रंगमंच के सोना थे सोनाबाबू : ले. कुँवरजी अग्रवाल

  सोनाबाबू ( अवधबिहारीलाल श्रीवास्तव ) नहीं रहे । उनके साथ ही काशी रंगपरिवेश का एक अध्याय पूरा हो गया । मेरे लिए सोनाबाबू को याद करना पिछली आधी शती के अपने ही नाट्यजीवन को याद करने जैसा है । इस आधी सदी में बनारस के थियेटर ने कितने रंग बदले ।

    आज से पचास साल पहले मैंने उन्हें पहली बार अभिनय करते देखा था । मैदागिन स्थित टाउनहाल का ऐतिहासिक भवन था जिसे आम जनता अंधरी कचहरी के नाम से जानती थी । उन्नीसवीं शती के साठ के दशक में अंग्रेजी हुकूमत ने पहली बार आनरेरी मैजिस्ट्रेटी की प्रथा चालू की थी और काशी के कई रईसों को आनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाकर उन्हें छोटे-मोटे मामलों की सुनवाई और फैंसले का अधिकार सौंपा था । भारतेंदु भी उनमें से एक थे । उनकी कचहरी यहीं लगा करती थी । उसी समय आम जनता की जुबान पर आ कर आनरेरी अंधरी बन गया । स्वयं भारतेन्दु ने प्रेमजोगिनी में इस और इशारा किया है- ‘ और कहिए अंधरी मजिस्ट्रों का क्या हाल है ? ‘ बाद में यहाँ कचहरी बन्द हो गयी और यह भवन सार्वजनिक कामों के लिए म्युनिसिपैलिटी को सौंप दिया गया । स्वतंत्रता के बाद मैंने इसी भवन में कई नाटक किए और देखे हैं । उस समय नागरी नाटक मंडली का प्रेक्षागृह नहीं बना था और उसकी जगह खुला मैदान था । रंगमंच जरूर विशाल और भव्य था लेकिन वह कुछ इस तरह सीलबंद कर रखा जाता था कि उसे खुलवाना और सफाई करवाना अपने आप में एक छोटा-मोटा नाटक करने जैसा था । इसीलिए ज्यादातर शौकिया नाट्य मंडलियाँ टाउनहाल को ही अपनी प्रस्तुतियों के लिए चुनती थीं ।

    बांग्ला व्यावसायिक रंगमंच पर सफलता अर्जित कर चुके सत्य बंद्योपाध्याय के स्फीत भावनाओं से ओतप्रोत नाटक एरा ओ मानुष - ये भी इंसान हैं- के मुख्य चरित्र मानसिक रूप से विकलांग दासू का चुनौतीपूर्ण अभिनय सोनाबाबू ने किया था । निर्देशक प्रभातकुमार घोष और अनुवादक दया गिरी थे । प्रस्तुत करने वाली उस समय की सबसे  महत्वपूर्ण संस्था थी श्रीनाट्यम । सोनाबाबू के साथ ही इस संस्था से जुड़े़ और भी कई निष्ठापूर्ण रंगकर्मियों की यादें आ रही हैं । त्रिलोचन प्रसाद भार्गव , गोविन्द प्रसाद केजरीवाल , डॉ. कौशलपति तिवारी , कौतुक बनारसी , मंगला भगत , रामचन्द्र विश्वकर्मा , रामउजागर शर्मा , शमशेर बहादुर सिंह ,- फिल्मों के सुजीत कुमार - आदि । उन्नीस जुलाई १९५८ ई. को हुई यह प्रस्तुति मुझे इसलिए भी याद है कि मेरी नाट्य समीक्षा का श्रीगणेश भी इसी के साथ हुआ , जब नाटक से लौटने के बाद देर रात तक जाग कर सहज प्रभाव प्रेरणावश मैंने इसकी लंबी समीक्षा लिख डाली थी ।

   इस नाटक की उसी वर्ष पांच प्रस्तुतियाँ हुईं । इनके दर्शक या तो श्रीनाट्यम के सदस्य होते थे या फिर टिकट खरीदने वाली जनता । बिना किसी सरकारी अनुदान इसकी प्रत्येक प्रस्तुति आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती थी । किसी अव्यवसायी नाट्य संस्था की यह ऐसी उपलब्धि थी जो काशी में बहुत कम दुहराई जा सकी । गोविन्द प्रसाद केजरीवाल को जब यह पता लगा कि मैंने ये भी इंसान हैं की लंबी समीक्षा लिखी है तो वे मुझे बुलाकर नाट्यम के रिहर्सल में ले गये जहाँ मैंने कलाकारों के सामने अपनी समीक्षा का पाठ किया । बड़ा अनोखा अनुभव था । उसी समय अन्य कलाकारों के अलावा सोना बाबू से मेरा सीधा परिचय हुआ । प्रसंगवश यह रिहर्सल भी बांगला के लोकलुभावन नाटक परिछय के हिन्दी अनुवाद का चल रहा था जिसकी प्रस्तुति इसी वर्ष १३ सितंबर को हुई थी । श्रीनाट्यम तेज रफ़्त्यार से आगे बढ़ रहा था ।

[ जारी ]

प्रख्यात नाट्यविद एवं लेखक कुँवरजी अग्रवाल ख्यातनाम नाट्य निर्देशक हैं तथा नैशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में प्राय: जाते हैं । साझा संस्कृति मंच के वे संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं । ‘ सुबहे बनारस’ ,हिन्दुस्तान से साभार ।

5 Responses to “रंगमंच के सोना थे सोनाबाबू : ले. कुँवरजी अग्रवाल”

  1. अजित वडनेरकर Says:

    बहुत बढ़िया संस्मरण। इसे जारी रखिये। काशी के जितने आयामों को देखा जाए, उतनी ही बहुआयामी नज़र आती है।

  2. मैथिली Says:

    रोचक संस्मरण
    श्री सोनाबाबू के बहाने आप हमें काशी के तत्कालीन रंगमंच से परिचय करा रहे है.

  3. प्रियंकर Says:

    बहुत अच्छा लगा सोना बाबू के बारे में जानना . काशी के शुरुआती रंगेतिहास में श्रीनाट्यम का महत्वपूर्ण स्थान है . दस्तावेजीकरण के लिए कुंवर जी अग्रवाल को बधाई पहुंचे .

  4. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    अगली कडी का इंतज़ार रहेगा.

  5. मनीष Says:

    शुक्रिया इस जानकारी के लिए..

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