नन्दीग्राम – सिंगूर की घटनाओ ने वामपंथी धारा के अन्दर एक हलचल पैदा कर दी है । वामपंथी बुद्धिजीवी हैरान हैं ,व्यथित हैं , दुविधाग्रस्त और भ्रमित हैं। जो वामपंथी अभी तक माकपा – भाकपा से जुड़े थे , या कमियों के बावजूद उन्हें भारत में वामपंथ और प्रगतिशील राजनीति का प्रतिनिधि मानते थे , उनकी हालत तो और भी खराब है । ऐसी ही एक व्यथा हिन्दी की लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के ताजे सम्पादकीय में दिखाई देती है । इसके दिसम्बर अंक में संपादक राजेन्द्र यादव ने एक वामपंथी बुद्धिजीवी की पीड़ा , परेशानी , दुविधा और आक्रोश को अभिव्यक्ति दी है । वे देश के एक नामी साहित्यकार और संपादक हैं । वामपंथी खेमे में उनकी काफी प्रतिष्ठा है । इस संपादकीय लेख में उन्होंने खुलकर माकपा और पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचना की है । इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं ।![]()
श्री यादव ने आक्रोश के साथ कहा है : ‘ वे सिर्फ अपना ही नहीं , हमारा भी मुंह काला कर रहे हैं ‘ । सिंगूर-नन्दीग्राम के नरसंहार को उन्होंने ‘ जनता और बुद्धिजीवियों के साथ विशासघात ‘ कहा है । यह पूछा है कि कम्युनिस्ट पार्टी क्यों अपनी मूल प्रतिज्ञाओं से हटकर दमन व अत्याचारों पर उतर आई है ? पश्चिम बंगाल में गुण्डा तत्व को वर्चस्व क्यों सौंप दिया गया हौ ? उन्होंने पश्चिम बंगाल की घटनाओं की तुलना गुजरात में मोदी की करतूतों से की है । खरा सच बोलने और भारत के वामपंथी नेताओं को आईना दिखाने के लिए श्री राजेन्द्र यादव की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी । उन्होंने एक बुद्धिजीवी के दायित्व को निभाया है।
लेकिन अफसोस है कि इतना साहस दिखाने के बाद आगे श्री यादव ने जो कहा है , उससे देश के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों की एक सीमा का पता चलता है । उन्होंने आत्ममंथन और आत्मालोचना पर जोर दिया , लेकिन इसे सिर्फ एक पार्टी-माकपा तक सीमित कर दिया। उन्होंने स्टालिन की तानाशाही , चीन की ‘ चौकड़ी ‘ के शासन तथा भद्रलोक बंगालियों के मार्क्सवाद की निंदा तो की , किंतु इसके बीज उस मार्क्सवादी विचार एवं दर्शन में भी हो सकते हैं , यह देखने से बिलकुल इंकार कर दिया । मानों उन पर मार्क्सवाद विरोधी या पथभ्रष्ट होनी का आरोप न लग जाए , उन्होंने सफाई भी दी कि आज भी वाम-विचारधारा में उनका अटूट विश्वास है , ‘क्योंकि मानव – इतिहास में आज भी वहीं सबसे अजेय विचारधारा है ‘ । यही विचारधारा ‘सबसे वैज्ञानिक’ भी है । अपनी निष्ठा को साबित करने के अति उत्साह में वे यह भी कह गए कि ‘दुनिया में जहाँ भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जमीनी संघर्ष हुए उनकी एकमात्र प्रेरणा मार्क्सवाद ही रहा है ? दलित , स्त्री आंदोलनों की वैचारिक रीढ़ सिर्फ मार्क्सवाद ने प्रदान की है ‘।
यादवजी की यह वैचारिक भक्ति और ये अतिरंजित दावे आश्चर्यजनक हैं और ऐतिहासिक सच्चाई की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। स्वयं इस देश में आजादी के आंदोलन के बड़े हिस्से के प्रमुख नेता और प्रेरणास्रोत महात्मा गांधी रहे हैं , मार्क्स नहीं । बल्कि मार्क्स के अनुयायी कम्युनिस्ट पार्टियाँ तो इस पूरे आंदोलन से अलग-थलग रही हैं । इसी प्रकार , इस देश की दलित चेतना के मुख्य स्रोत आंबेडकर रहे हैं , मार्क्स नहीं। आज लैटिन अमरीका में भी वेनेजुएला और बोलीविया के जनवादी उभारों का प्रमुख केन्द्र साईमन बोलीवार हैं । ये आन्दोलन पारंपरिक मार्क्सवादी धारा से काफी अलग हैं । इसमें शक नहीं कि मार्क्स एक क्रान्तिकारी विचारक एवं दार्शनिक थे , जिनके विचारों का कफी दूर दूर तक प्रसार और प्रभाव हुआ । दुनिया की अनेक क्रान्तियों के पीछे मार्क्स के विचार रहे हैं । लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दुनिय में अन्य प्रकार की परिवर्तनकामी विचारधाराओं एवं गैर-मार्क्सवादी संघर्षों का अस्तित्व ही नकार दिया जाए। मार्क्सवाद को ‘एकमात्र प्रेरणा’ कहने वाले यादवजी की यह निष्ठा बहुत कुछ किसी धर्म के अति उत्साही कट्टरपंथी अनुयायी जैसी लगती है , जो दावा करता है कि उसका धर्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है , उसका ईश्वर ही एकमात्र ईश्वर है,उसका मार्ग ही मुक्ति का एकमात्र मार्ग है, बाकी सब धर्म एवं पंथ ढ़कोसला है । बल्कि जो विभिन्न उदात्त धर्माचार्य रहे हैं , वे दूसरे धर्मों के अस्तित्व को स्वीकार करते रहे हैं ,उनका सम्मान करते रहे हैं और उनके प्रति सहिष्णुता का नजरिया रखते रहे हैं । श्री यादव जैसे मार्क्सवादी तो उन धर्माचार्यों जितनी सहिष्णुता या सहस्तित्व भी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं ।
[ जारी ]
January 3, 2008 at 5:39 pm |
अन्यत्र मार्क्सवाद का जो भी हश्र हुआ हो, भारतीय परिप्रेक्ष्य में कोई गुणात्मक बदलाव ला पाने में तो यह एक कदम भी सफल नहीं रहा है।
हर महत्वपूर्ण एवं निर्णायक अवसरों पर भारत के मार्क्सवादियों ने प्रतिगामी रवैया अपनाया है और हर बार बाद में उन्हें अपनी भूल का अहसास करने और माफी भी मांगने पर मजबूर होना पड़ा है।
उनका चश्मा, उनका नजरिया, उनका रवैया, उनका इरादा सब गैर-भारतीय है।