[ 'अखबारनवीसी' पर सलीम शिवालवी की रचना का पहला भाग मेरे एक चिट्ठे पर पिछले दिनों छपा । पहले भाग पर दो प्रतिष्ठित चिट्ठेकारों - अनामदास और प्रियंकर ने पत्रकारिता के उज्जवल पक्ष की ओर इंगित करते हुए काव्य-टिप्पणियाँ दीं । सलीम की रचना का दूसरा भाग यहाँ दिया जा रहा है । यह भी , अखबारनवीसी के उज्जवल पक्ष पर प्रकाश डालता है । ]
आवाम का हथियार है अख़बार नवीसी , आइना-ए-संसार है ,अख़बारनवीसी ।
ऐ अहल-ए-नज़र गौर से पढ़कर तो जरा देख,एक ख़ुद-ब-ख़ुद अख़बार है,अख़बारनवीसी॥
मैदान-ए-जंग हो , के सुलगता हुआ शहर , हर मोड़ पर बेदार है अख़बारनवीसी ।
आता है इन्हें खूब ही ख़तरों से खेलना , समझो न के लाचार है अख़बारनवीसी ॥
चूके तो गये और बचे ग़र तो कामयाब , तलवार की एक धार है अख़बारनवीसी ।
जिसको सलाम करते हैं यारों बड़े-बड़े , वो मालिक-ए-मेयार है अख़बारनवीसी ॥
अफ़सोस जब से ये कई खेमों में बँट है , तब से ही कुछ बीमार है अख़बार नवीसी ।
बे-मिस्ल बहुत काम ये अन्जाम दे गयी , तारीफ़ की हक़दार है अख़बारनवीसी ।
तारीकियाँ हों , या के के उजाला हो ऐ ‘सलीम’ , हर लमहा ख़बरदार है अख़बारनवीसी ॥
- सलीम शिवालवी.
July 10, 2007 at 6:11 am |
बढ़िया है।
July 10, 2007 at 6:52 am |
वाह इसे तो आपके ब्लॉग पर परमानेन्ट रूप से दिखाया जाना चाहिये कहीं जगह बनाकर
July 10, 2007 at 11:01 am |
सच है खोमों में बंटकर कुछ बीमार है अख्बारनवीसी
August 4, 2007 at 11:54 am |
कृपया उर्दू शब्दों का हिंदी अर्थ भी दे दिया कीजिये।
घुघूती बासूती