कविता / बहस में अपराजेय / राजेन्द्र राजन

वे कभी बहस नहीं करते

या फिर हर वक़्त बहस करते हैं

वे हमेशा एक ही बात पर बहस करते हैं

या फिर बहुत-सी बातों पर बहस करते हैं एक ही समय

वे बहस को कभी निष्कर्ष की तरफ़ नहीं ले जाते

वे निष्कर्ष लेकर आते हैं और बहस करते हैं

जब वे बहस करते हैं तब सुनते नहीं कुछ भी

कोई हरा नहीं सकता उन्हें बहस में

- राजेन्द्र राजन.

3 Responses to “कविता / बहस में अपराजेय / राजेन्द्र राजन”


  1. 1 seema gupta August 28, 2008 at 9:43 am

    जब वे बहस करते हैं तब सुनते नहीं कुछ भी
    कोई हरा नहीं सकता उन्हें बहस में

    ” behas hum kisse se krtey, behas kerne mey jub vo maheer hain, ….”

    a very different kind of poetry to read abouit, appreciable words.

    Regards

  2. 2 Yogendra Joshi August 28, 2008 at 3:58 pm

    अधिकतर बहसें कुछ ऐसी ही होती हैं । बहस होती है अपनी पूर्वनिर्धारित धारणा को मनवाने के लिये । — योगेन्द्र

  3. 3 ernest albert October 23, 2009 at 11:05 am

    hum ikk aise dour mein se guz’r rhein hai Rajendra jis mei beh’s ke liye koi bhi taiyaar nahi…usske anek karan ho sakte hain..mujhe sabse b’da karan lagta hai ki likhai padhai kum karte hai log ab so kehne,beh’s karne laayak kuch bhi nahi hota…jinke paas hai woh alpsankhyak…so dheere dheere haashye ki taraf…sanand honge aap.


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