देश की पूर्व – पश्चिम एकता का देव : कृष्ण (२) : डॉ . लोहिया

By अफ़लातून

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    आसमान के देवताओं को जो भाग्य उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ़ के लिए तैयार रहना चाहिए , तभी कृष्ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उँगली पर उठाना पड़ा । इन्द्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करता , तो ऐसा कृष्ण किस काम का ।फिर कृष्ण के रक्षा-युग का आरम्भ होने वाला था । एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर लीला है । कालिया दहन और कंस वध उसके आसपास के हैं । गोवर्धन उठाने में कृष्ण की उंगली दुखी होगी , अपने गोपों और सखाओं को कुछ झुँझला कर सहारा देने को कहा होगा । माँ को कुछ इतरा कर उँगली दूखने की शिकायत की होगी । गोपियों से आँख लड़ाते हुए अपनी मुसकान द्वारा कहा होगा । उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्ण की तो आपस में गम्भीर और प्रफुल्लित मुद्रा रही होगी ।कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्ण ने अधिक निहारा होगा , माँ की ओर इतरा कर , या राधा की ओर प्रफुल्लित हो कर । उँगली बेचारे की दूख रही थी । अब तक दुख रही है , गोवर्धन में तो यही लगता है । वहीं पर मानस गंगा है । जब कृष्ण ने गऊ वंश रूपी दानव को मारा था , राधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्थल पर कृष्ण से गंगा माँगी । बेचारे कृष्ण को कौन कौन से असंभव काम करने पड़े हैं । हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है दूसरों को सुखी बनाने के लिए । उसकी उँगली दूख रही है । चलो , उसको सहारा दें । गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों ने , जिनमें पंडे होते ही हैं , प्रश्न किया कि मैं कहाँ का हूँ ।

    मैंने छेड़ते हुए उत्तर दिया , राम की अयोध्या का ।

    पंडों ने जवाब दिया , सब माया एक है ।

    जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्तू वाले राम से गोवर्धन वासियों का नेह कैसे चल सकता है । उनका दिल तो माखन – मिसरी वाले कृष्ण से लगा है ।

    माखन – मिसरी वाला कृष्ण , सत्तू वाला राम कुछ सही है , पर उसकी अपनी उँगली अब तक दूख रही है ।

    एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुई । पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोई नतीजा न निकला , न निकलने वाला था । लेकिन क्या मीठी मुसकान से उस पंडे ने कहा के जीवन में दो मीठी बात करनी सीख गया है , आसमान वाले देवताओं को भगा गया है , माखन – मिसरी वाले देवों की प्रतिष्ठा कर गया है । लेकिन उसका अपना कौन – कौन सा अंग अब तक दूख रहा है ।

    कृष्ण की तरह एक और देवता हो गया है , जिसने मनुष्य बनने की कोशिश की । उसका राज्य संसार में अधिक फैला । शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़ई का बेटा था और उसकी अपनी जिन्दगी में वैभव और ऐश न था। शायद इसलिए कि जन – रक्षा का उसका अन्तिम काम ऐसा था कि उसकी उँगली सिर्फ़ न दूखी , उसके शरीर का रोम – रोम सिहरा और अंग – अंग टूट कर वह मरा । अब तक उसका ध्यान करके अपने सीमा बाँधने वाले चमड़े के बाहर उछलते हैं । हो सकता कि इसूमसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया है कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज की मालिक सभ्यता के पुरखे हैं । ईसू रोमियों पर चढ़ा । रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े । शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्ण – लीला का मजा ब्रज और भारत भूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्ण की नियति कठिन है । जो भी हो , कृष्ण और क्रिस्टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया । दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं – कहीं सादृश्य है । कभी दो महाजनों की तुलना नहीं करनी चाहिए । दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं ।फिर भी क्रिस्टोस प्रेम के आत्मोत्सर्गी अंग के लिए बेजोड़ है और कृष्ण सम्पूर्ण मनुष्य – लीला के लिए । कभी कृष्ण के वंशज भारतीय शक्तिशाली बनेंगे , तो सम्भव है उसकी लीला दुनिया भर में रस फैलाये ।

    कृष्ण बहुत अधिक हिन्दुतान के साथ जुड़ा हुआ है । हिन्दुस्तान के ज्यादातर देव और अवतार अपनी मिट्टी के साथ सने हुए हैं । मिट्टी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्प्राण हो जाते हैं । त्रेता का राम हिन्दुस्तान की उत्तर – दक्षिण एकता का देव है । द्वापर का कृष्ण देश की पूर्व – पश्चिम धुरी पर घूमे । कभी – कभी तो ऐसा लगता है कि देश को उत्तर – दक्षिण और पूर्व – पश्चिम एक करना ही राम और कृष्ण का धर्म था ।यों सभी धर्मों की उत्पत्ति राजनीति से है , बिखरे हुए स्वजनों को इकट्ठा करना , कलह मिटाना , सुलह कराना और हो सके तो अपनी और सब की सीमा को ढहाना । साथ – साथ जीवन को कुछ ऊँचा उठाना , सदाचार की दृष्टि से और आत्म – चिन्तन की भी ।

    देश की एकता और समाज के शुद्धि सम्बन्धी कारणों और आवश्यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्पत्ति हुई है । अलबत्ता , धर्म इन आवश्यकताओं से ऊपर उठ कर , मनुष्य को पूर्ण करने की भी चेष्टा करता है । किन्तु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत है , उतना और कोई धर्म नहीं । कभी – कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्ण के किस्से तो मनगढन्त गाथायें हैं , जिनमें एक अद्वितीय उद्देश्य हासिल करना था , इतने बड़े देश के उत्तर – दक्षिण और पूर्व – पश्चिम को एक रूप में बाँधना था । इस विलक्षण उद्देश्य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्से बने । मेरा मतलब यह नहीं कि सबके सब किस्से झूठे हैं । गोवर्धन पर्वत का किस्सा जिस रूप में प्रचलित है उस रूप में झूठा तो है ही , साथ – साथ न जाने कितने और किस्से , जो कितने और आदमियों के रहे हों एक कृष्ण अथवा राम के साथ जुड़ गये हैं । जोड़ने वालों को कमाल हासिल हुआ । यह भी हो सकता है कि कोई न कोई चमत्कारिक पुरुष राम और कृष्ण नाम के हुए हों । चमत्कार भी उनका संसार के इतिहास में अनहोना रहा हो । लेकिन उन गाथाकारों का यह कम अनहोना चमत्कार नहीं है , जिन्होंने राम और कृष्ण के जीवन की घटनाओं को इस इस सिलसिले और तफ़सील में बाँधा है कि इतिहास भी उसके सामने लजा गया है ? आज के हिन्दुस्तानी राम और कृष्ण की गाथाओं की एक – एक तफ़सील को चाव से और सप्रमाण जानते हैं , जब कि ऐतिहासिक बुद्ध और अशोक उनके लिए धुँधली स्मृति मात्र रह गये हैं ।

    महाभारत हिन्दुस्तान के की पूर्व – पश्चिम यात्रा है , जिस तरह रामायण उत्तर – दक्षिण यात्रा है । पूर्व – पश्चिम यात्रा का नायक कृष्ण है , जिस तरह उत्तर – दक्षिण यात्रा का नायक राम है । मणीपुर से द्वारका तक कृष्ण या उसके सहचरों का पराक्रम हुआ हुआ है , जैसे जनकपुर से श्रीलंका तक राम या उसके सहचरों का । राम का काम अपेक्षाकृत सहज था । कम से कम उस काम में एकरसता अधिक थी । राम का मुकाबला या दोस्ती हुई भील , किरात , किन्नर , राक्षस इत्यादि से , जो उसकी अपनी सभ्यता से अलग थे । राम का काम था इनको अपने में शामिल करना और उनको अपनी सभ्यता में ढाल देना , चाहे हराये बिना या हराने के बाद ।

    कृष्ण को वास्ता पड़ा अपने ही लोगों से । एक ही सभ्यता के दो अंगों में से एक को लेकर भारत की पूर्व – पश्चिम एकता कृष्ण को स्थापित करनी पड़ी । इस काम में पेंच ज्यादा थे । तरह – तरह की सन्धि और विग्रह का क्रम चला । न जाने कितनी चालाकियाँ और धूर्ततायें भी हुईं । राजनीति का निचोड़ भी सामने आया – ऐसा छन कर जैसा फिर और न हुआ । अनेकों ऊँचाइयाँ भी छू गयी । दिलचस्प किस्से भी खूब हुए । जैसी पूर्व – पश्चिम राजनीति जटिल थी , वैसे ही मनुष्यों की आपसी सम्बन्ध भी, खास कर मर्द-औरत के । अर्जुन की मणीपुर वाली चित्रांगदा , भीम की हिडिम्बा , और पांचाली का तो कहना ही क्या । कृष्ण की बुआ कुन्ती का एक बेटा था , अर्जुन , दूसरा कर्ण , दोनों अलग – अलग बापों से और कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण का छल-वध करने के लिए उकसाया । फिर भी , क्यों जीवन का निचोड़ छन कर आया । क्योंकि कृष्ण जैसा निस्व मनुष्य न कभी हुआ और उससे बढ़ कर कभी होना ही असम्भव है। राम उत्तर – दक्षिण एकता का न सिर्फ नायक बना , राजा भी हुआ । कृष्ण तो पनी मुरली बजाता रहा । महाभारत की नायिका द्रौपदी से महाभारत के नायक कृष्ण ने कभी कुछ लिया नहीं , दिया ही ।

( जारी )

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