जीना ने ताने और गालियाँ सबसे पहले सीखीं
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पिछले सप्ताह दो हिन्दी फिल्मों को देखते वक्त, मजाकिया प्रसंगों में जीना तुरन्त हँसी । वह पिछले बीस बरस से योग करती है इसलिए हिन्दी गालियाँ और ताने पहले समझने और अब ,तीन सल बाद मजाक समझने के बारे में वह विभिन्न ‘चक्रों’ का हवाला देकर बताती है । तब वह रात में किताब पढ़ कर अगले दिन लोगों से बतियाने की कोशिश करती थी । उस पर लोग हँसते थे । उसे यह जरूर समझ में आता कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा है । ‘मोटी’ और ‘गोरी’ जैसे शब्द उसके शब्द भण्डार में शुरुआत में जुड़े । दोस्त भी इसी दौर में बनते गए । इन शब्दों को मजाक से अधिक गाली मानना चाहिए।उसका कहना है कि मनुष्य की बुनियादी या सहज वृत्ति की अभिव्यक्ति ‘प्रथम चक्र’ में आते हैं । रिक्शावाला जब किसीकी गाली सुनता है तब उसके चेहरे को पढ़ कर यह समझा जा सकता है कि वह गाली खा रहा है । मजाक या व्यंग्य करते वक्त हम भाषा से खेलते हैं , वह कुछ जटिल होता है, इसलिए वह ‘ऊपर के चक्र’ में आता है ।
उसके विश्वविध्यालय के छात्रावस के कमरे में शालिनी नाम की भारतीय लड़की रहती थी । शालिनी से भारतीय संस्कृति के बारे में उसे पहला परिचय मिला ।
जीना को फ़्रेन्च भी आती है ।फ्रेन्च भी उसे सुन्दर भाषा लगती है लेकिन हिन्दी गाने जैसी लगती है । देवनागरी लिपि में हिन्दी को वह सबसे वैज्ञानिक मानती है ।फ़्रेन्च के कई शब्द वैसे नहीं लिखे जाते जैसा उन्हे बोला जाता है ।
जीना और स्वाति
जीना देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी में चैटियाती है । रोमन लिपि में हिन्दी पढ़ना - लिखना उसे बहुत अखरता है । वह बाराहा का प्रयोग करती है लेकिन हिन्दी टाइप करने के बारे में उसका कहना है कि ट्रान्सलिटरेशन द्वारा टंकण एक नयी लिपि सीखने की तरह है । देवनागरी कुंजीपट से परिचित न होने के कारण शायद उसे ऐसा लगता हो ?
बनारस के निकट मेंहदीगंज में ‘पानी के हक’ के लिए चल रहे कोका-कोला विरोधी आन्दोलन का अध्ययन करने नृतत्वशास्त्र की शोध छात्रा के रूप में वह २००४ में पहली बार बनारस आई थी । आन्दोलन के बारे में उसकी रपट संजाल पर पढ़ी जाने वाली लोकप्रिय पत्रिका में छपी थी । इस बार वह एक फोटो-पत्रिका के लिए आई है । कई अमेरिकी स्कूलों और विश्वविद्यालयों द्वारा परिसर में कोका कोला बेचने के करार भंग कराने के लिए चलने वाले अभियान में वह सक्रिय है । इस अभियान में भारत में प्लाचीमाड़ा और मेहदीगंज के मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाते हैं ।
विदेशों में हिन्दी सीखने वाले कई विद्यार्थी संजाल पर हिन्दी में रुचि रखते हैं । जीना कहती है कि हिन्दी चिट्ठे बोल-चाल की भाषा में लिखे जाँए तो बेहतर हो । उसका कहना है कि संजाल पर हिन्दी को जो जगह मिल सकती है उस पर अँग्रेजी छायी हुई है । अमेरिकी समाज पर इन्टरनेट और चिट्ठों के प्रभाव को देखते हुए वह कहती है हिन्दी चिट्ठे लिखना सतत जारी रहना चाहिए । सरल भाषा में छोटी कहानियाँ और विभिन्न विषयों पर लेख देखना वह पसन्द करती है ।
संजाल पर हिन्दी मुहावरा कोश है या नहीं , वह जानना चाहती थी ।
मेरी पत्नी और साथी डॉ. स्वाति और मुझसे उक्त फोटो - पत्रिका के लिए बात करने कल वह हमारे घर आई थी ।
June 23, 2007 at 3:08 pm
जीना के बारे में जानकारी देने के लिये धन्यवाद
June 23, 2007 at 4:20 pm
जिय जीना!..
June 23, 2007 at 5:13 pm
जब भी हम किसी नए भाषाई क्षेत्र में जाते हैं तो सबसे पहले कुछ कटु शब्द ही सीखते हैं । जब हम आन्ध्रा प्रदेश में थे तब बच्चों ने सबसे पहले, मातलाड़तो (जैसा कुछ =चुप रहो), नीकू बुद्धि लेदू (= बुद्धि नहीं है क्या) आदि सीखा । जीना तो इतनी हिन्दी सीख गई पर हमारी तेलुगु तो पो(जाओ), रा (आओ), तेलुगु रादू (=तेलुगु नहीं आती ) तक ही सीमित रह गई । चलिये अच्छी बात है कि एक विदेशी युवती हिन्दी सीख रही है ।
वैसे एक मित्र से मैं कुछ गुजराती शब्द भी सीख रही हूँ ।
घुघूती बासूती
June 23, 2007 at 9:14 pm
pls tell me how you have used hindi
rahul.chavan@aol.in
hope you reply may helpful
June 23, 2007 at 10:50 pm
सही है। पढ़ा। अच्छा लगा।
June 24, 2007 at 2:49 am
शुक्रिया जीना से परिचय करवाने के लिए!!
उनकी कोशिश सराहनीय है! उनका आभार