किसी अन्य वस्तु से बढ़कर सत्यनिष्ठा ही पत्रकार का प्रथम धर्म है । बॉल्डविन ने इंग्लैंड के सम्मानित पत्रकार सी.पी. स्कॉट के शब्दों को पत्रकारों की एक जमात के समक्ष उद्धृत किया था, इसे हर अखबार के दफ़्तर में बड़े बोर्ड पर लिख कर रखना चाहिए :
” समाचारपत्र चलाने के लिए सर्वप्रथम इतने गुण तो होने ही चाहिए – प्रामाणिकता , स्वच्छता, निडरता , न्यायबुद्धि तथा पाठक व जनता के प्रति कर्तव्य भाव । बेशक अखबार एक प्रकार का इजारा है , इसलिए अखबार का प्रथम कर्तव्य है इजारे से जुड़ी लालचों को त्याग करे । खबरें इकट्ठा करना अखबार की प्रथम सेवा है । किसी भी समाचार का मूल दूषित तो नहीं है – इस शुचिता के प्रति जान को जोखिम में डाल कर भी सावधान रहना चाहिए । जो समाचार वह देता है , अथवा नहीं देता है , अथवा जिस प्रकार समाचार दिया जा रहा है उसमें सत्य के शुभ्र वदन पर धब्बा नहीं लगना चाहिए । आलोचना की आजादी सभी को है, परन्तु समाचार एक पवित्र वस्तु है , उसे बदलकर या तोड़मरोड़कर या घटबढ़ द्वारा उसे भ्रष्ट करने का हक किसी को नहीं है। ऐसे घटिया हथकण्डों का उपयोग निन्दनीय है । खुद के पक्ष के लोगों को उनका पक्ष सुनाने का जितना अधिकार है उतना ही अधिकार विरोधियों को भी है । टीका करते वक्त भी खुद संयम रखना चाहिए । निख़ालिस टीका करना अच्छा है ; न्यायबुद्धि से टीका करना उससे बेहतर है । “
कुछ अखबार अत्युक्ति अथवा तथ्यों को साज-श्रृंगार के साथ को पेश करने को शोभा मानते है । अमेरिकी समाचारपत्रों में यह यह शोभाविहीन शैली अशिष्टता की कोटि में खपती होगी । एक अमेरिकन रिपोर्टर ने मुझसे पूछा : “क्या गांधी जी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ?
मैंने कहा : ‘ हाँ , कुत्ते भी पसन्द हैं , गायें भी पसन्द हैं और तुम भी पसन्द हो । सिर्फ बिल्लियाँ ही क्यों ?’
वह हँसा और बोला : ‘गांधीजी के आसपास के वातावरण का शब्दचित्र देना चाहता हूँ ।उसमें बिल्ली जैसा मजेदार प्राणी कहीं रखा जा सकता तो चार चाँद लग जाते । ‘ उसने गांधीजी के साथ बैठ कर दूध पीती बिल्ली को फिट कर ‘रंग भर दिया’ ।
स्लोकोम्ब को लगा था कि गांधीजी की साधुताभरी नम्रता का चित्र एक काल्पनिक दृष्टांत दे कर ही चित्रित हो सकता है ।सो उसने लिखा : ‘ प्रिन्स ऑफ़ वेल्स यहाँ आए तब गांधी ने उन्हें साष्टांग प्रणिपात किया था ।’
उसे धता बताते हुए गांधीजी ने कहा : ” आपकी यह गप्प आपकी खुद की कल्पना शक्ति को लज्जित करने वाली है । मैं भंगी को प्रणिपात कर सकता हूँ और उसका चरणरज ले सकता हूँ चूँकि उसे धूल धूसरित करने के पाप में मैं भागी हूँ।प्रिन्स ऑफ़ वेल्स तो क्या शहंशाह जॉर्ज पंचम को मैं प्रणिपात नहीं करूँगा , कारण वह एक जुल्मी सत्ता का नुमाइन्दा है । “
परदेशी खबरपत्रियों की बात क्या की जाए , अब तो हम (भारतीय पत्रकार) भी उन्हें मात दे सकते हैं ।
[ जारी ] इस भाषण के अन्य भाग :
पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य
पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई
पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई
पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”
पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘
पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई
समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई
क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?
समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई
रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई
तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई
विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई
अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई
अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई
अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई
कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई
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आज का मीडिया हर हथकंडे आजमा रहा है….कामयाबी चाहिए कैसे बी मिले….यह सवाल वेमानी हो चला है…
काफी अच्छे दृष्टांत देकर आपने अपनी बात रखी है! शुक्रिया…
@ मनीश , दृष्टांत बहुत अच्छे हैं और बात भी ।लेकिन यह दृष्टांत और बाते महादेव देसाई की हैं,१९३६ में कहीं गयी हैं। मैं सिर्फ गुजराती से अनुवाद कर रहा हूँ।
यहां बताया जाता है कि पश्चिम के पत्रकार बड़े जिम्मेदार होते हैं. पर स्लोकोम्ब का उदाहरण तो बिल्कुल विपरीत छवि पेश करता है.
अतुल
इस सीरीज से एक नया पहलू दिख रहा है पत्रकारिता का……
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superb one.