तलाश एक नए मार्क्सवाद की (३) : ले. सुनील

    संभवत: यही कारण है कि सोवियत संघ के शासकों को औद्योगीकरण के लिए सस्ता अनाज एवं सस्ता श्रम पाने के लिए किसानों को कम कीमतें देने तथा विरोध करने पर बड़े पैमाने पर किसानों का कत्ल एवं निर्वासन करने में कोई अपराध-बोध नहीं हुआ । संभवत: यही कारण है कि आज भी भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों का मुख्य आधार संगठित क्षेत्र के मजदूर एवं कर्मचारी ही हैं ।यही कारण है कि देश के किसान आन्दोलनों को बहुत से वामपंथी ‘ कुलक आन्दोलन ‘ कहकर उन्हें शंका की निगाहों से देखते रहे । शायद यही कारण है कि माकपा के नेताओं को बंगाल व भारत के संदर्भ में पूंजीवाद का विकास प्रगतिशील एवं इतना जरूरी लगता है कि इसके लिए टाटा व सालेम कंपनी को बुलाने में कोई हर्ज नहीं दिखता । और संभवत: यही कारण है कि विकास के नाम पर उन्हें पश्चिमी ढंग का औद्योगीकरण ही सूझता है और उसके किसी देशज विकल्प के बारे में वे सोच भी नहीं पाते । स्वयं राजेन्द्र यादव इन मान्यताओं के शिकार मालूम पड़ते हैं  , जब वे कहते हैं कि ‘ सच है औद्योगीकरण विकास की अनिवार्यता है और यह भी सच है कि जहाँ विकास होगा वहाँ विस्थापन भी होगा ही ‘ । आखिर क्यों ? इसका कोई तर्क देने की जरूरत श्री यादव नहीं समझते । क्या छोटे छोटे ग्रामोद्योगों [पर आधारित औद्योगीकरण नहीं हो सकता , जिसमें किसी को विस्थापित करने की जरूरत न हो , जिसमें सबको रोजगार मिले और जिसके लिए किसी टाटा या सालेम से गलबहियाँ करने की जरूरत न पड़े ? ऐसा ग्रामोद्योग , छोटा उद्योग , खेती आदि हमारे विकास के केन्द्र क्यों नहीं हो सकते ?

    यह एक विचित्र बात है कि आधुनिक पूंजीवादी-उदारवादी दर्शन एवं शास्त्रीय मार्क्सवादी विचार दोनों की आधुनिक औद्योगीकरण और विकास में गहरी निष्ठा एवं श्रद्धा दिखाई देती है और इस मामले में दोनों में एक हैं । किंतु अब तक के अनुभव से साफ हो चुका है कि ऐसे औद्योगीकरण एवं विकास में कम से कम तीन बातें अनिवार्य और अंतर्निहित हैं । एक , मजदूरों का शोषण । दो , औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी शोषण । ये उपनिवेश या नवौपनिवेश देश के बाहर भी हो सकते हैं और देश के अंदर पिछड़े इलाकों , खेती , गांव व असंगठित क्षेत्रों के रूप में आंतरिक उपनिवेश भी हो सकते हैं । तीन , प्रकृति के साथ टकराव ।बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों की लूट , बरबादी व उस पर निर्भर आबादी का विस्थापन व बेदखली इसमें निहित हैं । यदि मार्क्सवाद इस औद्योगीकरण , विकास और इससे उपजी कुछ लोगों की जीवन शैली को प्रगति का पर्याय मानता रहेगा , तो वह अपनी गलतियों को बार – बार दोहराता रहेगा । चाहे चीन हो या बंगाल , विकास की यह राह सिंगूर और नंदीग्राम की ओर ही ले जाएगी । इसीलिए राजेन्द्र यादव जैसे वामपंथी बुद्धिजीवियों को यदि यातना , दुविधा और विभ्रम की वर्तमान स्थिति से उबरना है , तो उन्हें अंधभक्त की अंधश्रद्धा से उबरकर , मार्क्सवाद की पुरानी मान्यताओं पर पुनर्विचार करते हुए , एक नए दर्शन की तलाश करना होगा । यही वक्त की मांग है । वे या मार्क्स का कोई अन्य अनुयायी यह प्रतिपादित करना चाहे कि इन मान्यताओं को छोड़कर या संशोधित करके भी मार्क्सवाद का नया शास्त्र लिखा जा सकता है और वह शास्त्र आधुनिक औद्योगीकरण पर आधारित विकास को अस्वीकार कर उसका विकल्प ढूंढने में मददगर हो सकता है , तो उसका स्वागत है । ऐसी हालत में शायद मार्क्सवाद गांधी , लोहिया और आम्बेडकर के भी काफी नजदीक पहुंच जायेगा ।

                                             ———*************———–

सुनील के अन्य महत्वपूर्ण लेख :

औद्योगीकरण का अन्धविश्वास : ले. सुनील ,

नारोदनिक,मार्क्स,माओ और गाँव-खेती : ले. सुनील ,

पूंजी’,रोज़ा लक्ज़मबर्ग,लोहिया : ले. सुनील (3) ,

औद्योगिक सभ्यता ,गाँधी ,नए संघर्ष : ले. सुनील(४)) ,

 

औद्योगिक सभ्यता के निशाने पर खेती-किसान : ले.सुनील (५) ,

खेती की अहमियत और विकल्प की दिशा:ले. सुनील(६) ,

वामपंथ का व्यामोह : ले. सुनील , 

वामपंथ का व्यामोह (२) : ले. सुनील

भोगवाद और ‘ वामपंथ का व्यामोह ‘ (३) : ले. सुनील

भारत भूमि पर विदेशी टापू : ले. सुनील  (एक)          :                                    ,   ,   ,

   

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