होली पर शिवप्रसाद मिलन के बाद संवाद :
के हव ?
के के हव ?
केके हव?
का केके हव?
केके का हव ?
केके केके हव ?
केके केके का हव ?
काशी विश्वविद्यालय और बनारस पर
होली पर शिवप्रसाद मिलन के बाद संवाद :
के हव ?
के के हव ?
केके हव?
का केके हव?
केके का हव ?
केके केके हव ?
केके केके का हव ?
माकपा से अलग हो कर अलग दल बनाने वालों में चारू मजुमदार, कानू सान्याल , नागभूषण पटनायक ,जंगल सांथाल, रवि दास , असीम चटर्जी आदि प्रमुख नेता थे । ‘ बुर्जुआ लोकतंत्र ‘ को नकारना और वर्ग शत्रु का ख़ात्मा प्रमुख वसूल थे जिनके आधार पर भाकपा(मा-ले) बना।
अत्यन्त मेधावी अधिवक्ता नागभूषण पटनायक का कार्यक्षेत्र दक्षिण ओडिशा तथा आन्ध्र का सीमावर्ती इलाका था ।तेलुगु , ओड़िया,अंग्रेजी पर वे समान रूप हक रखते थे। ‘ वर्ग शत्रु के खात्मे’ के लिए उन्हें फाँसी की सजा हुई।इस दौरान एक बार वे जेल से निकलने में भी सफल रहे। उस वक्त भी इस बुजुर्ग महिला की झोपड़ी में वे टिके थे।
आज लिखना है उस महिला की बाबत- जिसके बटुए में नागभूषण की तस्वीर रहती थी,जिन्हें जेल से दर्जनों खत नागभूषण ने लिखे और जिसकी गोद में ममतामयी शरण उन्हें मिलती थी।
१९३४ में गांधीजी की अस्पृश्यता विरोधी यात्रा चल रही थी। एक दिन कई सभाएं और लम्बा चलने के कारण गांधीजी ने दण्डमुकुन्दपुर नामक गाँव की यात्रा रद्द कर दी। उस गाँव में ,जहाँ कभी सवर्ण हिन्दू ने पदार्पण नहीं किया था – के लोगों ने भी महात्मा की इस चूक को माफ़ कर दिया था। लेकिन ३० वर्षीय मालती देवी चौधरी के गले यह नहीं उतरा और उसने गांधीजी से बेबाक तरीके से कहा,’ बापू , आपने यह ठीक नहीं किया।’
महात्मा ने माफ़ी माँगी और परास्त करने वाली एक मुस्कान दी।मालती ठण्डी पड़ीं लेकिन गांधी ने उस समय से इस महिला की मौजूदगी में हमेशा कहा – ” तूफ़ानी आ गयी”।
मालती देवी शान्तिनिकेतन के पहले बैच की छात्रा थीं और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के लिए कहानी और कविता की प्रेरणा भी बनी थीं। शन्तिनिकेतन में ही ग्रामीण अर्थशास्त्र का एक पाठ्यक्रम करने आए ओड़िशा के नवकृश्ण चौधरी से उनकी मित्रता हुई और १९२७ में विवाह हुआ। १९३० में अपनी जेठानी श्रीमती रमादेवी के साथ नमक सत्याग्रह में महिला वाहिनी के साथ भाग लेने वाली वे प्रमुख महिला थीं।गांधी-इर्विन समझौते के बाद वे जेल से रिहा हुईं।१९३५-३६ में सिर पर बिस्तर रख कर वे गांव गांव किसान मजदूरों को संगठित करने निकलतीं,गीत गा कर लोगों को जुटातीं।उत्कल कृषक संघ की वे संयुक्त सचिव रहीं।१९३५ में नवकृष्ण पहली बार विधायक चुने गए , तब १९३७ में बिहार-ओडिसा काश्तकारी कानून को रद्द कराने के लिए मालती देवी ने विशाल रैली आयोजित की- पूरा मन्त्रीमण्डल उनसे मिलने पहुँचा और कानून रद्द हुआ,जोतने वाले को फसल पर और मछली पकड़ने का हक मिला।जयप्रकाश नारायण ने कंग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शरीक होने का आवाहन किया तब ओडिशा में ‘कांग्रेस वर्कर्स कम्युनिस्ट लीग’ नाम से संगठन खड़ा कर चुकी थीं। ओडिशा के राजाओं द्वारा अत्याचार-शोषण के खिलाफ़ आन्दोलन का भी उन्होंने नेतृत्व किया।
वे संविधान सभा के लिए चुनी गयी , परन्तु साम्प्रदायिक दंगों के खिलाफ़ नोआखाली में गांधीजी के अभियान को उन्होंने ज्यादा महत्वपूर्ण माना।
१९३८ में अंग्रेजों के सिपाही एक नदी पार करना चाहते थे।फेरी लगाने वाले १२ वर्षीय बाजी राउत ने उन्हें पार ले जाने से इनकार कर दिया। अंग्रेजों की गोली खा कर वह शहीद हो गया लेकिन अपने गांव को सैनिकों के दमन से बचा लिया। मालती देवी ने अनुगुल में बाजी राउत के नाम से दलित और आदिवासी लड़के-लड़कियों के लिए एक छात्रावास बनाया। नवकृष्ण सात वर्ष ओड़िशा के मुख्यमन्त्री रहे तब भी मालतीदेवी अनुगुल के बाजी राउत छात्रावास में ही रहीं।
उनके द्वारा प्रशिक्षित कार्यकर्ता दक्षिण ओडिशा के आदिवासी इलाकों में काम करती थीं(आजादी के बाद)।इन लोगों ने बताया कि नक्सलवाद के दमन के नाम पर गांव-गांव में पुलिस कितना अत्याचार कर रही है।इसके बाद मालती देवी ने आजाद भारत का पहला नागरिक अधिकार संगठन स्थापित किया।
इस संगठन ने नागभूषण पटनायक की फाँसी के विरुद्ध भी अभियान चलाया। मालती देवी आपात काल में भी १९ महीने जेल में रहीं।
हाँलाकि रिहाई के बाद नागभूषण ईण्डियन पीपल्स फ्रण्ट के अध्यक्ष बने लेकिन उनके समूह के उत्तर भारतीय साथी उनके बारे में गहराई से जानकारी रखने में शायद रुचि नहीं रखते थे।
हृदय की सर्वाधिक उद्घाटक जाँच (एन्जियोग्राफी) के बाद मेरे हृदय रोग विशेषज्ञ ने यह साफ़ कर दिया था कि चूँकि मेरे हृदय की तीन स्नायु-तन्तु रोगग्रस्त हैं इसलिए उनका उपचार खुले हृदय की शल्य क्रिया ही है । शल्य चिकित्सकों का समूह मुझसे मिलने आया और बता गया कि तीन से पाँच फीसदी विफलता इस ऑपरेशन में रहती है।एन्जियोग्राफी की रपट के बारे में मेरी बहन ने गुजरात के एक चिकित्सक से भी मशविरा किया।आम तौर पर पर शल्य क्रिया से बचने की बात करने वाले इन हृदय रोग विशेज्ञ ने भी ऑपरेशन के पक्ष में राय दी।
विफलता की सम्भावना भले ही पाँच फीसदी ही हो फिर भी उसे तरजीह देना मुझे मूर्खता नहीं लगी।ऑपरेशन थियेटर में घुसने के पहले वर्डप्रेस के चिट्ठों का कूटशब्द अपनी डायरी में लिखा।इसके पूर्व हाथ-गोड़ तोड़ने का भी कोई तजुर्बा मुझे नहीं था।विश्वविद्यालय के चीफ प्रॉक्टर द्वारा भाड़े के सुरक्षा सैनिकों से बुरी तरह मार खाने का एक तजुर्बा मेरे खाते में था।उस घटना में , मेरे साथ पकड़े गए दो छात्रों को ‘सूरज की तरफ देखने’ की सजा दी गयी थी।
गत पाँच महीनों से नियमित सुबह टहलना और नियन्त्रित भोजन के कारण कॉलेस्ट्रॉल २७० से१४२ तक आ गया था।मेरे कुटुम्बीजनों को उम्मीद हो चली थी कि ऑपरेशन की नौबत नहीं आएगी।
बहरहाल , २२ फरवरी को मुझे भरती कर लिया गया,२६ तक जाँचें हुईं। २६ फरवरी को डॉ. शान्तनु पाण्डे ने दो ऑपरेशन किए-हृदय बाई-पास के।मेरे अलावा शहडोल के कुशवाहाजी का।कुशवाहाजी २९ फरवरी को सरकारी सेवा से रिटायर कर गए।
हृदय शल्य के गहन चिकित्सा कक्ष में डॉ. उद्गीत धीर ने मुझे बताया कि ऑपरेशन थियेटर से जुड़े एक कमरे में मेरे एन्जियोग्राम के आधार पर मेरे हृदय पर चर्चा हुई और शल्य-रणनीति बनाई गई।ऑपरेशन थियेटर से बेहोशी की अवस्था में ही गहन चिकित्सा में लाया गया । होश आते ही मेरी पत्नी को मेरे करीब लाया गया।उनकी मौजूदगी से मुझे लगा कि ऑपरेशन सफल हो गया है।
इस बड़ी शल्य क्रिया से पूर्व मेरे लिए ६ बोतल खून-दान हुआ- मेरी बेटी प्योली,भान्जी चारुस्मिता,विनोद सिंह व सुजीत(मेडिकल छात्र)डॉ. सन्दीप पण्डे की ‘आशा’ संस्था से जुड़े़ रजनीश व समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय सचिव चंचल मुखर्जी ने एक एक बोतल खून दिया।
स्वाति ने उन तमाम मित्रों की सूची बना कर रखी थी जिन्होंने फोन पर मेरी खबर ली।
हृदय शल्य क्रिया के गहन चिकित्सा कक्ष में पाँच दिन रखा गया।अन्य मरीजों की नाजुक हालत का प्रभाव मुझ पर भी पड़ा और एक रात मेरी रक्त चाप भी धड़धड़ा कर गिरा। ई सी जी दरसाने वाले मॉनीटर में गिरा रक्तचाप मैंने भी देखा।
कुछ घण्टे ऐसे भी गुजरे जब असम आन्दोलन के दौरान हमारे साथियों के लिए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिखी कविता की पंक्तियाँ याद आईं-
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाश पड़ी हो,तब तुम क्या गा सकती हो?
‘मृत्यु की घोषणा’ और घोषणा में विलम्ब का अनुभव भी प्राप्त हुआ।
गहन चिकित्सा कक्ष में मेरे साथ दो किताबें थीं। महेश्वर का कविता संग्रह- ‘आदमी को निर्णायक होना चाहिए’ और किशन पटनायक की ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’।दोनों ही किताबों में ड्यूटीरत नर्सों ने बहुत रुचि ली।महेश्वर की ज्यादातर कविताओं का परिवेश(इस संग्रह का) और नर्सों की नौकरी का परिवेश एक है इसलिए उन्हें पढ़ने में विशेष रुचि थी।’चीफऔर लेनिन’ नामक कविता पृष्ट बत्तीस पर है-यह एक नर्स दूसरे को बता देतीं,फिर पूरा रस लिया जाता।
किशनजी की किताब से ‘मृत्यु पर बयान’ और गांधी और स्त्री’ शीर्षक के निबन्ध सर्वाधिक प्रिय थे।
इस बड़ी शल्य क्रिया में सफलता की शुभेच्छा पाना जीते जी श्रद्धान्जलि प्राप्त करने जैसा था।उन सब साथियों के प्रति मैं भी एक संक्षिप्त मौन(खड़े रहकर) प्रकट कर रहा हूँ।
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