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फिर धीरे-धीरे यहाँ का मौसम बदलने लगा है ,
वातावरण सो रहा था अब आँख मलने लगा है ।
पिछले सफ़र की न पूछो , टूटा हुआ एक रथ है ,
जो रुक गया था कहीं पर , फिर साथ चलने लगा है ।
हमको पता भी नहीं था , वो आग ठंडी पड़ी थी ,
जिस आग पर आज पानी सहसा उबलने लगा है ।
जो आदमी मर चुके थे , मौजूद हैं इस सभा में ,
हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है ।
ये घोषणा हो चुकी है , मेला लगेगा यहाँ पर ,
हर आदमी घर पहुँचकर , कपड़े बदलने लगा है ।
बातें बहुत हो रही हैं,मेरे-तुम्हारे विषय में ,
जो रास्ते में खड़ा था पर्वत पिघलने लगा है ।
- दुष्यन्त कुमार ( साभार:’ साये में धूप ‘ )


दुष्य़ंत को पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है..
बहुत सुंदर!!
मेला तो लग चुका है,बिल्कुल सही वक्त पर आई कविता
[...] ‘मेला लगेगा यहाँ पर..’ [...]
[...] ‘मेला लगेगा यहाँ पर..’ [...]