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दरअसल, पंजीवाद को फलते-फूलते रहने के लिए लगातार बढ़ते हुए मुनाफे, बढ़ता हुआ बाजार और दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन चाहिए। तीस के दशक की जबरदस्त मंदी से उसे उबारने में द्वितीय विश्वयुद्ध जनित मांग ने काफी मदद की और इसके बाद दो-तीन दशक तक सब कुछ बढ़िया चलता रहा। लेकिन सत्तर के दशक में अमरीका-यूरोप के पूंजीवादी मुनाफे कम होने लगे, क्योंकि संगठित होकर मजदूर अपनी मजदूरी बढ़वाने में सफल रहे थे और विकासशील देशों से प्रतिस्पर्धा का भी सामना करना पड़ रहा था। तब इस संकट के समाधान के रुप में वैश्वीकरण का दौर आया। एक ओर, अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना साम्राज्य फैलाया, जिससे विकासशील देशों में उद्योग स्थानान्तरित होने पर भी मुनाफा, रायल्टी आदि उनको ही मिलते रहे। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ‘मुक्त’ करने के साथ ही पूरी दुनिया के बाजार पर कब्जा करने का मौका उन्हें मिला, साथ ही पूरी दुनिया के संसाधनों के बढ़ते हुये दोहन का मौका मिला। वित्तीय वैश्वीकरण भी एक प्रकार से दुनिया के संसाधनों को बेरोकटोक खींचने एवं नियंत्रण के तंत्र के रुप में आया, जिससे बिना उत्पादन किए उन्हें दूसरों की मेहनत का फल हड़पने का मौका मिलता रहे। गौरतलब है कि संयुक्त राज्य अमरीका के कंपनी मुनाफों में वित्तीय मुनाफों का हिस्सा अस्सी के दशक में 17-25 प्रतिशत था, जो चालू दशक में बढ़कर 27-40 प्रतिशत हो गया।
दुनिया के बाजार पर नियंत्रण के साथ मुद्रा और कर्ज की बहुतायत से अमरीका-यूरोप के घरेलू बाजार में तेजी आई , उससे भी अमरीकी पूंजीवाद को मदद मिली। अमरीका-यूरोप के लगातार बढ़ते उपभोग ने अंतहीन विकास एवं समृद्धि का भ्रम पैदा किया और बनाए रखा। लेकिन जैसा कि अब साफ हो रहा है, यह उधार की समृद्धि थी और पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों व श्रम की लूट पर आधारित थी। उदाहरण के लिए, पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति पेट्रोल खपत अमरीका में ही है। वहां पहले, 1973 के पहले तेल संकट के समय 33 प्रतिशत तेल बाहर से आता था। अब 60 प्रतिशत आता है और अनुमान है कि 2020 तक वह 70 प्रतिशत तेल आयात करने लगेगा। दुनिया के संसाधनों पर अपने कब्जे के लिए अमरीका आर्थिक, व्यापारिक, कूटनीतिक, सैनिक सभी तरीकों का इस्तेमाल करता है। लेकिन उसका भी प्रतिरोध हो रहा है और दुनिया के संसाधनों के दोहन की भी सीमा आती जा रही है। यह संकट एक प्रकार से साम्राज्यवाद पर टिकी आधुनिक जीवन -शैली और अंतहीन भोगवाद का भी संकट है।
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दुनिया को लूटकर समृद्धि के महल खड़ा करने की इस अमरीका-केन्द्रित अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवादी व्यवस्था में जो देश जितना जुड़ा है और एकाकार हुआ है, वह उतना ही प्रभावित हो रहा है। भारत जैसे देशों का एकीकरण पूरी तरह नहीं हुआ है , इसलिए भारत पर उतना असर नहीं हुआ है। हालांकि पिछले 18 वर्षों में भारत की सरकारों की इच्छा, सोच व दिशा तो वही रही है, किन्तु यहां कि लोकतांत्रकि व्यवस्था ने एक प्रकार की थोड़ी बहुत रोक का काम किया है। चुनाव में जाने की मजबूरी के कारण सरकारों द्वारा पूरी तरह जन-हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन चीन, यूरोप के कई देशों और अमरीका से काफी ज्यादा जुड़े़ मध्य अमरीका व अफ्रीका के कई देशों के हालात काफी खराब हैं। चीन तो बुरा फंसा है। वहां पिछले काफी समय से राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर 10-11 प्रतिशत रही है और इसे चमत्कार माना जा रहा था। किन्तु यह वृद्धि मुख्यत: निर्यातों पर आधारित थी। चीन की राष्ट्रीय आय का लगभग 30 प्रतिशत निर्यातों से मिलने लगा था। अब मंदी के चलते निर्यात काफी कम हो गए हैं, चीन की अनेक औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैल गई है। डॉलर के जाल में भी चीन बुरी तरह फंसा है। निर्यातों के चलते और विदेशी पूंजी के आगमन के चलते चीन के पास विदेशी मुद्रा और विदेशी प्रतिभूतियों का विशाल भंडार जमा हो गया है, तो ज्यादातर डॉलर में है। अनुमान है कि चीन के पास लगभग 2000 अरब डॉलर मूल्य की विदेशी परिसंपत्तियां हैं, जिनमें 70 प्रतिशत डॉलर में है। डॉलर की वर्तमान विनिमय दर कृ्त्रिम रुप से बहुत ऊँची है और यह नीचे आ सकती है। किन्तु डॉलर की कीमत नीचे आई , तो चीन के इस भंडार का मूल्य भी कम हो जाएगा। डॉलर के रुप में जमा चीन की सालों की कमाई चंद दिनों में हवा हो सकती है। चीन डॉलर के इस जाल से मुक्त होने के लिए अपनी डॉलर-परिसंपत्तियां बेचता है तो ये इतनी ज्यादा हैं कि स्वयं चीन के बेचना शुरु करने पर डॉलर की कीमत नीचे जाने लगेगी और चीन को भारी नुकसान हो जाएगा। इसलिए पिछले दिनों चीन ने अमरीका के ऊपर अपने कर्ज की सुरक्षा के लिए बार-बार चिंता प्रकट की है। समूह-20 की लंदन बैठक के पहले चीन ने एक नई अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा की जरुरत का मुद्दा भी उछाला था।
लेकिन महज एक मुद्दा उछालने से कुछ होने वाला नहीं है। समूह-20 की बैठक में भी कुछ फौरी राहत की बातें हुई हैं। सिर्फ वित्तीय कारोबारों पर सरकारी नियंत्रण एवं देखरेख बढ़ा देने तथा अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप की कीन्सवादी नीतियों से भी यह संकट दूर नहीं होने वाला है। विनियंत्रण-विनियमन इस संकट का मूल कारण नहीं है, वह तो एक प्रकार का औजार था, पूंजीवादी ताकतों द्वारा संसाधनों एवं कमाई हड़पने का। कीन्स के अर्थशास्त्र एवं कीन्सवादी उपायों ने पिछली मंदी के समय सरकारी हस्तक्षेप से प्रभावी मांग की कमी को दूर करके पूंजीवाद को बचाने का रास्ता सुझाया था। लेकिन इस बार संकट सिर्फ बाजार या मांग की कमी का नहीं है। पूंजीवादी मुनाफों की भूख ने सारी मर्यादाओं को तोड़कर दुनिया की कमाई और संसाधनों को हड़पने के नए-नए तरीके निकाले हैं, उनसे यह संकट पैदा हुआ है। आज जरुरत लालच, भोगवाद, गैरबराबरी और लूट पर आधारित इस पूंजीवादी सभ्यता को बचाने की नहीं है, बल्कि इसका एक सही विकल्प खोजने की है, जिसके लिए यह सबसे अच्छा मौका है। इसमें गांधी, मार्क्स, लोहिया व शुमाखर हमारी मदद कर सकते है। और तभी पूंजीवाद के मौजूदा संकट तथा अन्य संकटों का स्थायी समाधान हो सकेगा।
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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)
सुनील
ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
फोन नं० – 09425040452


पूंजीवाद से मुक्ति के लिए उस का विकल्प तो खोजना ही होगा।
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