अजीब वक्त है / कुंवर नारायण

By अफ़लातून

अजीब वक्त है -

बिना लड़े ही एक देश- का देश

स्वीकार करता चला जाता

अपनी ही तुच्छताओं के अधीनता !

 

कुछ तो फर्क बचता

धर्मयुद्ध और कीट युद्ध में -

कोई तो हार जीत के नियमों में

स्वाभिमान के अर्थ को फिर से ईजाद करता ।

- कुंवर नारायण

( साभार : सामयिक वार्ता / अगस्त-सितंबर, १९९३ )

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3 Responses to “अजीब वक्त है / कुंवर नारायण”

  1. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    सुन्दर कविता।

  2. समीर लाल Says:

    वाह!! क्या बात है..कुंवर नारायण जी की रचना पसंद आई. आपका आभार.

  3. प्रभाकर पाण्डेय Says:

    सुंदरतम रचना।

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