‘मेला लगेगा यहाँ पर..’

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फिर धीरे-धीरे यहाँ का मौसम बदलने लगा है ,

वातावरण सो रहा था अब आँख मलने लगा है ।

पिछले सफ़र की न पूछो , टूटा हुआ एक रथ है ,

जो रुक गया था कहीं पर , फिर साथ चलने लगा है ।

हमको पता भी नहीं था , वो आग ठंडी पड़ी थी ,

जिस आग पर आज पानी सहसा उबलने लगा है ।

जो आदमी मर चुके थे , मौजूद हैं इस सभा में ,

हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है ।

ये घोषणा हो चुकी है , मेला लगेगा यहाँ पर ,

हर आदमी घर पहुँचकर , कपड़े बदलने लगा है ।

बातें बहुत हो रही हैं,मेरे-तुम्हारे विषय में ,

जो रास्ते में खड़ा था पर्वत पिघलने लगा है ।

- दुष्यन्त कुमार ( साभार:’ साये में धूप ‘ )

3 Responses to “‘मेला लगेगा यहाँ पर..’”

  1. अभय तिवारी Says:

    दुष्य़ंत को पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है..

  2. Beji Says:

    बहुत सुंदर!!

  3. arun Says:

    मेला तो लग चुका है,बिल्कुल सही वक्त पर आई कविता

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