गाओ वसन्ततिलका…

vasantatilaka ( स्लाइड शो )

    महुआ के बेतरह गिरते सूखे पत्तों के साथ - साथ उसके फूल भी टपकने लगते हैं । ‘ महुआ वीथिका’ (चित्र २) की सड़क रस से चिपचिपी हो गई है । लगातार कमर झुकाए पत्ते बीनते जो मुसहर परिवार परिवार दीखते थे वे फूल बीनते नहीं दीखते । महुए के फूल बीनने वाले उनसे कुछ बेहतर स्थिति वाले हैं । महामना मालवीय के समय से ही इस परिसर में मुसहर परिवारों द्वारा पत्ते तोड़ने पर रोक नहीं रही । ‘पृथ्वी प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त देती है।’।

   सेमर के पत्तेविहीन पेड़ों से रूई फूट फूट कर उड़ने लगी है (चित्र ८)। इनके लाल और दुर्लभ पीले फूल तो होली के पहले आ कर जा चुके हैं । जिन फल्लियों में अत्यन्त नरम रूई भरी है उनकी लम्बाई से बराबरी करती सैकड़ों मैना के झुंड इन विशाल नग्न सेमरों पर ही कलरव करते हुए आराम करते हैं ।

    वसन्त के इस दौर में मेहमान हैं रूसी हारिल (चित्र ३ ,४) । फ़ाख़्ते ( चित्र ५) - कबूतरों के भाई बन्द ।अत्यन्त शर्मीले। परिसर की सड़कों के जिन हिस्सों से सुबह टहलने वाले कम गुजरते हैं , उनके किनारे लगे दरख़्त हारिलों को प्रिय हैं । धनराजगिरी छात्रावास के सामने के महुए पर प्राय: इनके दर्शन होते हैं । जिस दिन दो कौए उस पेड़ पर होते हैं , हारिल मानो हेरा जाते हैं । मुम्बई के चाचा - भतीजे इन्हीं कौओं के गोत्र के होंगे । प्रवासियों के घरौंदों मे अपने अण्डे देने-सेने की फिराक में ।

    हारिलों के बारे में जिन सुबह टहलने वालों से जानना चाहा संयोग से दोनों पूर्व शिकारी हैं । रतन ने बताया कि कहावत है - ‘ हारिल-लकड़ी के अछूट रिश्ते की ‘ । पानी पीते वक्त भी इनके पंजे में कोई लकड़ी जरूर होती है । डॉ. सुशील सिंह ने बताया कि यह आहार बनने वाले परिन्दों में एक है ।

 

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3 Responses to “गाओ वसन्ततिलका…”

  1. lovelykumari Says:

    bahut sundar chhitr bashant ka.

  2. Atul Kumar Says:

    आओल रितुपति राज वसत. गाओल अलिकुल माधवी पंथ.

  3. - लावण्या Says:

    बहुत अच्छा लिखा है ,
    हमेशा की तरह अफलातून जी !

    - लावण्या

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