बात मध्यप्रदेश की है, किन्तु कमोबेश पूरे देश पर लागू होती है। मध्यप्रदेश हाईस्कूल का परीक्षा परिणाम इस साल बहुत खराब रहा। मात्र 35 फीसदी विद्यार्थी ही पास हो सके। परिणाम निकलने के बाद प्रदेश के कई हिस्सों से छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं की खबरें आईं।
इतने खराब परीक्षा परिणाम की विवेचना चल रही है। मंत्री एवं अफसरों ने कहा कि शिक्षकों के चुनाव में व्यस्त होने के कारण परीक्षा परिणाम बिगड़ा है। किसी ने कहा कि आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा खत्म कर देने से यह हुआ है। लेकिन सच तो यह है कि लगातार बिगड़ती शिक्षा व्यवस्था का यह परिणाम है। सरकार खुद इसे लगातार बिगाड़ रही है।
इस परीक्षा परिणाम में एक मार्के की बात यह है कि सबसे ज्यादा अंग्रेजी और गणित इन दो विषयों में ही विद्यार्थी फेल हुए हैं। अंग्रेजी में 3 लाख 21 हजार और गणित में 2 लाख विद्यार्थी फेल हुए हैं। कुछ दिन पहले घोषित मध्यप्रदेश हायर सेकेण्डरी की परीक्षा में भी फेल विद्यार्थियों में ज्यादातर अंग्रेजी व गणित में ही अटके हैं। अमूमन यही किस्सा हर साल का और देश के हर प्रांत का है। अंग्रेजी और गणित विषय आम विद्यार्थियों के लिये आतंक का स्त्रोत बने हुए हैं।
गणित का मामला थोड़ा अलग है। गणित के साथ समस्या यह है कि इसे रटा नहीं जा सकता। इसकी परीक्षा में नकल भी आसान नहीं है। शुरुआती कक्षाओं में गणित को ठीक से न पढ़ाने की वजह से बाद की कक्षाओं में गणित कुछ भी समझ पाना एवं याद करना बहुत मुश्किल होता है। गणित विषय की बेहतर पढ़ाई की व्यवस्था जरुरी है।
लेकिन अंग्रेजी क्यों इस देश के बच्चों पर लादी गई है ? पूरी तरह विदेशी भाषा होने के कारण बच्चों के लिए यह बहुत बड़ा बोझ बनी हुई है। देश के कुछ मुट्ठी भर अभिजात्य परिवारों को छोड़ दें , जिनकी संख्या देश की आबादी के एक प्रतिशत से भी कम होगी, तो देश के लोगों के लिए अंग्रेजी एक अजनबी, विदेशी और बोझिल भाषा है। अपनी जिन्दगी में दिन-रात उनका काम भारतीय भाषाओं या उसकी स्थानीय बोलियों में चलता है। उनमें अंग्रेजी के कुछ शब्द जरुर प्रचलित हो गए हैं, लेकिन अंग्रेजी भाषा बोलना, लिखना या पढ़ना उनके लिए काफी मुश्किल काम है। फिर भी अंग्रेजी को अनिवार्य विषय के रुप में सारे बच्चों पर थोपी जा रहा है। पहले माध्यमिक शालाओं में कक्षा 6 से इसकी पढ़ाई शुरु होती थी, अब लगभग सारी सरकारों ने इसे पहली कक्षा से अनिवार्य कर दिया है।
अंग्रेजी को अनिवार्य विषय के रुप में भारत के सारे बच्चों को पढ़ाने के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं, जो सब खोखले और गलत हैं। यह कहा जाता है कि अंग्रेजी दुनिया भर में बोली जाती है। अंग्रेजी से हमारे लिए दुनिया के दरवाजे खुलते हैं। हमारे देश को आगे बढ़ना हैं, शोध कार्य करना है, वैज्ञानिक प्रगति करना है, व्यापार करना है, विदेशों में नौकरी पाना है, तो अंग्र्रेजी सीखना ही होगा। लेकिन यह सत्य नहीं है। अंग्रेजी का प्रचलन सिर्फ उन्हीं देशों में है जो कभी अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं और वहां भी आम लोग अंग्रेजी नहीं जानते हैं। दुनिया के बाकी देश अपनी-अपनी भाषा का इस्तेमाल करते हैं और वहां जाने, उनके साथ संवाद करने और उनको समझने के लिए उनकी भाषा सीखने की जरुरत होगी। स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, रुसी, पु्र्तगाली, इटेलियन, डच, चीनी, जापानी, अरबी, फारसी, कोरियन आदि भी अंतर्राष्ट्रीय भाषाएं हैं। यदि दुनिया के दरवाजे वास्तव में भारतीयों के लिए खोलने हैं तो इन भाषाओं को भी सीखना पड़ेगा।
फिर अंतर्राष्ट्रीय जगत से तो बहुत थोड़े भारतीयों को काम पड़ता है। उच्च स्तरीय शोधकार्य करने वाले मुट्ठी भर लोग ही होते हैं। उसके लिए देश के सारे बच्चों पर अंग्रेजी क्यों थोपी जाए ? उन्हें क्यों कुंठित किया जाए ? बार-बार फेल करके उनके आगे बढ़ने के रास्ते क्यों रोके जाए ? प्रतिवर्ष पूरे देश में विभिन्न कक्षाओं में अंग्रेजी में फेल होते बच्चों की संख्या जोड़ी जाए, तो यह करोड़ों में होगी। क्या यह स्वतंत्र भारत का बहुत बड़ा अन्याय नहीं है ? जिन्हें उच्च स्तरीय शोधका्र्य करना है या विदेश जाना है, वे जरुरत होने पर अंग्रेजी या कोई भी विदेशी भाषा का छ: महीने का कोर्स करके कामचलाऊ ज्ञान हासिल कर सकते हैं। दूसरों देशों के नागरिक ऐसा ही करते हैं। सिर्फ भारत जैसे चंद पूर्व गुलाम देशों में ही एक विदेशी भाषा पूरे देश में थोपी जाती है। सच कहें तो, दुनिया का कोई भी देश एक विदेशी भाषा में प्रशासन, शिक्षा, अनुसंधान आदि करके आगे नहीं बढ़ पाया है।
कई अभिभावक सोचते हैं कि अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाकर वे उसे ऊपर तक पहुंचा सकेगें। ‘‘इंग्लिश मीडियम’’ का एक पागलपन इन दिनों चला है और हर जगह घटिया निजी स्कूलों के रुप में इंग्लिश मीडियम की कई दुकानें खुल गई हैं। इंग्लिश मीडियम का मतलब है कि बच्चों को अंग्रेजी सिर्फ एक विषय के रुप में नहीं पढ़ाना, बल्कि सारे विषय अंग्रेजी भाषा में पढ़ाना। यह बच्चों के साथ और बड़ा अन्याय होता है। अपनी मातृभाषा में अच्छे तरीके से और आसानी से जिस विषय को वे समझ सकते थे, उसे उन्हें एक विदेशी भाषा में पढ़ना पड़ता है। उनके ऊपर दोहरा बोझ आ जाता है। अक्सर वे भाषा में ही अटक जाते हैं, विषय को समझने का नंबर ही नहीं आता है। फिर वे रटने लगते हैं। लेकिन विदेशी भाषा में रटने की भी एक सीमा होती है। इसमें कुछ ही बच्चे सफल हो पाते हैं, बाकी बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए यह एक मृग-मरीचिका ही साबित होता है। देश के करोड़ों बच्चे अंग्रेजी के इस मरुस्थल में क्लान्त और हैरान भटकते रहते हैं, कोई-कोई दम भी तोड़ देते हैं।
यह सही है कि आज भी देश का ऊपर का कामकाज अंग्रेजी में होता है। प्रशासन, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा, उद्योग, व्यापार सबमें ऊपर जाने पर अंग्रेजी का वर्चस्व मिलता हैं। अंग्रेजी न जानने पर ऊपर पहुंचना और टिकना काफी मुश्किल होता है। लेकिन इसका इलाज यह नहीं है कि सारे बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई जाए। यह एक अस्वाभाविक स्थिति है और गुलामी की विरासत है, इसे जल्दी से जल्दी बदलना चाहिए। देश के शासक वर्ग ने अंग्रेजी की दीवार को इसीलिए बनाकर रखा है कि देश के करोड़ो बच्चे आगे नहीं बढ़ पाए और उनकी संतानों का एकाधिकार बना रहे। अंग्रेजी को अनिवार्य रुप से स्कूलों में पढ़ाने से यह एकाधिकार
टूटता नहीं, बल्कि मजबूत होता है। अभिजात्य वर्ग के बच्चों को तो अंग्रेजी विरासत में मिलती है। फर्राटे से अंग्रेजी न बोल पाने और न लिख पाने के कारण साधारण पृष्ठभूमि के बच्चे प्राय: हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं। आधुनिक भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व न केवल भेदभाव, विशेषाधिकारों और यथास्थिति को बनाए रखने का बहुत बड़ा औजार है, बल्कि देश की प्रगति को रोकने का बहुत बड़ा कारण भी है। जिस देश के ज्यादातर बच्चे कुंठित एवं हीन भावना के शिकार होंगें, उनके ऊपर दोहरी शिक्षा का अन्यायपू्र्ण बोझ लदा रहेगा, वे ज्ञान-विज्ञान के विषयों को समझ ही नहीं पाएंगे और उनके आगे बढ़ने के रास्ते अवरुद्ध रहेगें, वह देश कैसे आगे बढ़ेगा।
अंग्रेजी के वर्चस्व का दूसरा नुकसान यह भी होता है कि देशी परिस्थितियों के मुताबिक मौलिक सोच, स्वतंत्र चिन्तन व देशज शोध-अनुसंधान भी काफी हद तक नहीं हो पाता है। पूरा देश नकलचियों का देश बना रहता है और कई बार नकल में अकल भी नहीं लगाई जाती है।
इसीलिए समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया ने आजाद भारत में सार्वजनिक जीवन से अंग्रेजी के वर्चस्व को हटाने का आह्वान किया था। डॉ. लोहिया की जन्म शताब्दी इस वर्ष मनाई जा रही है और यदि इस दिशा में हम कुछ कर सकें, तो यह उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। यह वर्ष महात्मा गांधी की अद्वितीय पुस्तक ‘‘हिन्द स्वराज’’ का भी शताब्दी वर्ष है। इसमें लिखे गांधी जी के इन शब्दों को भुलाकर हमने अपनी बहुत बड़ी क्षति की है -
‘‘ अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरह बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी उठा नहीं रखा है। ……………यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इंसाफ पाना हो, तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए। ………. यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है ?’’
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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)
सुनील
ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
फोन नं० – 09425040452
ई – मेल sjpsunilATgmailDOTcom

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हिन्दी प्रेमी एकजुट होकर एक स्वर में अपनी बातें नहीं बोल पा रहे हैं। यत्र-तत्र कभी-कभार आवाजें उठती हैं और फिर कुछ देर तक खामोशी छायी रहती है। समस्या जितनी जटिल होती है उसका समाधान भी उतना ही कठिन होता है। हिंदी प्रेमी जब तक हिंदी भाषा को अपने चरित्र का एक हिस्सा नहीं बनाएंगे तब तक इस दिशा में व्यापक परिवर्तन होना कठिन है। यदि हिंदी का हर जगह यथासंभव उपयोग हिंदी प्रेमियों द्वारा किया जाए तो परिवर्तन शीघ्र संभव है। स्थिति यह है कि हिंदी भाषी ही हिंदी को अपनाने में दोहरे मानदंड को दर्शा रहे हैं। आपके कथ्य अकाट्य हैं।
धीरेन्द्र सिंह
इस महान घटना से परिचित कराने के लिए आभार।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाई जा सकती है।
tum sab ke sab hindi ke karndhar bahut bade paakhandi ho. Tumne jab ye lekh likha hoga to angrezo ka banaya hua software use kiya hoga. Aur isi angrezi sabhyta ke key- board aur monitor par haath tipir tipir chalye honge. Aur fin angrezi si hi bair. mujhe pata nahin tum log kya prove karna chahte ho..khud mutkh ho ya dusron ko banate ho…ye to wohi baat ho gayi ki jis thaali main khaaya , usi main chhed kiya….
आप यहाँ अंगरेजी के पीछे पड़ें हैं ….और अपने प्रदेश में सबसे ज्यादा बच्चे फ़ेल हुए हिन्दी में??
जबतक हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुचाया जाता .. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता है ही .. इसी तरह सरकारी स्कूलों को चुस्त दुरूस्त बनाए बिना हम प्राइवेट अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों को भी गलत सिद्ध नहीं कर सकते .. थेडी बहुत अंग्रेजी की जानकार सबों के लिए आवश्यक है , इस लिए इसे वैकल्पिक रूप में रखा जाना चाहिए .. इसे अनिवार्य विषय बनाना उचित नहीं !!