पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

By अफ़लातून

    समाचारपत्रों के हाथ में समाज के एक – एक व्यक्ति की आबरू है , सभ्यता के नियम व्यक्ति पर जितना लागू होते हैं उससे ज्यादा समाचरपत्रों पर लागू होते हैं । इस मर्यादा का पालन कितने अखबार करते हैं ? पंजाब के कुछ अखबार सिर्फ लोगों पर कीचड़ उछालने की धमकी देकर उनसे धन वसूली कर , उसी पर जिन्दा हैं ऐसा माना जाता है । कई बार वास्तविक तथ्य कह देने पर भी असभ्यता और अपमान हो जाता है । किसी शहर में एक बार हड़ताल चल रही थी , उसकी रहनुमाई एक महिला के हाथ में थी । महिला का नाम दिए बगैर एक अखबार ने लिखा : ‘ बरख्वास्त मुलाजिम की  मेहर हड़तालियों की मुखिया । ‘ तथ्यात्मक रूप से बात सही थी लेकिन  उसे इस प्रकार छापना अखबार के लिए शोभनीय नहीं था । किसी के व्यक्तित्व को मलिन करने अथवा अफवाह छापना इससे भी भोंड़ी वस्तु है ।

    किसी भी व्यक्ति के बारे में निहायत जाती किस्म की खबर बिना पुष्टि के स्वीकारनी ही नहीं चाहिए , पुष्टि हो तब उसकी बारीकी से जाँच कर लें कि वह सच है या झूठ , जाँच के बाद यदि खबर सच पाई जाए तब उसे छापने पर जनता का हित होगा या अहित यह विचार कर तब उसे छापा जाए अथवा न छापा जाए ।

    इस सामान्य -सी नीति का पालन क्या क्या दुष्कर और दुरूह है ?

  आगामी कड़ी : अखबारों की गन्दगी

 

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One Response to “पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई”

  1. atulkumaar Says:

    समाचारपत्रों के हाथ में समाज के एक – एक व्यक्ति की आबरू है , सभ्यता के नियम व्यक्ति पर जितना लागू होते हैं उससे ज्यादा समाचरपत्रों पर लागू होते हैं ।
    लेकिन आज कम से कम चैनल तो इसे नही मानते. किसी की आबरू पर कीचड़ उछाल देते है.
    अतुल

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