पहला भाग : यहाँ पढ़ें
मार्क्सवादी दर्शन की सर्वोच्चता का एक भ्रम इसके ‘वैज्ञानिक’ होने के दावे से आता है , जो राजेन्द्र यादव ने भी किया है । विज्ञान की यह खूबी है कि वह कारण और परिणाम के बीच संबंध को सुस्पष्ट रूप से परिभाषित करता है तथा इसके निष्कर्षों को कसौटी पर कसा जा जा सकता है । क्या श्री यादव को यह याद दिलाना पड़ेगा कि मार्क्स की अपनी प्रमुख भविष्यवाणी गलत साबित हो गई कि क्रान्ति वहाँ होगी , जहाँ पूंजीवाद परिपक्व अवस्था में पहुंच गया है ? क्रांति पश्चिम यूरोप में होने के बजाय औद्योगिक एवं पूंजीवादी दृष्टि से पिछड़े रूस में हुई , और फिर चीन में हुई जहाँ औद्योगीकरण और पूंजीवाद का विकास नहीं के बराबर हुआ था । क्या इसी एक तथ्य से मार्क्सवाद के अजेय और वैज्ञानिक होने के दावों पर सवालिया निशान नहीं लग जाता है ? या कम से कम उसके विश्लेषण में कोई बुनियादी कमी उजागर नहीं होती हैं ?
दरअसल स्थापित मार्क्सवादी विचारधारा में कई मान्यताएँ हैं , जो समय के साथ गलत साबित हुई हैं ।
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मानव इतिहास एक ही लाईन पर चलता है । पश्चिम यूरोप का इतिहास पूरी दुनिया में दोहराया जाएगा । पश्चिम यूरोप में जिस प्रकार से पूंजीवाद का विकास हुआ , उसी प्रकार दुनिया के बाकी हिस्सों में भी होगा । इस विश्वास ने एक प्रकार के ऐतिहासिक नियतिवाद को भी जन्म दिया ।
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इसलिए दुनिया के अन्य हिस्सों में पूंजीवाद का विकास एक प्रगतिशील घटना है , जो उस हिस्से को इतिहास में आगे ले जा रहा है । जब तक उत्पादन की शक्तियाँ पूरी तरह विकसित नहीं हो जातीं और पूंजीवाद का पूरा विकास नहीं हो जाता , तब तक समाजवाद नहीं आ सकता ।
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पश्चिमी पूंजीवादी मुल्कों से आई आधुनिक तकनालाजी और आधुनिक उत्पादन पद्धतियाँ अनिवार्य एवं वांछनीय है । उनके बगैर आगे नहीं बढ़ा जा सकता ।
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पूंजीवाद के विकास का मुख्य आधार कारखाना मालिकों एवं पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण है । यही अतिरिक्त मूल्य या सरप्लस वैल्यू का मुख्य स्रोत है । औपनिवेशिक शोषण एवं व्यापार द्वारा शोषण की पूंजीवादी विकास में एक भूमिका है , लेकिन शोषण का केन्द्रीय तंत्र मालिक द्वारा मजदूर का शोषण ही है ।
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साम्राज्यवाद , पूंजीवाद की अंतिम अवस्था है जो एकाधिकारी पूंजीवाद के विकसित होने बाद आती हैं । इस नजरिये से पूंजीवाद के शुरुआती विकास में साम्राज्यवाद एवं औपनिवेशिक शोषण की मुख्य भूमिका नहीं रही है ।
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मूल्य के श्रम सिद्धान्त के अनुसार मूल्य-सृजन का एकमात्र आधार श्रम ही है । प्राकृतिक संसाधनों एवं प्रकृति की भूमिका की इस सिद्धान्त में कोई जगह नहीं है । इसलिए उत्पादन एवं विकास की कोई सीमा नहीं होगी ।
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धीरे – धीरे पूंजीवाद के विकास के साथ दुनिया के सारे देशों के सारे समाज , मालिक व मजदूरों में बंट जाएंगे। छोटी-छोटी इकाइयों में स्वयं के श्रम से उत्पादन करने वाले खतम हो जाएंगे। उत्पादन के साधनों के मालिक अलग होंगे और मजदूर अलग होंगे। इस दृष्टि से किसानों व स्वरोजगार वाले छोटे व कुटीर उद्योगों का कोई भविष्य नहीं है । वे सामंती व्यवस्था के अवशेष हैं तथा उनका अंत अवश्यंभावी है ।
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बड़े-बड़े कारखानों में काम करने वाले मजदूर ही सर्वहारा हैं । वे ही संगठित होकर क्रांति के अगुवा बनेंगे।
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पूरे मानव-इतिहास को और सभी समाजों की स्थिति को वर्ग-विश्लेषण से ही देखा व समझा जा सकता है । वर्ग ही बुनियादी है। जाति,नस्ल,स्त्री-पुरुष एवं गांव-शहर का भेद व उपनिवेशों का शोषण तो हो सकता है । लेकिन वे बुनियादी नहीं हैं। जाति-व्यवस्था सामंती युग का अवशेष है, जो पूंजीवाद के विकास के साथ खतम हो जाएगी। वर्ग-विहीन समाज बनने पर बाकी सब विषमताएं भी स्वत: समाप्त हो जाएंगी।
मार्क्सवाद के वैज्ञानिक व अजेय होने का और उसकी सर्वोच्चता का भ्रम पाले लोग देख नहीं पाते हैं कि ये सभी स्थापनाएं समय की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं और उन पर पुनर्विचार , पुनर्मूल्यांकन व समीक्षा की जरूरत है । दरअसल ये मान्यताएं अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में औद्योगिक क्रांति के विश्लेषण पर आधारित हैं , जो मूलत: एक यूरोपीय दृष्टि से किया गया है। इसलिए समता की चाह रखने पर भी इस विश्लेषण में एक दृष्टिदोष आ गया है।स्वयं मार्क्स ने हमें सिखाया है कि किसी व्यक्ति के विचार उसके देश , काल व पृष्टभूमि से प्रभावित होते हैं और उसकी उपज होते हैं । मार्क्स स्वयं इसके अपवाद नहीं हैं ।
मार्क्सवादी विचारधारा की इन मान्यताओं के बारे में कुछ विद्वान यह बहस कर सकते हैं कि ये सारी मान्यताएँ मार्क्स के मूल लेखन में इस रूप में मौजूद नहीं हैं या स्वयं मार्क्स बाद में इनके बारे में अलग ढंग से सोचने लगे थे । मार्क्स एवं ‘मार्क्सवाद’ में फर्क भी किया जा सकता। यह भी कहा जा सकता है कि ऊपर बताई गई मान्यताओं को सही सन्दर्भ में , सही शब्दावली में पेश नहीं किया गया है। शब्दावली में फर्क हो सकता है। नव मार्क्सवाद की कुछ धाराएं इन मान्यताओं पर काफ़ी समय से सवाल उठा रही हैं।फिर भी मोटे तौर पर मार्क्सवाद की मुख्यधारा इन्हीं मान्यताओं को लेकर कमोबेश चलती रही हैं। भारत की बड़ी कम्युनिस्ट पार्तियों की सोच व रणनीति भी मोटे तौर पर इसी से प्रेरित रही है , भले ही व्यावहारिक राजनीति में वे इनसे हटकर भी काम करते रही हों । ये मान्यताएं दरअसल गहरे विश्वासों में बदल गयी हैं ।
[ जारी ]
January 4, 2008 at 11:20 pm |
शुक्रिया, आपने विचार करने के लिए काफी अच्छी सामग्री प्रस्तुत की ।
January 5, 2008 at 11:03 am |
अच्छी विचारणा चल रही है। इसे आगे बढ़ाया जाए।
January 5, 2008 at 4:36 pm |
हम अगर किन्ही विचारधाराओं पर चलने वाले समूहों की कार्यशाली देखकर उनके बारे मी निर्णय करते हैं तो हमें यह भी देखना चाहिए वह वहाँ से नारे निकालते हैं और उस आधार पर अपने हित साधने लग जाते हैं. मैं मानता हूँ कि गांधी दर्शन हमारे देश के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है, पर आप अगर उसे गांधीवाद और गांधीगिरी की दृष्ट से देखेंगे तो भ्रम में पड़ जायेंगे क्योंकि यह केवल नारे हैं. हमें किसी भी विचारधारा और उसके अनुयायियों की कार्यशैली में भी अंतर देखना चाहिए
दीपक भारतदीप .
September 26, 2008 at 7:33 pm |
मैंने मार्क्स की बहुत थोडी रचनाएँ पढ़ी हैं लेकिन जो कुछ पढ़ा और समझा है उस हिसाब से तो लगता है कि आपने मार्क्स के साथ थोडी नहीं बल्कि काफी ज्यादा बेइंसाफी की है. आप लिखते हैं कि,
1.’मानव इतिहास एक ही लाईन पर चलता है’
यह यांत्रिक तरीका है जबकि मार्क्स इसके विपरीत द्वंदात्मक भौतिकवाद के तरीके का प्रयोग करते थे.
2.’मूल्य के श्रम सिद्धान्त के अनुसार मूल्य-सृजन का एकमात्र आधार श्रम ही है’…..मार्क्स की रचना ‘गोथा प्रोग्राम की आलोचना’ में जब वे आलोचना शुरू करते हैं तो इसी वाक्य से जो आपने मार्क्स के नाम मढ़ दिया है, देखें …..Labor is not the source of all wealth. Nature is just as much the source of use values (and it is surely of such that material wealth consists!) as labor, which itself is only the manifestation of a force of nature, human labor power. the above phrase is to be found in all children’s primers and is correct insofar as it is implied that labor is performed with the appurtenant subjects and instruments. But a socialist program cannot allow such bourgeois phrases to pass over in silence the conditions
अपनी द्वंदात्मक दृष्टि से वे जिन्स के दोहरे चरित्र का विश्लेषण कर पाए. उपयोग मूल्य ओर विनमय मूल्य में अन्तर उन्होंने साफ़ किया. क्या मार्क्स की नज़र में धूप, हवा, पानी का कोई मूल्य नहीं था ? उन्होंने साफ किया कि ये इसलिए मुफ्त में उपलब्ध हैं क्योंकि इन पर मानवीय श्रम नहीं लगता. पानी को ही लिजीये, जब इस पर श्रम लगने लगा तो यह भी बिकने लगा.