न लिखने के बहाने

 

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     परसों एक मित्र ने याद दिलाया कि कई दिनों से मैं नहीं लिख रहा हूँ । ब्लॉग का स्वरूप दैनन्दिनी जैसा होता है - पुराने जमाने में दो छोटे डण्डों के बीच कपड़े पर लिखे सन्देश की तरह,जिसे एक छोर से दूसरे छोर तक लपेटते हुए पढ़ा जाता था । इस स्वरूप की एक कमी को दूर करने के लिए मैंने सभी प्रविष्टियों की विषय सूची तीनों चिट्ठों पर डाल दी थी,चिट्ठेकारी की सालगिरह पर । विषय सूची के जरिए पाठक जिन पुरानी प्रविष्टियों को देखना चाहें पहुँच जाते हैं , चूँकि तमाम शीर्षक पर्मालिंक युक्त हैं । न लिखने के अन्तराल में खोजी इन्जनों द्वारा भेजे गए पाठकों के अलावा ‘विषय-सूची’ के जरिए रोज ३० से ६० पाठक पुरानी प्रविष्टियों पर आये।

  ’विषय-सूची’  के लाभ बता रहा हूँ , इसे लिखने के सातत्य में आई टूट के हक में दलील कत्तई न मानें । चिट्ठेकारी का दैनन्दिनी वाला स्वरूप लाइव जर्नल पर लिखने वालों में देखा जा सकता है, ( एक बेहतर नमूना ) । इनका एक पाठकवर्ग बन जाता है जो अत्यन्त निष्ठापूर्वक हर प्रविष्टी पर टिपियाता है । ये टीपें अक्सर सवाल-जवाब,चर्चा-बहस के कारण ‘परिचर्चा’ जैसी भी बन जाती हैं । डायरीनुमा चिट्ठे ज्यादातर डायरियों की तरह अप्रकाशित नहीं होते इसलिए उनकी सामग्री में निजी डायरियों से कुछ फर्क जरूर होता होगा। अपनी कमजोरियों को भी दैनंदिन लिखने वाले , उन्हें संजाल पर छापने से कुछ संकोच करते होंगे ?

    एक गैर चिट्ठेकार , बल्कि अब तक चिट्ठेकारी विरोधी रोजनामचा लेखक से मैंने आज चर्चा की । मेरे पिता । पिछले ६८ वर्षों से दैनन्दिनी लिख रहे हैं। १६ वर्ष की उम्र से अपना रोजनामचा लिखना शुरु किया । उन्होंने बताया ,’ जब कभी लिखना छूट जाता है,तब छूटे हुए अन्तराल की डायरी एक साथ लिख लेता हूँ’। आजादी मिलने के बाद दक्षिण गुजरात के एक आदिवासी गाँव में मेरी बा के साथ उन्होंने बुनियादी पाठशाला में पढ़ाना शुरु किया ।आज उन्होंने बताया ,’ तब की डायरी देख कर विस्मय होता है । उन दिनों की डायरी स्कूलमय होती थी ।’

    कुछ दिनों पूर्व मेरी बेटी उनके पास गयी थी । तब मेरी चिट्ठेकारी के बारे में उन्होंने कहा , ‘तुम्हारा पिता तत्काल-तुष्टि वाले लेखन के चक्कर में दूरगामी महत्व का लेखन और अन्य काम छोड़ रहा है ।’ बहरहाल डायरी लिखना शुरु करने के और पाँच साल पहले , यानी ११ वर्ष की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी टाइपिंग (ब्लाइन्ड फ़ोल्ड) सीख ली थी और गति भी ८०-१०० शब्द प्रति मिनट हुआ करती थी।बहुत फक्र से वे याद करते हैं कि हिटलर को लिखा गाँधी का पत्र उन्होंने टाइप किया था । सम्पूर्ण क्रान्ति विद्यालय जिसकी स्थापना उन्होंने की है के कम्प्यूटर पर मैंने ‘बाराहा’ डाल दिया और उन्हें बाराहा द्वारा गुजराती तथा हिन्दी ऑफ़लाईन टंकण के बारे में बता दिया। साढ़े तिरासी साल की उम्र में इस नयी जानकारी से वे उत्साहित थे ।

    संजाल के प्रति उन्हें आकर्षित करने लायक एक और घटना हुई । १४ सितम्बर को उन्हें गुजराती में लिखी गाँधीजी की जीवनी( મારૂ જીવન એજ મારી વાણી ) के लिए ज्ञानपीठ का मूर्तीदेवी पुरस्कार अहमदाबाद में मिला। समारोह की खबर अहमदाबाद्द से प्रकाशित दो अंग्रेजी दैनिकों में आई,गुजराती दैनिकों में सन्नाटा था । प्रमुख गुजराती दैनिक ‘दिव्य भास्कर’ के सम्पादक प्रकाश शाह स्वयं उस कार्यक्रम में मौजूद थे । गुजरात नरसंहार के बाद , ‘गुजरात की जनता तक गाँधी का सन्देश पहुँचाने में विफल रहे-इसका गुनाहगार मैं भी हूँ’ - यह मानते हुए पूरे प्रान्त में घूम कर वे गाँधी-कथा सुनाते हैं । इस पृष्टभूमि में मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश के हिन्दी अखबारों की ‘९२ के दौर में अपनायी भूमिका की याद सहज ही आई।तब मुखपृष्ट पर ‘ राम लला की मूर्ति गायब !’ आठ कॉलम के बैनर में छपी थी(’आज’ के सभी संस्करणों में)। जब इस पर प्रेस आयोग द्वारा रघुवीर सहाय की अध्यक्षता में जाँच दल भेजा गया था तब बनारस में एक जुलूस के रूप में पहुँच कर हम लोगों ने सहायजी के समक्ष गवाही दी थी। गुजराती अखबारों ने मूर्तिदेवी पुरस्कार समारोह की खबर को नजरअन्दाज भले ही किया किन्तु तरकश के साथियों ने पत्रकारीय कौशल के साथ बगैर विलम्ब रपट छापी। तरकश के जिम्मेदार साथियों को भी गुजराती अखबारों द्वारा इसे अनदेखा करना समझ में नहीं आया,हाँलाकि मुझे पूरा भरोसा है कि इस मामले में मेरे अनुमान से वे पूरी तरह असहमत होंगे। दो हजार पृष्टों की जीवनी लिखने के बावजूद पिताजी ने जनता तक पहुँचने के लिये ‘कथा’ का पुराना माध्यम चुना है। ‘संजाल’ पर लेखन के बारे में उनकी आलोचना में दम है।उनकी तीन पुस्तिकाये छापने के कारण बारडोली की सुरुचि छापशाला सरकारी तालाबन्दी का शिकार हुई थी,‘दु:शासन पर्व’ में ।इन्टरनेट पर वैसी सेन्सरशिप मुमकिन नहीं होगी ,शायद वे यह समझ सकेंगे।उन्हें तरकश की रपट दिखाई ।

    हमारे एक नेता रामइकबाल बरसी ने कहा था,‘अखबारों की सुर्खियों में आने की लालसा रखने वाले इन्क़लाब नहीं लाते ।’ इस पर हम पूरी तरह खरे नहीं उतरते , बाप उतरते हैं। लोहिया ने रामइक़बाल बरसी को ‘पीरो का गाँधी’ कहा था। आज उनका सिर्फ़ एक किस्सा ।

  रामइक़बालजी एक भूखे और बीमार व्यक्ति को ले कर थाने पहुँचे। दरोगा से कहा,’ इसे खिलाओ,इलाज कराओ’।दरोगा चकराया।बोला,’क्यों? यह थाना है।’ रामइक़बालजी ने कहा , ‘इस हल्के के नागरिकों के जान-माल की रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है ।’ इस खाँटी तेवर का असर होना ही था ।

4 Responses to “न लिखने के बहाने”

  1. atulkumaar Says:

    उनकी डायरी के महत्व्पूर्ण प्रिष्ठो को भी श्रखलाबद्ध करके ब्लाग पर डालना चाहिए. भास्कर समूह राज्यो मे मुख्यमत्रियो के इशारे पर चलता है. मोदी के गान्धी द्वेष को देख सम्मान की रिपोर्ट नही छापी होगी.

  2. sanjay bengani Says:

    मैं आज भी मौका आने पर नारायण काका के हिन्दी में दिये भाषण की प्रसंशा करता हूँ. शब्द और शैली कमाल की थी.
    उनकी लिखी लिताब “तानाशाही को समझे” को नेट पर लाने की इच्छा है. कोपीराइट का कोई अड़ंगा न हो तो.

  3. sanjay bengani Says:

    अतुलजी आप मामले को बहुत सतही तौर पर ले रहे है. दो बड़े गुजराती अखबार तो मोदी विरोधी हैं…फिर? घटना का महत्त्व न समझना ही एक कारण नजर आता है.

  4. atulkumaar Says:

    घटना का महत्व समझ मे न आने की बात भी समझ के परे इसलिए है क्योकि ग्य़ानपीठ एक विख्यात सस्था है. उसकी खबर तो देश भर मे एजेसी आने पर भी छप जाती है फ़िर वहा उनका रिपोर्टर था तो भी न छपना आश्च्र्य लगता है. भास्कर पर मेरी टिप्पंणी उसकी सामान्य प्रव्रिति पर आधारित है. गुजरात के अखबारो का स्थानीय रुख मुझे ठीक से पता नही.

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