अजीब वक्त है -
बिना लड़े ही एक देश- का देश
स्वीकार करता चला जाता
अपनी ही तुच्छताओं के अधीनता !
कुछ तो फर्क बचता
धर्मयुद्ध और कीट युद्ध में -
कोई तो हार जीत के नियमों में
स्वाभिमान के अर्थ को फिर से ईजाद करता ।
- कुंवर नारायण
( साभार : सामयिक वार्ता / अगस्त-सितंबर, १९९३ )
Tags: कुंवर नारायण, हिन्दी कविता, hindi poem, kunwar narayan
July 19, 2008 at 4:25 pm |
सुन्दर कविता।
July 19, 2008 at 6:24 pm |
वाह!! क्या बात है..कुंवर नारायण जी की रचना पसंद आई. आपका आभार.
July 19, 2008 at 8:11 pm |
सुंदरतम रचना।