प्रशस्ति गायक : राजेन्द्र राजन
उन्हें कभी नहीं सताता पराजय का बोध
वे हमेशा विजेताओं की जय बोलते हैं
अखंड होता है उनका विश्वास
कि विजेता आएंगे जरूर
विजेताओं की प्रतीक्षा में
वे करते रहते हैं प्रशस्तियां गाने का अभ्यास
उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं
कि विजेता कौन हैं
कहां से आ रहे हैं वे जाएंगे किधर
उन्होंने जिनको जीता
क्या बीता उन पर
वे कभी नहीं देखेंगे
विजेताओं का इतिहास
उनके इरादे उनकी योजनाएँ
उनके विचार
वे बस देखेंगे विजेताओं के
चमकते हथियार
बढ़ते हुए काफिले
उन्माद की पताकाएं
और जय जयकार में शामिल हो जाएंगे
विजेता भले ही उनके घर लूटने आ रहे हों
वे खड़े हो जाएंगे स्वागत में
पूरे उत्साह से लगाएंगे
विजेताओं के पक्ष में नारे
उन्हें बस चाहिए
जीतने वाले के पक्ष में होने का सुखद
अहसास !
- राजेन्द्र राजन
स्रोत : सामयिक वार्ता / जनवरी २००८
Tags: प्रशस्ति गायक, राजेन्द्र राजन, सामयिक वार्ता, हिन्दी कविता, prashasti gayak, rajendra rajan, samayik varta
January 13, 2008 at 12:03 pm
कितनी सटीक कविता है…. विजेता और प्रशस्ति गायक के बीच का संबंध कितना सनातन और चिरकालिक है….
January 13, 2008 at 1:57 pm
सुंदर कविताएं.
January 16, 2008 at 7:28 am
उन्हें बस चाहिए
जीतने वाले के पक्ष में होने का सुखद
अहसास !
—-
बहुत सही कहा ।
January 16, 2008 at 3:24 pm
Bahut Achi evam satik kavita. badhai