अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई
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अब विचार किया जाए अखबार के इन सभी अंग - उपांगों को एकजुट कर एक सजीव कृति के रूप में गढ़ने वाले सम्पादक पर । उस सजीव कृति को गढ़कर उसे कौन सा उद्देश्य हासिल करना है उस पर काफ़ी कुछ निर्भर रहता है । ( १ ) कुछ सम्पादक सिर्फ़ लोकमत का प्रतिबिम्ब दरसाते हैं , लोकमत की योज्ञता - अयोज्ञता पर बगैर विचार किए सिर्फ़ उन्हें ज्यों का त्यों पेश कर देते हैं । ( २ ) कुछ सम्पादक लोकमत को जान - समझ कर उसे सुधारने वाले , गढ़ने वाले और मौका पड़ने पर जनता के विरुद्ध , उसका तिरस्कार झेल कर भी अन्याय और दुराचार के विरुद्ध जबरदस्त जुंबिश चलाने वाले होते हैं । ( ३ ) कुछ लोकशिक्षक होते हैं , अपने जमाने को पलटने वाले । प्रथम वर्ग में आने वालों की संख्या ढेरों ढेर होती है । दूसरे और तीसरे वर्ग में आने वाले गिने-गिनाये ही होते हैं ।
विलायत और अमेरिका जैसे स्वतंत्र देशों में पत्रकारिता की कला सम्पूर्ण रूप से खिली है तथा वहाँ इन तीनों प्रकार के सम्पादक मिलते हैं । तीनों प्रकार के सम्पादकों ने अपने - अपने अखबारों को सफल समाचारपत्र बनाया है , शिक्षण सार्वजनिक हो चुका है इसलिए एक - एक पत्र की १० से २० लाख तक नकल खपती हैं । उनके दफ़्तरों में डेढ़ से दो हजार तक लोग होते हैं । सिर्फ सम्पादकीय विभाग में ही मुख्य सम्पादक के मातहत अनेक विभागों के सम्पादक - उपसम्पादक मिला कर २० - २५ लोग होते हैं जिनके मददगार - कारकून अन्य ढेर सारे होते हैं । हमारे निर्धन देश में एक सूत्रधार को ही यह सारे खेल खेलने होते हैं । देश परतंत्र है इसलिए उसकी चोट जिनके हृदय पर है वे मुल्क को आज़ाद कराने में जूझे अथवा अखबार निकालें ?
इन विषम परिस्थितियों में भी सी.वाई. चिन्तामणि जैसे , रामानन्द चैटर्जी जैसे , मोतीलाल घोष , श्री नटराजन एवं कालीनाथ राय जैसे सम्पादक तैयार हुए हैं यह ईश्वर की कृपा है । गांधीजी और तिलक महाराज जैसे तो किन्हीं भी परिस्थितियों में पहाड़ तोड़ने वाले विरले होते हैं । अन्य पत्रकार हैं जिन्होंने अपने - अपने अखबारों को आर्थिक रूप से सफलता दिलायी है , जिन्होंने जनता या सरकार को न छेड़ने की नीति अपना कर हवा का रुख देख कर नाव चलाई है । ऐसे सफल अखबार अपने देश में अंग्रेजी में तो चल ही रहे हैं , गुजराती में भी चल रहे हैं । मैं इन ‘सफल’ पत्रों की चर्चा का इच्छुक नहीं हूँ । मेरी नज़र में जनता को गढ़ने वाले , जनता की सेवा करने वाले अखबार ही रहे हैं । इसलिए उपरिवर्णित दूसरे और तीसरे किस्म के सम्पादकों का ही तफ़सील से वर्णन करूँगा ।
इन लोक शिक्षक तथा राष्ट्र निर्माता सम्पादक का वर्णन करते हुए सी.पी स्कॉट ने कहा है , ” लोकमत पर असर डालना तथा उसे चित्रित करना महाभारत समान है , किसी एक व्यक्ति अथवा एक अखबार के लिए इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरना मुश्किल है । इस कार्य के लिए उत्तमोत्तम कुशलता चाहिए , शिक्षा के उत्तमोत्तम संस्कार चाहिए , कुशाग्र बुद्धि-शक्ति चाहिए ; इन सब गुणों के साथ - साथ इन्हें सामर्थ्य प्रदान करने वाली धर्मभीरुता चाहिए , सत्यनिष्ठा चाहिए - हृदय की नहीं अपितु बुद्धि की सत्यनिष्ठा की आवश्यकता होनी चाहिए । ” इन गुणों से लैस सम्पादक ही दूसरी तथा तीसरी कोटि में आ सकते हैं । दूसरी श्रेणी के सम्पादकों के नाम ढूँढ़ने पर अमेरिका के लॉइड गैरिसन , इंग्लैंड के डीलेन , स्टेड और सी.पी. स्कॉट तथा अपने मुल्क में गांधीजी का नाम सूझता है । तीसरी श्रेणी में गांधीजी और तिलक महाराज के सिवा अन्य नाम नहीं सूझता । ![]()
स्व. मोतीलाल घोष , श्री चिंतामणी , नटराजन , रामानन्द चैटर्जी तथा कालीनाथ राय की गिनती मैं समर्थ समाचार विश्लेषकों में करता हूँ । देश की परिस्थिति के कारण इनकी सेवा की शक्ति मर्यादित रही है । स्व. मोतीलाल की कटाक्ष भरी कलम एक बार बंगाल की सरकार पर भारी पड़ गयी थी , परन्तु उनका प्रभाव ऐसा था कि उन्हें सरकार कभी जेल में ठूँस न सकी । जेल में भरने का युग आया तब वे ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज जहाँ नहीं उगता उस धाम में पहुँच चुके थे । श्री चिन्तामणि का ज्ञान आश्चर्यजनक है ।कहा जाता है कि पिछले पचास वर्षों का हिन्दुस्तान का इतिहास उन्हें उँगलियों पर याद है और छोटी से छोटी घटना को वे तारीख़ सहित बता सकते हैं । मॉन्टेग्यु जब भारत आया तब उनके ज्ञान से आश्चर्यचकित हो गया था । नटराजन एक अनुभवी समाजसुधारक तथा सिद्धहस्त पत्रकार हैं , रामानन्द चैटर्जी और कालीनाथ राय गहरे अध्ययन के बूते अनेक लेखकों को शिक्षित करने का मद्दा रखते हैं। परन्तु गांधीजी और तिलक महाराज की जात और भात इन सब से जुदा है । उनकी पत्रकारिता पर उनके लोकनेतृत्व की छाप पड़ी है। दोनों राष्ट्र निर्माता और लोकशिक्षक हैं । उनकी बात मैं यहाँ क्या करूँ ?उन दोनों की सत्ता और प्रभाव का अनुभव अभी हम कर रहे हैं तथा आगे भी करेंगे । उनके लोकशिक्षण के नतीजे हमारी नजरों के सामने तैर रहे हैं ।
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