मालाबार – कोंकण तट ( पश्चिमी घाट ) से गुजरने वाली कोंकण – रेल नैसर्गिक सौन्दर्य अवलोकन का एक अनूठा मनोहारी अवसर देती है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों की श्रृंखला और दूसरी तरफ़ अरब सागर के बीच से गुजरता यह रेल – मार्ग । सागर में मिलती नदियाँ , धान के खेत में लुका-छिपी खेलते बादलों की छाया , नारियल , सुपारी और हाफुस आम जैसे पेड़ों के वन । दूरियाँ कम करने वाली रेल मार्ग पर बनी लम्बी सुरंगें और पहाड़ियों के बीच कुतुब मिनार से ऊँचे पुल ।





इन खूबसूरत नजारों से मुखातिब होने की तमन्ना के साथ मैंने इस बार भी एरणाकुलम से निजामुद्दिन का सफ़र इसी मार्ग से तय किया । तमन्ना पर तुषारापात हुआ ! रेल के डिब्बे बाहर से एक मोबाइल कम्पनी के होर्डिंग बना दिए गए हैं । मैं रात में सवार हुआ था इसलिए सचल होर्डिंग की माया का भान सुबह हुआ जब मंगलूर का सूर्योदय देखने के लिए दरवाजा खोल कर खड़े रहना पड़ा ।



Sunset : Panvel
निर्बाध निसर्ग का नजारा लेना गाड़ी की खिड़कियों से नामुमकिन था । डिब्बे का दरवाजा खोल कर जोखिम के साथ ही प्रकृति का प्रत्यक्ष-निर्बाध दर्शन संभव था । शीशे की खिड़कियों के ऊपर भी विज्ञापन चिपका दिया गया है । शीशे के ऊपर जालीदार झिली जड़ दी गयी है । डिब्बे के भीतर से बाहर देखते वक्त यह झिल्ली कैसी बाधा उपस्थित करती है- स्लाइडशो के एक चित्र में नमूना पेश है । मोतियाबिन्द अथवा आँखों के आन्तरिक हेमॉरेज के बाद जैसी दृष्टि हो जाती है ।
मोबाइल कम्पनी का यह विज्ञापन मुझे बहुत प्रभावशाली लगता रहा है । बड़ों की बनाई कटीली सरहदों को छोड़ कर दो बालक एक गेंद से खेलते हैं , संवाद स्थापित करते हैं । विज्ञापन का सूत्र कहता है – Barriers break when people talk .
गाड़ी की खिड़कियों पर यह इश्तहार खुद कुदरत और सवारियों के बीच बाधा बन कर मौजूद है ।
मैंने कंडक्टर से जब इस नाइंसाफ़ी के खिलाफ़ दस्तक देने के लिए शिकायत पुस्तिका मांगी तब उसने मुझे टरकाने के लिए कहा , ‘ मैं आपकी शिकायत गाड़ी-अधीक्षक तक पहुंचा दूंगा (जबानी) ।’ कई घण्टों के बाद एक और टिकट परीक्षक आए तब मुझे कहना पड़ा , ‘ शिकायत – पुस्तिका न देने पर मैं घर पहुँच ई-मेल से शिकायत करूंगा और शिकायत पुस्तिका न देने की बात भी लिखूँगा ।’ पाँच मिनट के भीतर शिकायत पुस्तिका संख्या ४२१ पेश की गयी जिसके पृष्ट ११ , १२ पर अपनी शिकायत दर्ज कर मैंने उसकी एक प्रति हासिल की ।
दिल्ली पहुँच कर रेल के एक मित्र अधिकारी को यह कटु अनुभव सुनाया । उसने बताया कि अचरज मत कीजिएगा यदि जल्द ही आपको ‘हीरो होण्डा – सा रे गा मा पा’ अथवा ‘अमूल स्टार वॉयस ऑफ़ इण्डिया’ की तरह ‘एयरटेल – तिरुअनंतपुरम राजधानी एक्सप्रेस’ अथवा ‘आइडिया- वाराणसी जंक्शन’ जैसे गाड़ियों और स्टेशनों के नाम देखने को मिलें ।



विज्ञापनों से आय को मै गलत नहीं मानता, मगर काँच जिस काम के लिए लगाए गए है उन्हे बाधित करना गलत है.
चित्र तो सुन्दर हैं, भाई.
यह तो ऐसा इलाज हुआ जो बीमारी से ज्यादा घातक है। यह झिल्ली न तो प्लास्टिक की है और न ही खिडकी पर चढी है। यह तो लालच की ण्झल्ली है जो लालू की आंखों पर चढ गई है।
केवल शिकायत करके मत रहिए और अकेले ही इस काम को मत निपटाइए। प्रकृति और पर्यटन के बीच बाधक बन रही इस ‘लालू मानसिकता’ से मुक्ति के लिए किसे, कहां क्या लिखना है-सबको बताइए।
आप यदि ऐसा कोई अभियान चलाते हें तो उसमें, आपके पीछे चलने में आनन्द आएगा और आत्म सन्तोष मिलेगा।
this is stupid. but lalu is known to do all sorts of stupid things if he is given ample amount of money.
रेल यात्रा का सबसे बड़ा लालच तो प्रकृति के दृष्यों को देखने का ही होता है। यदि ये ही ना दिखें तो मजा ही क्या ? उसपर कोंकण रेलवे जैसी यात्रा ! घोर अन्याय है। आपने तो दरवाजे से लटकते हुए थोड़ा बहुत देख लिया परन्तु क्या स्त्रियाँ भी यह कर पातीं ? यदि मैं आपकी जगह होती तो बहुत निराश होती। रेल यात्रा का सबसे बड़ा लालच मुझे खिड़की से बाहर देखने का ही होता है।
घुघूती बासूती
आपने शिकायत दर्ज़ कराई। अच्छा किया। लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, यह भी आप जानते ही थे। दक्षिण भारत सचमुच सुन्दर है। नैसर्गिक और …..शिक्षा, संस्कृति,पर्यावरण के लिहाज से उत्तर भारत से बहुत आगे। टेक्नोलाजी और नागरिक जागरूकता की दृष्टि से भी ।
लेकिन राष्ट्रीयता के जिन प्रतीकों को आप बाज़ार से बचाना चाहते हैं, वह ज़रा मुश्किल लगता है। रेल के डिब्बे या स्टेशन के नाम तो छोड़िये, सोचिये अगर ‘टाटा इंडिया’ या ‘ ह्युंडई हिन्दुस्तान’ या ‘ बाल्को भारत’ हुआ तो क्या होगा ? ऐसा होगा या नहीं यह अलग बात है। लेकिन ऐसा जैसा हो सकता है। क्रिकेट, जो हमारी राष्ट्रीयता को ‘पापुलर स्पेस’ में सबसे अधिक स्पष्ट तरीके से परिभाषित करने वाला खेल है, उसमें इंडिया नहीं, ‘सहारा इंडिया’ का लोगो होता है।
अफ़लातून जी, मुझे तो कई बार लगता है कि अब राष्ट्रीय अस्मिता उसी राष्ट्र-राज्य की बाकी बची है, हम सब जिसके अप्रत्यक्ष नव-उपनिवेश हैं। We all are the ‘Citizens of an Empire’, and in my opinion, everyone from the ruling political ‘class’ has accepted it. अब यह अलग बात है कि ऐसा खुल कर कहने में शर्म आती है।
हां, अगर रेल की खिड़की के बाहर दौड़ती-भागती, पीछे छूटती, आगे निकलती प्रकृति को निहारना ही हो, तो सेकंड क्लास का नान ए.सी. साधारण डिब्बा सबसे उपयुक्त है। मेरे कई फोटोग्राफर दोस्त ऐसा ही करते हैं।
यह सच है कि साधारण डिब्बे का मुसाफ़िर कुदरत के सबसे करीब है।
सुंदर पोस्ट के लिए बधाई !
ओहोहोहो..
केरल जाने और वहां का नैसर्गिक सौंदर्य निहारने की बडी इच्छा है। आपके अनुभव ने इसे और हवा दे दी है। फोटो बेहद खूबसूरत और मनमोहक है। भोपाल में आपसे न मिल पाने का बेहद अफसोस है।
[...] कुदरत के आड़े लालू – झिल्ली [...]
[...] कुदरत के आड़े लालू – झिल्ली [...]
[...] गाड़ी में ही शिकायत की थी। इस पर अलग पोस्ट लिखी थी । इस पर भी कार्रवाई का पत्र आ गया है [...]
अफलातून जी,
किस ईमेल-आई डी पर शिकायती मैल किया जाना चाहिए? यदि आपको पता हो तो अवश्य बताइए, शिकायत पुस्तिका न दिए जाने कि घटना मेरे साथ भी हुई है.
धन्यवाद