पहला नशा ,पहला खुमार

By अफ़लातून

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[ १९७९ से '८१ के बीच लिखी कुछ कविताएँ ,मेरी उम्र थी २० से २२ वर्ष ]

भूकम्प से

पटे मकानों के नीचे

दबे जिन्दा बचे

बच्चों-सा वह विचार,

मन के भूचालों से

पते भय-भवनों तल :

जीवन और राहत की

शून्य में करके प्रतीक्षा

संभावित -

प्यार की, चाहत की ।

रो – रो कर थक चुका है ।

सो रहा है ।

( भूकम्प के दस दिन बाद ,दो जिन्दा बचे बच्चों का चित्र अखबार में छपा था)

अनिश्चिततता और विफलता

अगर राह चलते

भेंट हो इनसे-

तो क्या मुँह फेर लोगे ?

तुम्हारी असफलता

अगर अनिश्चितता से

परिचय कराना चाहे तुम्हारा -

तो  क्या नहीं मिलोगे उससे ?

कविता सा भाव

पाता हूँ

उभरता हुआ,

सजता-सँवरता ,

खौलता-पकाता हुआ तब :

जब

मन-पात्र में पडे दूध के-

न खौलने का -

खौला तो जलने का-

बासी हो फटने का-

होता आभास है !

कविता तू खास है !

गदहे से अनुभवों की घास है ।

सूखापन-सिंचितपन

दोनों के पास है।

कविता तू तुकबन्दी बेतुकेपन की ।

बेतुकापन

अधपक्के-अधकचरे लमहों का ।

अधपक्के-अधकचरे लमहों में

बेताल लुढक रही

नर्तकी का

ताल भरा नाँच हो

कविता तुम साँच हो ।

कुंठा है-

उलझा मंझा ।

सुलझा है गाँठों को साथ लिए ।

खुलती नहीं ।

तो रेशम लपेट लूँ उन पर ?

रेशमी हो जाँए शायद।

पत्थर-खा

माथे पर निकली पिडुल्ली पर

मढ़ कर

जीन्स पीछे लगा स्टिकर

फैशन का करूँ ज़िकर?

ऐसे में

करना दुरुस्त

माथे की पिंडुल्ली और उलझे हुए मंझे को-

दो गुठलियों वाले आम को

खाने की झुंझलाहट ।

‘कल’ : कीचड़ सने पाँवों-सा

दे रहा आहट-

कहीं कोई साफ आँगन गन्दा न हो ।

अलग सी

बात,

अलग सी रात ।

अलगाव-

अलाव सी

आँच देता ।

एक बार

बहुत प्यारे

अपने भतीजे को

मैंने पुकारा जब

हटात नाम तुम्हारा क्यों निकला जबान से ?

गर्म दोपहरी में

सितुरा* को

खूबसूरत दीप-साँचे में

पीतल ढालते देखा जब-

क्यों लगा

तुम्हारा होना तब वहाँ

और देखना उस सितुरा को

उतने ही ध्यान से ?

( सितुरा पीतल की खूबसूरत ढलाई करने वाली एक जाति है ,पीतल मँहगा होने के कारण घूम घूम कर बरतन ,लालटेन मरम्मत का मोटा काम करते हैं ।)

 

 

 

8 Responses to “पहला नशा ,पहला खुमार”

  1. समीर लाल Says:

    अलग सी

    बात,

    अलग सी रात ।

    अलगाव-

    अलाव सी

    आँच देता ।

    –भाई, आप तो पहले अच्छी कविता लिखते थे. अब क्यूँ नहीं लिखते??
    अच्छा लगा आपके विचारों को और आपके संवेदनशील हृदय के उदगारों को कविता के माध्यम से पढ़ना. बधाई.

  2. anamdas Says:

    भाई आप तो अच्छे ख़ासे कवि हैं, कपियों के दौर में आप जैसे भाई को देखकर लगता है कि डटे रहते तो हम लोगों के आपका नाम गिना देते. लोग तो पूछते हैं कौन है अच्छा कवि तो दो-तीन डबराल-डंगवाल के बाद नाम ही याद नहीं आते.
    अनामदास

  3. अनूप शुक्ल Says:

    बढि़या है! ऐसे ही लिखते रहें।
    कविता तू खास है !
    गदहे से अनुभवों की घास है ।
    सूखापन-सिंचितपन
    दोनों के पास है।

  4. Beji Says:

    आपकी कवितायें दो तीन बार पढ़ी….यह कहना कि अच्छी लगी काफी नहीं होगा…..ख्याल और अहसास को कविता में ढ़लते हुए महसूस किया……कवि तो हमेशा कवि ही रहता है….आज भी आप होंगे ही…कुछ ढ़ील अगर मन को दें तो कविताओं का सैलाभ छूट जायेगा।

  5. mohinder Says:

    बहुत ही सुन्दर भाव भरी रचनायें है
    नमन

  6. यह चिट्ठाचर्चा नहीं है फिर भी… « आईना Says:

    [...] एक गीत सूनें-पहला नशा ,पहला खुमार Filed under: बस यूँ ही, चिट्ठाकारिता, हिंदी, [...]

  7. मैथिली Says:

    अनिश्चिततता और विफलता
    अगर राह चलते
    भेंट हो इनसे-
    तो क्या मुँह फेर लोगे ?
    तुम्हारी असफलता
    अगर अनिश्चितता से
    परिचय कराना चाहे तुम्हारा -
    तो क्या नहीं मिलोगे उससे ?

    आपके इस रूप से मैं तो कतई अपरिचित था.

  8. प्रियंकर Says:

    यथार्थ और भावुकता का संयोग इन कविताओं को विशिष्ट बना रहा है .

    “कुंठा है
    उलझा मंझा”
    क्या धांसू तुलना है . एकदम सच्ची और सार्थक . इसे वही समझ पाएगा जिसने पतंग उड़ाई होगी .

    यह ‘अन्नो रकमेर’ विशिष्टता कहां अब तक कहां छुपी थी .

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