वरिष्ट पत्रकार और चिन्तक साथी राजकिशोर का यह लेख प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है । लेख पीडीएफ़ में है इसलिए संजाल से अलग कर इसे पढ़ना भी सरल है । आपकी टिप्पणियाँ राजकिशोर जी को भेजी जाएंगी ।
हिन्दी पत्रकारिता की भाषा : राजकिशोर
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आलेख की चिंता सही है। हम ब्लागरी में एक अभियान चला सकते हैं।
महोदय,
आपकी बात बिल्कुल सही है. पर सवाल है कि क्या इस लेख में हिन्दी की दशा व दिशा के एक ही पक्ष का विश्लेषण नहीं किया है? आज़ादी के बाद या १९७० के बाद हिन्दी ने यदि ख़ुद को जन सामान्य के अनुरूप ढालने की कोशिश की है तो क्या इसका विकास अवरुद्ध हुआ है. बल्कि हाल के दो-एक वर्षों में तो हिन्दी मजबूत हुई है. जो कल तक कंप्यूटर की सहयोगी भाषा नहीं थी, वह अब पूरी तरह से सहयोगी हो चुकी है और हिन्दी में ब्लागरों की एक बड़ी जमात प्रतिदिन हिन्दी में अपने विचारों का आदान-प्रदान करती है, या कहें इन्टरनेट के माध्यम से हिन्दी विश्व मंच पर बेहिचक बोली-लिखी जा रही है. हिन्दी को विश्व जन में फलने-फूलने की ऐसी सुविधा पहले नहीं मिली थी.
उदय केसरी
“जो कमीज उतार सकता है, वह धोती भी कोल सकता है” बहुत सही कहा है राजकिशोर जी ने।
मेरा मानना है कि हिन्दी की दुर्दशा का केवल एक कारण है – गलत शासकीय नीति। इसी के कारण अंग्रेजी में जबरजस्ती पढ़ायी करायी जा रही है; इच्छा न होते हुए भी डिक्शनरी और ग्रामर रटा जा रहा है; न समजते हुए भी बच्चे सब कुछ रते जा रहे हैं; स्पोकेन इंग्लिश के क्लास ज्वाइन किये जा रहे हैं; …। कल से चीनी भाषा को नौकरियों और साक्षात्कारों में महत्व मिलने लगे तो भारत के लोग आज से ही “छू-छांग” करना शुरू कर देंगे। आलम ये है कि आज जन्म लेने के बाद से शुरू होकर मरण होने तक ये गुलाम लोग अंग्रेजी सीखने में लगा रहे हैं। और इसके कारण सब लोग जानबूझकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं; अपनी मातृभाषा की अनदेखी कर रहे हैं; उसको भ्रष्ट करने में कोई संकोच नहीं है।
पर अब मझे आशा की किरण भी दिखायी पड़ रही है। कुछ पत्र-पत्रिकाएँ बहुत अच्छी हिन्दी लिख रही हैं। टेलीविजन चैनेलों पर भी ठीक-ठाक हिन्दी चल रही है। कभी-कभी तो अप्रत्याशित रूप से अच्छी धाराप्रवाह हिन्दी भी सुनने को मिल जा रही है। बहुत से विद्वान और विशेषज्ञ भी अच्छी हिन्दी बोलते हुए टीवी पर दिख जाते हैं।
चेतना अवश्य आयेगी।
aj telvisionk ki bhasa me khastuourl ki hindi patrakarita ki dhajeeya ud rahi hai bhasa ke star se ghatana ke marm ko nahee smajh ke script sahee dhang se nahee likhee ja rahee hai bada chadha kar kha jane ka saph matlab vevsaikta hai bas isse hi hindi patrakarita ki adharbhoot khatra hai ise bachane ka abhiyan jari rhana chahiye.
hai
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