Archive for October 9th, 2007

पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

साहित्य की परिभाषा और परिधि में आने लायक पत्रकारीय लेखन को हासिल करने के लिए हमें क्या करना होगा ? चिरंजीवी साहित्य लिखने का अधिकार तो गिने-चुने लोगों को है । रस्किन जिसे  कुछ कमतर आँकते हुए  ‘सुवाच्य लेखन’ की कोटि के रूप में परिभाषित करते हैं उसके अन्तर्गत हमारा पत्रकारीय लेखन कैसे आ सकता है ? -मैं इसकी चर्चा करना चाहता हूँ । सुवाच्य लेखन की कोटि में आने की जरूरी शर्त है कि वह लेखन बोधप्रद हो , आनन्दप्रद हो तथा सामान्य तौर पर लोकहितकारी हो : उसके अंग तथा उपांग लोकहितकी परम दृष्टि से तैयार किए गये हों । आधुनिक समाचारपत्र औद्योगिक कारखानों की भाँति पश्चिम की पैदाइश हैं । हमारे देश के कारखाने जैसे पश्चिम के कारखानों के प्रारम्भिक काल का अनुकरण कर रहे हैं , उसी प्रकार हमारे देशी भाषाओं के अखबार देशी अंग्रेजी अखबारों के ब्लॉटिंग पेपर ( सोख़्ता ) जैसे हैं तथा हमारे अंग्रेजी अखबार ज्यादातर पश्चात्य पत्रों का अनुकरण हैं । अनुकरण अच्छे और सबल हों तब कोई अड़चन नहीं होती, क्योंकि जिस कला को सीखा ही है दूसरों से , उसमें अनुकरण तो अनिवार्य होगा । हमारे अखबारों में  मौलिकता हो अथवा अनुकरण, यदि वे जनहितसाधक हो जाँएं तो भी काफ़ी है, ऐसा मुझे लगता है । जैसे यन्त्रों का सदुपयोग और दुरपयोग दोनो है , वैसे ही अखबारों के भी सदुपयोग और दुरपयोग हैं ,कारण अखबार यन्त्र की भाँति एक महाशक्ति हैं । लॉर्ड रोज़बरी ने अखबारों की उपमा नियाग्रा के प्रपात से की है तथा इस उपमा की जानकारी के बिना गांधीजीने स्वतंत्र रूप से कहा था : ” अखबार में भारी ताकत है । परन्तु जैसे निरंकुश जल-प्रपात गाँव के गाँव डुबो देता है,फसलें नष्ट कर देता है , वैसे ही निरंकुश कलम का प्रपात भी नाश करता है । यह अंकुश यदि बाहर से थोपा गया हो तब वह निरंकुशता से भी जहरीला हो जाता है ।भीतरी अंकुश ही लाभदायी हो सकता है । यदि यह विचार-क्रम सच होता तब दुनिया के कितने अख़बार इस कसौटी पर खरे उतरते ? और जो बेकार हैं ,उन्हें बन्द कौन करेगा ? कौन किसे बेकार मानेगा ? काम के और बेकाम दोनों तरह के अखबार साथ साथ चलते रहेंगे । मनुष्य उनमें से खुद की पसन्दगी कर ले । “

इस प्रकार समाचारपत्र दुधारी तलवार जैसे हो सकते हैं क्योंकि उनके दो पक्ष हैं । अख़बार धन्धा बन सकते हैं ,ऐसा हुआ भी है,यह हम जानते हैं । दूसरी तरफ़ अख़बार नगर पालिका की तरह, जल -कल विभाग की तरह, डाक विभाग की तरह लोकसेवा का अमूल्य साधन बन सकते हैं ।जब अख़बार कमाई का साधनमात्र बनता है तब बन्टाधार हो जाता है,जब अपना खर्च किसी तरह निकालने के पश्चात पत्रकार अखबार को सेवा का साधन बना लेता है तब वह लोकजीवन का आवश्यक अंग बन जाता है ।

पत्रकारीय लेखन किस हद तक साहित्य

पत्रकारिता : दुधारी तलवार : महादेव देसाई

पत्रकारिता (३) : खबरों की शुद्धता , ले. महादेव देसाई

पत्रकारिता (४) : ” क्या गांधीजी को बिल्लियाँ पसन्द हैं ? ”

पत्रकारिता (५) :ले. महादेव देसाई : ‘ उस नर्तकी से विवाह हेतु ५०० लोग तैयार ‘

पत्रकारिता (६) : हक़ीक़त भी अपमानजनक हो, तब ? , ले. महादेव देसाई

समाचारपत्रों में गन्दगी : ले. महादेव देसाई

क्या पाठक का लाभ अखबारों की चिन्ता है ?

समाचार : व्यापक दृष्टि में , ले. महादेव देसाई

रिपोर्टिंग : ले. महादेव देसाई

तिलक महाराज का ‘ केसरी ‘ और मैंचेस्टर गार्डियन : ले. महादेव देसाई

विशिष्ट विषयों पर लेखन : ले. महादेव देसाई

अखबारों में विज्ञापन , सिनेमा : ले. महादेव देसाई

अखबारों में सुरुचिपोषक तत्त्व : ले. महादेव देसाई

अखबारों के सूत्रधार : सम्पादक , ले. महादेव देसाई

कुछ प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार (१९३८) : महादेव देसाई

Technorati tags: , , , , , , , ,


मेरा पसन्दीदा ब्लॉग संकलक

www.blogvani.com

ई-मेल से प्राप्त करने के लिए

नयी प्रविष्टियों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए ई-मेल भरें

Archives

कब-कब लिखी हैं पोस्ट्स

October 2007
M T W T F S S
« Sep   Nov »
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
293031  

प्रविष्टियों की श्रेणियाँ

Political Blog

WordPress Political Blogger

RSS समाजवादी जनपरिषद

  • कोपेनहैगन : राष्ट्राध्यक्ष इतिहास न बना सके लेकिन जनता ने बनाया December 21, 2009
    रात भर चली वार्ताओं में विश्व के राष्ट्राध्यक्ष कोपेनहेगन एक लचर सहमती पर पहुँचे जिसमें पृथ्वी के गरम होने की प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए उद्योगों के उत्सर्जन पर नकेल कसने के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं किए गये हैं । यह समझौता फन्डिंग के मामले में मजबूत था परन्तु मौसम परिवर्तन की बाबत [...] […]
  • पत्रकार / चिट्ठेकार बाबा मायाराम की पुस्तक का लोकार्पण December 21, 2009
    बाबा मायाराम द्वारा लिखी गयीं सशक्त रिपोर्टों से चिट्ठा जगत परिचित है । ’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नामक उनकी किताब का लोकार्पण कल इटारसी में हुआ । इस अवसर पर प्रबुद्ध नागरिकों के अलावा उन क्षेत्रों के ग्रामीण भी शामिल थे, जिनके बारे में इस पुस्तक में विवरण है। इटारसी स्थित पत्रकार भवन में पर्यावरण बचाओ, धरती बचाओ [...] […]
  • इरोम शर्मिला को बचायें ,’आफ़्स्पा’ हटायें :ऑनलाईन प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करें December 13, 2009
    मित्रों , इस ब्लॉग पर आप मणिपुर की जुझारू महिला सत्याग्रही इरोम शर्मिला के ऐतिहासिक अहिंसक प्रतिकार के बारे में पढ़ चुके हैं । इरोम शर्मिला की मांगों के प्रति नैतिक एकजुटता प्रकट करने के लिए समाजवादी जनपरिषद की इकाइयों ने कार्यक्रम भी लिए । इरोम शर्मिला चानू द्वारा अन्न-जल छोड़े हुए नौ साल पूरे हो चुके [...] […]
  • आफ़्स्पा ( AFSPA ) के खिलाफ़ धरना और सभा December 12, 2009
    अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर समाजवादी जनपरिषद ने लंका , वाराणसी में आफ़्स्पा (Armed Forces Special Power Act, AFSPA,1958 ) के खिलाफ़ धरना एवं सभा का आयोजन किया । धरना कवियित्री एवं जुझारू कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला चानू के साहसिक संघर्ष के दसवें साल में प्रवेश के मौके पर उनके समर्थन में रखा गया था [...] […]
  • राजनीति का धंधा और धंधे की राजनीति : ले. सुनील December 9, 2009
    अखबार की वह खबर हैरान करने वाली थी। मैंने सोचा कि शायद छपाई की कोई गलती है या दशमलव बिन्दु इधर-उधर हो गया है। लेकिन दूसरे अखबार में भी देखा। वह सच थी। यह खबर चालू वित्त वर्ष की प्रथम छ:माही में अग्रिम आयकर जमा करने वाले शीर्षस्थ लोगों के बारे में थी। इनमें दूसरे [...] […]

RSS शैशव

  • अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (४) : एक पहाड़ और गिलहरी December 4, 2009
    [ राल्फ वाल्डो एमर्सन ( १८०३ - १८८२ ) द्वारा अंग्रेजीमें लिखी एक प्रसिद्ध कविता ( फ़ेबल ) का अल्लामा इक़बाल द्वारा किया गया यह तर्जुमा है । मुझे उम्मीद है कि हिन्दी जानने वाले बच्चे इसे सीखेंगे और याद कर लेंगे । ] कोई पहाड़ यह कहता था एक गिलहरी से तुझे हो शर्म तो पानी [...] […]
  • अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (३) : हमदर्दी December 1, 2009
    टहनी पे किसी शजर* की तनहा बुलबुल था कोई उदास बैठा   कहता था की रात सर पे आई उड़ने चुगने में दिन गुज़ारा   पहुँचूँ किसी तरह आशियाँ* तक हर चीज़ पे छा गया अन्धेरा   सुनकर बुलबुल की आहो ज़ारी* जुगनू कोई पास ही से बोला   हाज़िर हूँ मदद को जानो-दिल से कीड़ा हूँ अगरचे मैं ज़रा-सा   क्या गम है जो रात है अंधेरी मैं राह में [...] […]
  • अल्लामा इकबाल : बच्चो के लिए (2) : परिंदे की फ़रियाद November 30, 2009
    [ बचपन  में स्कूल में अल्लामा इकबाल की तीन  कवितायें सीखी थीं | 'जुगनू' काफी पहले दे चुका हूँ , इसी चिट्ठे पर | 'बच्चे की दुआ ' को आगाज़ में प्रस्तुत करूंगा , हालांकि तरन्नुम में जो क्लिप मिली है उसकी तर्ज जुदा है | आज यहाँ पेश है 'परिंदे की फ़रियाद ' | [...] […]
  • अरविन्द चतुर्वेद का स्वागत करें November 27, 2009
    हिन्दी के वरिष्ट पत्रकार और कवि अरविन्द चतुर्वेद ने अपना चिट्ठा बनाया है , जनपद । अपने लम्बे साहित्यिक जीवन से चुनी हुई ढेर सारी कविताओं को उन्होंने एक ही दिन में दनादन अलग – अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर दिया है । आप सबसे निवेदन है कि अरविन्द के चिट्ठे पर जाएँ [...] […]
  • एक लघु कहानी / अफ़लातून November 24, 2009
    हालात ने उसे पेशेवर भिखारी बना दिया होगा । उमर करीब पाँच- छ: साल। पेशे को अपनाने में दु:ख या संकोच होने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी उसकी कच्ची उमर ने । माँगने के कष्ट की शायद कल्पना ही न रही हो उसे और माँग कर न पाना भी उसके लिए उतना ही सामान्य [...] […]

RSS सुरे-बेसुरे गीतों का ब्लॉग

  • पूर्व बांग्ला की लोक धुन भटियाली , सितार, फिल्म संगीत पर December 19, 2009
    भटियाली वे बांग्ला नौकागीत हैं जो भाटा के दौरान नाविक गाया करते हैं , नदी की बहने की स्वाभाविक दिशा में । भटियाली - धुन इतनी मधुर और लोकप्रिय है की गीतों के अलावा प्रख्यात वादकों ने इन्हें सितार ,सरोद और बाँसुरी पर बजाया है । भटियाली में रवीन्द्र संगीत भी है । अन्य भारतीय भाषाओं में भी भटियाली धुनें अपनाई गई हैं । यहाँ भटियाली की दो धुनों पर दो हिन्दी फिल्मी […]
  • मालूम क्या किसीको, दर्दे – निहाँ हमारा / अल्लामा इक़बाल November 27, 2009
    सारे जहाँसे अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा ।हम बुलबुलें हैं उसकी , वह बोस्ताँ हमारा ॥ध्रु.॥गुरबतमे हों अगर हम , रहता है दिल वतनमें ।समझो वहीं हमें भी , दिल हो जहाँ हमारा ॥१॥परबत वह सबसे ऊँचा , हमसाया आसमाँका ।वह संतरी हमारा , वह पासबाँ हमारा ॥२॥गोदीमें खेलती हैं , जिसकी हजारों नदियाँ ।गुलशन है जिनके दम से , रश्के-जिनाँ हमारा ॥३॥ए आबे-रूदे-गंगा , वह दिन है याद तुझको […]
  • जीवन से लम्बे हैं बन्धु , ये जीवन के रस्ते /मन्ना डे/गुलजार/आशीर्वाद/वसन्त देसाई November 21, 2009
    जोगी ठाकुर का लिखा गीत तरुणाई से लबरेज गाड़ीवान गा रहा है । जोगी ठाकुर ही इतना डूब के सुन रहे हैं ,उसे पता नहीं है ।स्वर - मन्ना डे , संगीत - वसन्त देसाई , बोल - गुलज़ार , फिल्म आशीर्वाद […]
  • दिल नाउम्मीद तो नहीं , नाकाम ही तो है November 4, 2009
    आज रवि भाई ने अपने ब्लॉग पर गीत चढ़ाने वाले शौकीनों के लिए ’खुले स्रोत ’ का उपाय सोदाहरण बताया है । दो बार असफल होने के बावजूद उदास नहीं हुआ , फलस्वरूप यह उम्मीद पैदा करने वाला गीत आप सबके लिए प्रस्तुत हो सका । दिल नाकामयाब भले ही हो, नाउम्मीद न हो - आप सब के लिए यह कामना है । रवि भाई को समर्पित […]
  • बदाऊँ के शालीन के मिलने की खुशी में राशिद खान October 20, 2009
    डॉ. शालीन कुमार सिंह अंग्रेजी भाषा के कवि हैं । एक शालीन युवा । भारत में अंग्रेजी में कविता करने वाले एक समूह से जुड़े हैं । उन्हें तबला बजाने का भी शौक है । हाल ही में इनसे तार्रुफ़ हुआ है जो दोस्ती में बदल रहा है । मेरे ब्लॉग पर छपी कुँवरनारायण की एक कविता का उन्होंने अनुवाद किया है । इस ब्लॉग पर राशिद खान के गायन की पोस्ट देख कर तपाक से शालीन बोले,’वे भी बद […]

RSS दुनिया की खबरें

हिन्दी पढ़ने में दिक्कत तो नहीं ?

मोज़िला ब्राउसर पाठक वाले किन्ही पाठकों को यदि हिन्दी में तृटि(हृस्व इ,दीर्घ ई की) दिखती हो तो वे मोज़िला का नया मुफ़्त संस्करण डाउनलोड कर लें । समस्या दूर हो जायेगी।