चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को
अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए
हम आततायियों से लड़ते रहे
थके-हारे होकर भी
और इस लड़त में
जब हमारी कामयाबी का रास्ता खुला
और वे शब्द
लोगों के घरों
और दिलो-दिमाग़ में जगह पा गये
तो आततायियों ने बदल दिया है अपना पैंतरा
अब वे हमारे ही शब्दों को
अपने दैत्याकार प्रचार-मुखों से
रोज – रोज
अपने पक्ष में दुहरा रहे हैं
मेरे देशवासियों ,
इसे समझो
शब्द वही हों तो भी
जरूरी नहीं कि अर्थ वही हों
फर्क करना सीखो
अपने भाइयों और आततायियों में
फर्क करना सीखो
उनके शब्द एक जैसे हों तो भी .
- राजेन्द्र राजन
१९९५.
Tags: राजेन्द्र राजन, शब्द, हिन्दी कविता, hindi poem, rajendra rajan, shabd
July 8, 2008 at 2:23 pm |
बहुत सुन्दर व सारपूर्ण कविता है।
शब्द जादुई होते हैं
समझने वाले के लिए
केवल एक आवाज होते हैं
न समझने वाले के लिए
एक आह्वाहन भी हो सकते हैं
आतताइयों से लड़ने को
एक नारा भी हो सकते हैं
चुनाव लड़ने को
एक मरहम भी हो सकते हैं
चोट खायों के लिए
एक गाली भी हो सकते हैं
किन्हीं दुर्भाग्यवानों के लिए
जीने मरने का कारण
वे बन सकते हैं
मरते हुए को
जिला सकते हैं,
शब्द जादुई हुआ करते हैं।
घुघूती बासूती