‘निर्मल आनन्द’ और ‘अज़दक’ आगे, चिट्ठाजगत पीछे

    वर्डप्रेस वाले खुले स्रोत में यक़ीन रखते हैं , लिनक्स वालों की तरह । पिछले दिनों वर्डप्रेस ने अपने चिट्ठों की बाबत तफ़सील से आवाजाही की तालिका देनी शुरु की हैं । अपने चिट्ठे समाजवादी जनपरिषद से सम्बन्धित तालिकाओं को यहाँ दिया ।

  सांख्यिकी का विद्यार्थी होने के नाते कुछ सुकूनदायक आँकड़ों की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहिए । चिट्ठाजगत जैसे कम लोकप्रिय संकलक की तुलना में मेरे मित्र चिट्ठेकार अभय तिवारी के ‘निर्मल आनन्द’ तथा प्रमोद सिंह के अज़दक ने मेरे इस चिट्ठे पर अधिक पाठक भेजे | १५ अलग - अलग हिन्दी चिट्ठों से कुल ५७३ बार पाठक मेरे चिट्ठे पर पधारे । आने वालों की तादाद से सिर्फ़ आधों को मैं अन्य चिट्ठों पर भेज सका ( २८७ पाठक ) । प्रियंकर , मनीष और घुघूती बासूती के चिट्ठे प्रथम तीन हैं जिन पर मेरे चिट्ठे से लोगों ने जाना मुनासिब समझा । कुल २५ मित्र चिट्ठों ( जिनकी मैंने कड़ियाँ दी हैं ) पर मेरे इस चिट्ठे से लोग गए ।

    सबक : मित्रों की कड़ी अपने चिट्ठे पर दो , मित्र तुम्हारे चिट्ठों की कड़ी देंगे । नतीजा बढ़ी हुई आवाजाही ।

      

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5 Responses to “‘निर्मल आनन्द’ और ‘अज़दक’ आगे, चिट्ठाजगत पीछे”

  1. kakesh Says:

    सही सबक है जी.अमल करता हूँ.

  2. chandrabhushan Says:

    मुझे यह करने नहीं आता। कम से कम बीस मेरे प्रिय ब्लॉग ऐसे हैं, जिनका लिंक अपने यहां देने का मन करता है, लेकिन मुझे यह आता ही नहीं। यही नहीं, ब्लॉगिंग तकनीकी से जुड़ा हुआ कुछ भी, यहां तक कि हाइपरलिंक देने भी नहीं आता, न ही यह सब सीखने का समय और साधन उपलब्ध है। ब्लॉग बनाते समय राहुल पांडे जो लिंक और विगनेट्स डाल गए थे, वही अबतक पड़े हैं। शायद पाठकों तक पहुंचने-पहुंचाने में लिंक्स से कुछ मदद मिलती हो, लेकिन मैं यह करूं तो कैसे करूं।

  3. प्रमोद सिंह Says:

    चंदू प्‍यारे, चुल्‍लू भर पानी लो, गौर से उसे निरखो, फिर उसमें बूड़ मरो. घबराहट हो तो अपने साथ बूड़ने के लिए मुझे भी बुला लो.. चूंकि विज्ञान संबंधी निबंधों को पढ़ते हुए मेरी दशा भी कुछ बहुत अच्‍छी नहीं ही महसूस होती तो बूड़ जाने का कुछ फर्ज़ मेरा भी बनता है..

  4. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    अरे आपके बगल में पूरा समुन्दर है प्रमोद जी. एक बार उसका इस्तेमाल करके भी तो देखिए.

  5. संजय तिवारी Says:

    thik baat.

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