कर्जे की चादर जितनी ओढ़ो उतनी कड़ी शीत है/भ.प्र.मिश्र

[ स्वराज के बाद का भारत जिस प्रकार गांधी वाले रास्ते से विचलित हुआ उससे भवानी बाबू का हृदय हिल उठता था । १९५९ में लिखी यह कविता , विश्व बैंक से पहली बार कर्जा लेने की बात उसी समय शुरु हुई थी । ]

पहले इतने बुरे नहीं थे तुम

याने इससे अधिक सही थे तुम

किन्तु सभी कुछ तुम्ही करोगे इस इच्छाने

अथवा और किसी इच्छाने , आसपास के लोगोंने

या रूस-चीन के चक्कर-टक्कर संयोगोंने

तुम्हें देश की प्रतिभाओंसे दूर कर दिया

तुम्हें बड़ी बातोंका ज्यादा मोह हो गया

छोटी बातों से सम्पर्क खो गया

धुनक-पींज कर , कात-बीन कर

अपनी चादर खुद न बनाई

बल्कि दूरसे कर्जे लेकर मंगाई

और नतीजा चचा-भतीजा दोनों के कल्पनातीत है

यह कर्जे की चादर जितनी ओढ़ो उतनी कड़ी शीत है ।

- भवानीप्रसाद मिश्र .

[ चित्र स्रोत : अनहदनाद ]

1 Response to “कर्जे की चादर जितनी ओढ़ो उतनी कड़ी शीत है/भ.प्र.मिश्र”


  1. 1 BK Vinay Pandya April 23, 2009 at 12:48 pm

    Aaj Bhi yah geet utna hee sahee hai


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