राजा की शान , उदयप्रकाश

[ २४ नवम्बर , १९८७ को   ८ से १४ मार्च , १९८१ के दिनमान में यह कविता पढ़ी । कविता के सन्दर्भ को  देश से परिवार में ( या चिट्ठा-परिवार ?? ) में सिकोड कर भी देखा जा सकता है। संग्रह : सुनो कारीगर ,रेवती कुंज , हापुड , मूल्य रुपए २० ( तब ) ]

राजा की शान

  मेमने को खा जाने के बाद

जंगल का राजा

अपनी परछाई देखता है

धूप में

और घमंड में गुर्राता है

 

उसे शानदार लगती है

अपनी चाल

अपनी कद काठी

अपने नाखून और दाँत उसे

शानदार लगते हैं ।

 

सबसे ज्यादा शानदार और

भव्य उसे लगती है

अपनी झब्बेदार पूँछ

 

अपनी पूँछ

ऊपर उठा कर

गर्व से चलता है

जंगल का राजा

 

तो उसकी

कौन से चीज खुली रह जाती है ?

- उदयप्रकाश .

10 Responses to “राजा की शान , उदयप्रकाश”

  1. अभय तिवारी Says:

    पहले जब पढ़ी थी.. तब भी और आज भी.. सत्य की उदघाटक कविता लगी..

  2. प्रियंकर Says:

    कविता कालजयी है . आपकी प्रस्तुति सामयिक और समीचीन . बधाई!

  3. अविनाश Says:

    उदय प्रकाश अपने शब्‍द और अर्थ दोनों में जादू रचते हैं।

  4. arun Says:

    शान्दार जानदर कविता,मजा आगया

  5. sunita(shaanoo) Says:

    बहुत रोचक कविता है… [:)]

  6. PRAMENDRA PRATAP SINGH Says:

    अरे आपने यह कविता मेरे जन्‍म दिन के दिन पढ़ी थी

    एक खास बात आपसे मिलने पर बताऊगा इस कविता के सम्‍बन्‍ध मे

  7. bhashasamvad Says:

    उदयप्रकाश की कविता महज़ एक शब्दों का जाल नहीं ; अपने समय को बाख़बर करता एक पूरा और ईमानदार सिलसिला है. ऐसा भी कह सकते हैं के हम कविता नहीं ; समय को पढ़ रहे हैं…और उतार रहे हैं एक पूरा वक़्त अपने भीतर.
    संजय पटेल

  8. गिरिराज जोशी "कविराज" Says:

    अफ़लातूनजी,

    उदयप्रकाशजी की इस खूबसूरत रचना से रू-ब-रू करवाने के लिये शुक्रिया।

  9. lamppost Says:

    Waise uday prakash premiyon ke liye soochana—-uday prakash aajkal baalaaji mandir aur baabaa chiranjeeshah baabaa kee dargaah par maath tekate hue paaye jaate hai.

  10. Martha Hillarry Says:

    Brilliant poem. Waise Uday Prakash aajkal New York, Washington aur Virginina tatha Collumbia Vishwa Vidyalayon me Hindi ke bhrasht aachaaryon ki jam kar kalai khol rahe hain….His invincible spirit is an ideal for young writers.
    Martha, Maryland, USA

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