अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई
पिछला भाग अखबारों के मुख्य अंगों की बात मैंने की है । इनमें अब नए नए अंग शामिल हो रहे हैं । सिनेमा जगत के बारे में पूरे पृष्ट की सामग्री आ रही है , खेल कूद की बाबत भी । इन पर मेरी नज़र नहीं पहुँचती है । हाल ही में एक कतरन पढ़ी , जिसमें लेखक कहता है कि साहित्य परिषद ‘ फुरसतियों का जलसा ‘ है , परन्तु (या तथा ? ) ‘सिनेमा साहित्य का प्रमुख अंग है।’ इस साहित्य के बारे में अपना अज्ञान मैं कबूलता हूँ ।सिनेमा देखने वालों की आँखें बहुत तेज़ होनी चाहिए इसमें सन्देह नहीं , मैं तो पूरी जिन्दगी में दो चार बार ही सिनेमा गया हूँ , इसलिए बाल की खाल निकालने की वृत्ति हो ऐसा नहीं , बल्कि मेरी आँखें कमजोर हैं इसलिए । एक सिनेमा-शास्त्र-प्रवीण ने फिल्म की सफलता की अनिवार्य शर्त बतायी है जो जान लेनी चाहिए: ‘ स्त्री-पुरुष संबंध पर पर्याप्त मात्रा में उत्तेजक सामग्री भरो , अच्छे से अच्छे दृश्य प्रस्तुत करो तथा अभिनय द्वारा पूरा अलंकरण करो , बस बेड़ा पार हो जाएगा ।’ इस स्वीकृति से बढ़कर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ।
अखबारों का एक अंग रह गया- वह भी एक आवश्यक ‘जीवनप्रद’ अंग ; ‘जीवनप्रद’ क्योंकि कहा जाता है कि अखबार उसके बिना टिक नहीं सकते हैं । यह भी इस जमाने का कैसा अटपटा दस्तूर है कि जहर ही कैसी जीवनप्रद वस्तु बन गया है ? यह मेरी चूक है । अखबारों को वह जहर खुद पीना नहीं पड़ता , वे तो उसे बेचने का व्यापार करते हैं और उसके दम पर जीवित रहते हैं । प्राकृतिक नियमों के चाहे जितने उल्लंघन कीजिए , शरीर अथवा मन को उससे कोई हानि नहीं पहुँचने वाली- अधिकांश आमदनी कराने वाले विज्ञापनों का यह निचोड़ होता है । एक प्रतिष्ठित दैनिक के व्यवस्थापक से मालूम हुआ था कि भड़काऊ लाल रंग में छपे , दो इंच चौड़े और चार इंच लम्बे सिगरेट अथवा याकुती ( चासनी में पगी कामोत्तेजक भाँग) के विज्ञापन से सैंकड़ों रुपये प्राप्त होते हैं । अच्छे से अच्छे माने जाने वाले अखबारों में याकुति तथा ‘ नवाबी रति शक्ति ‘ की वीभत्स विज्ञापन भरे रहते हैं ; ‘ गुप्त वशीकरण मन्त्र ‘ अथवा ‘शत प्रतिशत सफल संतति नियमन के साधन ‘ के विज्ञापन उनके पृष्ठों को सुशोभित करते हैं । चाय के बारे में पाँच हिन्दी अखबारों में छपी पाँच अलग अलग स्तुतियाँ एक सज्जन ने मुझे भेजीं थीं । एक अखबार अपने ग्राहक बनने वालों को उसी प्रेस से छपा ‘कामविज्ञान ‘ मुफ्त देता है । मुम्बई के एक प्रतिष्ठित अखबार ने पूरे एक पृष्ठ पर बिछे विज्ञापन में याकुति को प्रमाणपत्र दिए हैं , उन पर अखबार ने इस बात की अपनी मुहर लगा दी है कि उसके संवाददाता इन प्रमाणपत्रों को देख चुके हैं और उसकी सत्यता की पुष्टि कर रहे हैं । एक प्रतिष्ठित मासिक में ‘स्त्री आकृति की कामोत्तेजक अंग’ नामक एक पुस्तक का सचित्र विज्ञापन छपा है , इस विज्ञापन में काफी वीभत्स वर्णन हैं । यह पूरा विज्ञापन स्त्री जाति का भीषण अपमान है । यदि इन विज्ञापनों के बिना ये अखबार नहीं टिक सकते हों , तब हम इन्हें तिलांजलि ही क्यों न दे दें ? काका साहब का इस सम्बन्ध में कहा गया एक तीखा वाक्य उद्धृत किए बगैर काम नहीं चल सकता :”अखबारों में जब इतने सारे घटिया विज्ञापन देखता हूँ तब मन में विचार आता है कि प्रभु सेवा के लिए एकाध उत्तम देवमंदिर बनाने के बाद उसका खर्च चलाने के लिए उसके परिसर स्थित कोठरियाँ शराबखाने तथा वेश्याओं को किराए पर देने जैसा यह नहीं है ? “
यह तो हुई अनीतिपोषक विज्ञापनों की बात । परन्तु अन्य ऐसे उटपटांग विज्ञापन अखबारों में आते हैं जो कत्तई शोभास्पद नहीं होते।एक बेचारे ने गांधीजी को पत्र लिख कर पूछा था ,” बेलगाँव में कानून के कॉलेज के बारे में यह विज्ञापन देखा था ।आपके परिचित हों तो क्या उनसे पूछ कर पुष्टि करा लेंगे ? यह कॉलेज ऐसा है कि ६० रुपये की पहली फीस देनी होगी ,इसके बदले खाना-पीना मुफ्त , किताबें मुफ्त, अमुक महीने में परीक्षा पास करवा देंगे ( परीक्षा हाई कोर्ट में प्लीडर की अथवा ऐसी ही कोई - यह मुझे अब याद नहीं है ।) पास होने पर ६० रुपया वेतन मिलेगा और फेल होने पर ५० रुपये । ” यह विज्ञापन तथा ऐसे ही विज्ञापन अखबार नहीं रोक सकते ?
अखबारों के इन दूषित अंगों में अब एक नया अंग शामिल हुआ है । अनेक उत्तर वाले प्रश्न एकत्र कर उसके सही यानी अखबार द्वारा तय उत्तर देने वाले को ईनाम देने वाली लॉटरी अथवा जुआ । उत्तर तो वहीं दिए हुए होते ही हैं परन्तु निर्दिष्ट उत्तर पसंद करने पर आपकी लॉटरी खुल सकती है । बिना परिश्रम ,बिना बुद्धि धनवान बनना किसे पसन्द न होगा ? ऐसे लोभियों की भरमार से ही अखबारों की जेब गरम रहती है ।
( आगे - सुरुचिपोषक तत्व )
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November 11, 2007 at 11:51 am
:”अखबारों में जब इतने सारे घटिया विज्ञापन देखता हूँ तब मन में विचार आता है कि प्रभु सेवा के लिए एकाध उत्तम देवमंदिर बनाने के बाद उसका खर्च चलाने के लिए उसके परिसर स्थित कोठरियाँ शराबखाने तथा वेश्याओं को किराए पर देने जैसा यह नहीं है ? “
अखबारों को प्रोफ़ेशनल बनाने और विज्ञापनों को आमदनी का जरिया बताने का तर्क देनेवालों पर सटीक टिप्पणी.
अतुल
November 11, 2007 at 5:37 pm
बहुत बढिया लिखा है ,,,आज ज्यादा तर अंग्रेजी अखबारॊं मे ऐसे विज्ञापनों की भरमार रहती है…सब पैसा बनाने में लगे हैं…समाज को इस से क्या नफा-नुकसान है यह सोचनें की फुर्सत किसे है?
November 12, 2007 at 12:28 am
बिना विज्ञापन के अखबार नहीं चल सकते. पाठक को जिस कीमत पर एक अखबार मिल जाता है वह उसकी तागत का महज एक छोटा सा हिस्सा ही है. इसलिए बिना विज्ञापन के अखबार छपने की कलपना भी बेमानी है. लेकिन इस बात से सहमत हूं कि अखबारों में अश्लील विषय सामग्री वाले विज्ञापन नहीं होने चाहिए. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी यही बात लागू होती है जो महज 10 सैकंड के लिए 5 लाख रुपए तक ले लेते हैं.
May 23, 2008 at 2:18 pm
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