ।

भारतीय कला केन्द्र शौकीन यात्रियों के नियमित मार्ग पर नहीं हैं । ज्यादातर जगह शहरों से दूर हैं । महाबलीपुरम मद्रास से चालीस मील पर तो धारापुरी समुद्र मार्ग द्वारा बम्बई से लगभग १ घण्टे के रास्ते पर है । खजुराहो , अजंता , वेरुल , कोणारक नजदीक के रेल स्टेशन से इसी तरह चालीस मील पर है ।सारे कला केन्द्र बड़े शहरों से दूर हैं और यह स्वाभाविक भी है ।चूँकि भारतीय इतिहास की ’आत्मा’ माने परदेशियों की नजर के जिस पर लगातार आघात होते हैम , ऐसी वह एक नाजुक सुन्दरी है । इस वजह से ही आने जाने वालों की आकस्मिक नजर नहीं पहुंचेगी । इसलिए दूर और निर्जन जगह पर यह खूबसूरत स्त्री छिपी है ।

( जारी )

2 Responses to “भारतीय शिल्प (३) : राममनोहर लोहिया”


  1. 1 Hitendra Patel August 28, 2009 at 8:34 pm

    बहुत सुंदर आलेख को फिर से पढने का सुयोग मिला. धन्यवाद.

  2. 2 Atul October 19, 2009 at 9:02 pm

    इसकी अगली कडी का क्या हुआ ?

    अतुल


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