‘ फ़ैब इण्डिया ‘ से मेल खाते कुर्ते के बहाने
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मेरे प्रिय चिट्ठाकार प्रमोद कुमार ने सम्पूर्ण क्रान्ति दिवस ( ५ जून ) को एक प्रविष्टी डाली है । मेरे और अविनाश के थोबड़े और कपड़ों का महीन विवरण करने में मानो अपना दिल उड़ेल दिया है । फिर निचोड़ के रूप में यह दर्शन भी भिड़ा दिया कि आदमी का थोबड़ा सच बोलता है या उसकी बात ! जब किसी बात में , चाहे वह अफ़वाह ही क्यों न हो , सच का अन्श होता है तब ही वह विश्वसनीय होती है , टिकती है । प्रमोद कुमार ने खुद भी उसे ‘ अधूरा ‘ ही कहा है ।
फ़ैब इण्डिया से मेल खाता कुर्ता वसन्त विहार जैसे मॉलमय बाजारों में जरूर मिलता होगा और मुम्बई के भी ऐसे किसी हलके में । आज ही मेरे मित्र कवि चिट्ठाकार प्रियंकर ने बताया कि वैसे कुर्ते फैब इण्डिया में मिलते हैं और मँहगे होते हैं । उनके मँहगे होने में कीमत का बड़ा हिस्सा उस कम्पनी और दुकानदार के हिस्से में जाता है । प्रमोद जी के सच का यह अद्धा बिलकुल सही है ।
मेरे जिस कुर्ते से प्रमोद समेत कुछ लोग आकर्षित हुए वह खादी ( हाथ के काते सूत तथा हथकरघे पर बना) का है तथा प्राकृतिक रंगों से रंगा गया है । प्राकृतिक रंगों का प्रयोग शान्ति निकेतन या वड़ोदरा के कला केन्द्रों से ज्यादा कच्छ के मुसलमान रंगरेजों की रोजी - रोटी का सहारा है । गुजरात के नर संहार के पहले ही जो काम बरसों से संघ परिवार के लोग कर रहे थे उनमें एक था - “ मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार करो ” । यह विधिवत पर्चा निकाल कर किया गया था । लोहे के बुरादे , नील , हल्दी , अनार के छिलके आदि से आकर्षक रंग बनाने ,उन्हें पक्का करने का काम कच्छ में होता आया है । यह समूह भूकम्प से पीड़ित हुआ था और तोगड़ियों से भी । रंगे जाने के बाद इनकी सिलाई का काम नरोडा - पाटिया नरसंहार की विधवाओं के समूह ‘हिम्मत’ द्वारा किया जाता है । प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करने वाले कच्छ के के मुसलमान रंगरेजों ने ‘विविधा’ नामक समूह बनाया है । यह दोनों समूह कोई सरकारी अथवा विदेशी अनुदान नहीं लेते हैं । सिलाई , मशीन और हाथ की कढ़ाई आदि का प्रशिक्षण दंगों के बाद दिसम्बर २००३ में हुआ था । इन महिलाओं की इच्छा शक्ति और हुनर तथा दंगों के पहले से चल रहे ‘ आर्थिक बहिष्कार ‘ के शिकार कलाकारों का कुर्ता ‘ फैब इण्डिया ‘ के टक्कर का है यह जान कर सुकूँ मिला । कीमत के बारे में मेरा एकतरफा अन्दाज है कि यह फैब इन्डिया से बहुत सस्ता होगा । कीमत का बड़ा हिस्सा इन कारीगरों और बुनकरों और सिलाई करने वाली विधवाओं को मिलता है यह मैं पक्की तौर पर कह सकता हूँ ।
हिम्मत और विविधा के शो रूम दिल्ली - मुम्बई जैसे शहरों में नहीं हैं , अलबत्ता ऐसे शहरों में स्थानीय मददगार मिलने पर इन समूहों द्वारा प्रदर्शनी जरूर लगायी जाती है ।
सुखी - सन्तुष्ट दिखने वाली बात का खण्डन नहीं किया जा सकता क्योंकि पुलिस से मुकाबले के वक्त भी दुखी - असन्तुष्ट तो नहीं ही दिखते हैं।
June 8, 2007 at 9:02 pm
हमारे आगरे में तो इन प्राकृतिक रंगो का इस्तेमाल किसी किसी धर्म विशेष के रंगरेज ही नहीं. बाकी धरम वाले भी करते हैं.
जो चीज गांव तहसील के बाजारों में दस रुपये की मिलती है वही फैबमालों मे दो सौ की.
और अंसन्तुष्ट आदमी को भी दुखी जैसा ही क्यों दिखना चाहिये? आगरे के मकबूल शायर नजीर का कलाम देखिये.
गर यार की मर्जी हुई सर जोड़ के बैठे
घर बार छुड़ाया तो बही छोड़ के बैठे
मोड़ा उन्हें जिधर वहां मुंह मोड़ के बैठे
गुदड़ी जो सिलाई तो वही ओढ़ के बैठे
गर शाल उड़ाई तो उसी शाल में खुश हैं
पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में खुश हैं
इफ्लास में, इदबार में, इक्बाल में खुश हैं.
June 8, 2007 at 9:16 pm
आभार । कच्छ के प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल करने वालों के धर्म का जिक्र इसलिए किया है क्योंकि उस धर्म में पैदा होने के कारण उनके बहिष्कार की अपील की गयी थी । नरोरा पाटिया की विधवाओं के धर्म का जिक्र नहीं किया गया है क्योंकि उसके बारे में लोग जानते हैं । आगरा के प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करने वालों को भी सहकारी प्रयास करने होंगे ।
June 8, 2007 at 9:44 pm
अफ़लातून भाई,
मेरे दिल ‘उड़ेलने’ की बात से लगता है आपके स्वाभाविक उदार मन को ज़रा ठेस पहुंची है.. ऐसा किसी भी रूप में हुआ हो तो मैं पूरी विनम्रता से आपसे क्षमा मांगता हूं.. मेरे लिखे में थोड़ी नाटकीयकता भले घुस आई हो.. लेकिन मंशा किसी व्यक्ति के संबंध में टिप्पणी करने की नहीं, फ़ोटो के ‘पढ़े’ जाने के बाबत बात करने की थी.. और जैसा आप भी समझ ही रहे हैं, वह पढ़ पाना अधूरा था..
उसके कुछ छूटे हुए पहलू आपकी इस टिप्पणी से एक ज्यादा बड़ी सच्चाई सामने लाते हैं.. तो खुशी की बात है कि इसी बहाने यह बात कहने का मौक़ा भी बना.. हमारी कमअक़्र्र्ली में फैबइंडिया के बंद चौखटे से बाहर की थोड़ी नई सूचनाएं भी आईं.
धन्यवाद.
June 8, 2007 at 9:53 pm
चलिये बात ही बात में काफी जानकारी मिल गई. न इस तरह की बात उठती, न इन संस्थाओं के बारे में हम जान पाते. किसका आभार कहूँ-आपका या प्रमोद जी का. दोनों का ही कह देते हैं.
नजीर साहब के कलाम के लिये भी धुरविरोधी जी को साधुवाद.
June 8, 2007 at 10:34 pm
बढि़या लिखा है !
June 9, 2007 at 7:01 am
वाह अफ़लातून भाई ..
हमारी हर आम इस्तेमाल के चीज का ऐसा ही विचित्र इतिहास भूगोल होता है.. एक राजनीतिक सामाजिक सच होता है.. आपने कुर्ता पहन कर बखूबी उघाड़ा कुर्ते का सच..