राजा की शान , उदयप्रकाश
[ २४ नवम्बर , १९८७ को ८ से १४ मार्च , १९८१ के दिनमान में यह कविता पढ़ी । कविता के सन्दर्भ को देश से परिवार में ( या चिट्ठा-परिवार ?? ) में सिकोड कर भी देखा जा सकता है। संग्रह : सुनो कारीगर ,रेवती कुंज , हापुड , मूल्य रुपए २० ( तब ) ]
राजा की शान
मेमने को खा जाने के बाद
जंगल का राजा
अपनी परछाई देखता है
धूप में
और घमंड में गुर्राता है
उसे शानदार लगती है
अपनी चाल
अपनी कद काठी
अपने नाखून और दाँत उसे
शानदार लगते हैं ।
सबसे ज्यादा शानदार और
भव्य उसे लगती है
अपनी झब्बेदार पूँछ
अपनी पूँछ
ऊपर उठा कर
गर्व से चलता है
जंगल का राजा
तो उसकी
कौन से चीज खुली रह जाती है ?
June 13, 2007 at 3:33 pm
पहले जब पढ़ी थी.. तब भी और आज भी.. सत्य की उदघाटक कविता लगी..
June 13, 2007 at 3:43 pm
कविता कालजयी है . आपकी प्रस्तुति सामयिक और समीचीन . बधाई!
June 13, 2007 at 4:22 pm
उदय प्रकाश अपने शब्द और अर्थ दोनों में जादू रचते हैं।
June 13, 2007 at 5:43 pm
शान्दार जानदर कविता,मजा आगया
June 13, 2007 at 5:58 pm
बहुत रोचक कविता है… [:)]
June 13, 2007 at 7:05 pm
अरे आपने यह कविता मेरे जन्म दिन के दिन पढ़ी थी
एक खास बात आपसे मिलने पर बताऊगा इस कविता के सम्बन्ध मे
June 14, 2007 at 2:49 am
उदयप्रकाश की कविता महज़ एक शब्दों का जाल नहीं ; अपने समय को बाख़बर करता एक पूरा और ईमानदार सिलसिला है. ऐसा भी कह सकते हैं के हम कविता नहीं ; समय को पढ़ रहे हैं…और उतार रहे हैं एक पूरा वक़्त अपने भीतर.
संजय पटेल
June 14, 2007 at 7:05 pm
अफ़लातूनजी,
उदयप्रकाशजी की इस खूबसूरत रचना से रू-ब-रू करवाने के लिये शुक्रिया।
July 2, 2007 at 5:15 pm
Waise uday prakash premiyon ke liye soochana—-uday prakash aajkal baalaaji mandir aur baabaa chiranjeeshah baabaa kee dargaah par maath tekate hue paaye jaate hai.
July 23, 2007 at 7:05 pm
Brilliant poem. Waise Uday Prakash aajkal New York, Washington aur Virginina tatha Collumbia Vishwa Vidyalayon me Hindi ke bhrasht aachaaryon ki jam kar kalai khol rahe hain….His invincible spirit is an ideal for young writers.
Martha, Maryland, USA