बामियान में बुद्ध : राजेन्द्र राजन

बामियान में बुद्ध Buddha in Bamiyan 

 

 

 

 

 

 

 

निश्चिन्त होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से

अपनी बंदूकों , तोपों , बचे हुए विस्फोटकों

और अट्टहासों के साथ

अपनी समझ और हुकूमत के बीच

कि उनके मुल्क की ज़मीन पर

उसके इतिहास में

अब कहीं नहीं हैं बुद्ध

जहाँ वे खड़े थे सबसे ज्यादा मज़बूती से

वहां से भी मिटा दिए गए उनके नामोनिशान

अब कोई नहीं था उस सुनसान जगह में

जहां पत्थर भी कुछ कहते जान पड़ते थे

वहां हर शब्द था डरा हुआ

हर चीज़ खा़मोश थी दहशत से दबी हुई

बस हवा में एक सामूहिक अट्टहास था बेखौ़फ़

जो बामियान के पहाड़ों को रह-रह कर सुनाई देता था

 

तप रही थी ज़मीन तप रहा था आसमान

पहाड़ के टूटने की आवाज़

धरती की दरारों में समा गयी थी

हवा में भर गयी बारूद की गंध

सब दिशाओं में फैल गयी थी

तीन दिन बाद जब वहां कोई नहीं था

हर तरफ़ डरावना सन्नाटा था वहां नमूदार हुआ

लंबी नाक और चौड़ी टोड़ी वाला एक पठान

वह तपती ज़मीन पर नंगे पांव बढ़ा उस तरफ़

तीन दिन पहले जहां पर्वताकार बुद्ध थे

और अब एक बड़ा-सा शून्य था

उस ख़ाली अंधेरी जगह के पास जाकर वह रुक गया

कुछ पल खामोश रह कर उसने सिर झुका कर कहा-

क्षमा करें भगवन् ! हमें क्षमा करें !

 

बुद्ध ने आवाज़ पहचानी

यह ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां होंगे

फिर वे अपनी कोमल संयत गंभीर आवाज़ में बोले-

आप अवश्य आएंगे , मैं जानता था भंते !

कृपया इधर चले आएं इधर छाया में

आपके पांव जल रहे होंगे

 

सकुचाए लज्जित-से ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां

बुद्ध के और निकट गए

फिर सुना

किसी क्षमा करने का अधिकारी मैं नहीं

जो क्षमा कर सकते थे अब नहीं हैं

वे विलुप्त पथिक अक्षय शांति के खोजी

जिनकी खोज और साधना के स्मारक नष्ट किए गए

 

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां की आवाज़ अब भी नम थी :

यहां जो हुआ उससे पीड़ा हुई होगी भगवन !

 

पीड़ा नहीं

दुख हुआ है भंते

जब कोई सृजन विध्वंस के उन्माद का शिकार होता है

दुख होता है

पर पीड़ा का प्रश्न नहीं

जब मैं शरीर में था एक दिन अंगुलिमाल गरजा था :

रुक जाओ भिक्षुक

वहीं रुक जाओ

पर मैं रुका नहीं

जैसे कुछ हुआ न हो मेरे कदम आगे बढ़े निष्कंप

जो कंप सकता था वह मेरे भीतर से विदा हो चुका था

अब तो वह शरीर भी नहीं

 

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां थोड़ा सहज हुए

बुद्ध ने उनकी आंखों में झांका :

यह क्या, आपकी आंखें गीली क्यों हैं भंते ?

मुल्क की हालत ठीक नहीं है भगवन्

बरसों से हर तरफ़

ख़ून से सने हाथ दिखाई देते हैं

मारकाट जैसे रोज़ का धन्धा है

सब किसी न किसी नशे में डूबे हैं

होश का एक क़तरा भी खोजना मुश्किल है

डर का ऐसा पहरा है कि कि कोई कुछ बोलता नहीं

कोई कुछ सुनता नहीं

जो बोलते हैं मारे जाते हैं

अभी तीन रोज़ पहले यहां जो हुआ उससे

इत्तिफ़ाक़ न रखने वाले चार युवक पकड़ लिए गए

सुना है उन्हें सरेआम फांसी पर लटकाया जाएगा

 

कुछ पल के लिए एक स्तब्ध मौन मे डूब गए बुद्ध

जैसे ढाई हजार साल बाद

नए सिरे से हो रहा हो दुख से सामना

फिर सोच में डूबा उनका प्रश्न उभरा -

और , स्त्रियों की क्या दशा है भंते

 

उनका हाल बयान नहीं किया जा सकता भगवन्

वे पशुओं से भी बदतर हालत में जीती हैं

डर और गुलामी और सज़ा की नकेल से बंधी हैं वे

 

बुद्ध असमंजस में डूबे रहे कुछ पल

कि आगे कुछ पूछें या न पूछें

फिर उन्होंने पूछा :

और किसान किस हालत में हैं भंते

 

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां की अनुभव पकी आंखों में

गांवों के रोजमर्रा चित्र तैर गए :

फसलें सूख रही हैं भगवन्

किसानों की कोई नहीं सुनता

फ़ाक़ाकशी की छाया लोटती है मेहनतकश घरों में

हुक्मरान हथियार खरीदने के अलावा और कुछ नहीं करते

 

बुद्ध और ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ा के बीच एक सन्नाटा

खिंच गया

बुद्ध को चिंतित देख शर्म की ज़मीन पर खड़े बूढ़े पठान ने कहा :

भारत आपके लिए ठीक जगह है भगवन्

 

नहीं भंते

हथियारों के पीछे पागल हैं वहां के शासक भी

बहुत छद्म और पाखंड है वहां

मानवता के संहार का उपाय कर

वे कहते हैं : मैं मुस्करा रहा हूं

 

इसके बाद ख़ामोश रहे दो दुख

सहसा ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां का ध्यान हटा

उन्होंने सूखे आसमान की तरफ़ नज़र फ़िराई

लगा जैसे किसी बाज के फड़फड़ाने की आवाज़ आई हो

मगर चुँधियाती धूप में कुछ दिखाई नहीं पड़ा

फिर उनका ध्यान लौटा उस जगह

जो तीन दिन पहले हमेशा के लिए ख़ाली हो गई थी

वहां न बुद्ध के होने का स्वप्न था न उनके शब्दों का अर्थ

ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां खड़े थे अकेले

बामियान के पथरीले सन्नाटे में ।

 

- राजेन्द्र राजन.

9 Responses to “बामियान में बुद्ध : राजेन्द्र राजन”


  1. 1 Rajesh Roshan June 27, 2008 at 9:32 am

    बहुत ही उम्दा

  2. 2 उदय प्रकाश June 27, 2008 at 10:04 am

    यह कविता मैने ‘दोआबा’ में भी पढी थी. खान अब्दुल गफ़्फ़ार खां यानी ‘सीमांत गांधी’… बुद्ध और उनके बीच का संवाद, जैसे ‘दो दुखों के बीच का संवाद’.
    मैं नहीं जानता र्राजेंद्र राजन कौन हैं, उनसे कोई निजी परिचय और संपर्क नहीं, लेकिन मैं कविता की अब तक की समूची स्म्रिति, संवेदना और समझ के साथ कह सकता हूं कि वे इस समय के सबसे ज़रूरी, मूल्यवान कवि हैं. एक गहरी लोकसंप्रिक्ति, मुक्तिबोध के शब्दों में ‘आत्मचेतस’ भी और ‘विश्वचेतस’ भी…मैं हिंदी साहित्य का एक निर्वासित नागरिक लेखक हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि राजेंद्र राजन की कई कविताएं हमारे समय और यथार्थ की उन अव्यक्त या दमित आवाज़ों को व्यक्त करती हैं जो सत्ताओं की चाकरी में हाकिमों की पिटी-पिटाई, बासी क्लीशेड भाषिक पुनरुक्तियों को कविता मनवाने के लिये संस्थानों और बदनाम राजनीतिक लेखक संगठनों का सहारा लेती हैं और उनसे असहमति रखने वाले लेखक को हर तरह से समाप्त करने का बर्बर ख्रेल खेलती हैं…
    मैं शायद इतना अलग और अकेला हूं कि राजेंद्र राजन की कविताओं को वैसी केंद्रीयता और उनका श्रेय नहीं दिला सकता ..लेकिन सच तो यह है कि ये कविताएं अमूल्य हैं…उनकी कविताएं अपना मुकाम हासिल करें..ऐसी शुभकामना है…
    मैं अपने ब्लाग पर इस कविता को भि देना चाहूंगा…

  3. 3 ghughutibasuti June 27, 2008 at 11:01 am

    बर्बर मानव के बीच
    बुद्ध कहाँ से टिक पाएँगे,
    ढूँढ लें कहीं और ठिकाना
    इस जग में ना वे रह पाएँगे।
    मानवता की हैं उड़ी चिन्दियाँ
    चट्टानों की क्या औकात बची है,
    कर देंगे हम सपाट जगत को
    कुछ भी ना हम रहने देंगे।
    यह जग है सिर्फ हमारा
    और हमारी तोपों का,
    पशु पक्षी नहीं चाहिए
    ना ही कोई हरियाली।
    हमें दे दो अणु बम बस एक
    फिर देखो हमारी कारिस्तानी,
    अरबों वर्षों से जीती इस धरा को
    इक खौफ़नाक हम मौत दे देंगे।
    घुघूती बासूती

  4. 4 दीपक भारतदीप June 27, 2008 at 1:22 pm

    अफलातून जी
    आपकी प्रस्तुत बहुत अच्छी लगी। आपके लिये मेरी शुभकामनायें। आपकी पंक्तियां देखकर कुछ विचार आये तो उसे कविता में लिख दिया।
    …………………………………..
    दीपक भारतदीप

    कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नहीं मानेंगे
    पर भगवान के बुत उड़ाने पहुंच जाते
    जवाब नहीं देना इसलिये
    तोपों से गोले बरसाते
    ऐसे में सवाल भला कहां से आते

    जो पत्थर के बुतों मे भगवान देखते
    वह भी भला जिंदगी को कहां समझ पाते
    कि कई सभी पत्थर ऐसा सम्मान नहीं पाते
    दिल में है अगर उसकी तस्वीर
    वही पत्थरों में भी नजर आती है
    वह श्रद्धा ही है जिसे हम वहां देख पाते
    मगर फिर भी पत्थर पूज
    कर लेते अपने कर्तव्य की इतिश्री
    फिर दया और धर्म से दूर हो जाते

    विश्वास और पाखंड की जंग
    सदियों से जारी है
    कभी दिखती कम
    कभी होती भारी है
    नहीं जानते लोग धर्म का मर्म
    बाहर शोर मचाकर छिपते हैं अपने आप से
    अपने खाली दिल दिमाग में
    झांकते ही आती उनको शर्म
    जहां न अज्ञान का अंधेरा है
    लालच का डेरा है
    अपनी नाकामियों से उपजे क्रोध ने
    उनको घेरा है
    पुरानी किताबों के अर्थ रहित प्रसंग
    नये जीवन का बनाते अपने अंग
    पत्थर टूटने से श्रद्धा नही टूटती जिनकी
    वही सर्वशक्तिमान को समझ पाते
    बुतों से खौफ खाने वाले
    इंसान भी बहुत हैं
    भले ही कहते उसमें नहीं देखते
    फिर क्यों तोड़ने जाते
    मन में रहता है खौफ या विश्वास
    जिन्होंने लगाई ज्ञान सागर में डुबकी
    वही भक्ति और सत्संग पाते
    तलवारों और तोपों की संगत वाले
    अपने हिस्से तो केवल खौफ ही पाते
    …………………………

  5. 5 cartoonist ABHISHEK June 27, 2008 at 4:41 pm

    HOSH KA EK QATRA BHI KHOJNA MUSHKIL HAI……
    badhai rajan ji ko

  6. 6 हर्षवर्धन June 27, 2008 at 9:34 pm

    बेहद सशक्त रचना।

  7. 7 jitendra bhagat September 4, 2008 at 2:52 pm

    मर्मस्‍पर्शी

  8. 8 प्रियंकर August 3, 2009 at 5:03 pm

    पृथ्वी के दो महान सपूतों का वार्तालाप और उसके बाद उनके खामोश दुख का हाहाकार . सिर्फ़ बामियान क्यों, समूची दुनिया में है पथरीला सन्नाटा . बोलते हैं तो सिर्फ़ हथियार .

    मैं पुनः कहूंगा राजन हमारे अनूठे कवि हैं . उनके जैसी संवेदना और करुणा और उसके अनुरूप कहन की अनुद्धत भंगिमा वर्तमान हिंदी कविता के परिदृश्य में विरल है .

    जो लोग हिंसा के विरोध में उद्धत होकर मुंह से गोली चलाने लगते हैं और तुरत वाचिक हिंसा पर उतर आते हैं,वे इस शैली से बहुत कुछ सीख सकते हैं .

    राजन कविता की विनम्र किन्तु ताकतवर शैली के सिद्ध कवि हैं . वे मेरे प्रिय कवि हैं .


  1. 1 दो कविताएं : श्रेय , चिड़िया की आंख , राजेन्द्र राजन « समाजवादी जनपरिषद Trackback on February 26, 2009 at 8:38 pm

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