दो माँ , दो बाप , दो नगर , दो प्रेमिकाएँ या यों कहिए अनेक ( ले. लोहिया)
कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो माँ , दो बाप , दो नगर , दो प्रेमिकाएँ या यों कहिए अनेक । जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है , वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गयी है । यों कृष्ण देवकीनन्दन भी हैं , लेकिन यशोदानन्दन अधिक । ऐसे लोग भी मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली माँ , पेट-माँ का नाम न जानते हों ,लेकिन बाद वाली दूध वाली , यशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा । उसी तरह , वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं , और नन्द को असली बाप से कुछ बढ़ कर ही रुतबा मिल गया है । द्वारका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं ,क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है । किन्तु यदि कृष्ण की चले , तो द्वारका और द्वारकाधीश , मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे । मथुरा से तो बाललीला और यौवनक्रीडा की दृष्टि से , वृन्दावन और बरसाना वगैरह अधिक महत्वपूर्ण हैं । प्रेमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है । किसकी तुलना की जाय , रुक्मणी और सत्यभामा की , राधा और रुक्मणी की , या राधा और द्रौपदी की । प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा । अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरु की है । जो हो , अभी तो राधा ही बडभागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है । समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह तक पहुँचाये , लेकिन इतना सम्भव नहीं लगता । हर हालत में , रुक्मणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी ।
मनुष्य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख है । यह शारीरिक सीमा उसे अपना एक दोस्त , एक माँ , एक बाप , एक दर्शन वगैरह देती रहती है । किन्तु समय हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता है , मन ही के द्वारा उछल सकता है । कृष्ण उसी तत्व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलाँघता-उलाँघता सब में मिला देता है , किसी से भी अलग नहीं रखता । क्योंकि कृष्ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्य लीला है , केवल सिद्धान्तों और तत्वों का विवेचन नहीं , इसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रह कर दो और निरापनी हो गयी है । यों दोनों में ही कृष्ण का तो निरापना है , किन्तु लीला के तौर पर अपनी माँ , बीवी और नगरी से परायी बढ़ गयी है । पराई को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खत्म करना है । मथुरा का एकाधिपत्य खत्म करती है द्वारका , लेकिन उस क्रम में द्वारका अपना श्रेष्ठत्व जैसा कायम कर लेती है।
भारतीय साहित्य में माँ है यशोदा और लला हैं कृष्ण । माँ-लला का इन से बढ़ कर मुझे तो कोई सम्बन्ध मालूम नहीं , किन्तु श्रेष्ठत्व भर ही तो कायम होता है । मथुरा हटती नहीं और न रुक्मणी , जो मगध के जरासन्ध से ले कर शिशुपाल होती हुई हस्तिनापुर के द्रौपदी और पाँच पाण्डवों तक एक-रूपता बनाये रखती है । परकीया स्वकीया से बढ़कर उसे खत्म तो करता नहीं , केवल अपने और पराये की दीवारों को ढहा देता है । लोभ , मोह, ईर्ष्या , भय इत्यादि की चहारदीवारी से अपना या स्वकीय छुटकारा पा जाता है । सब अपना और , अपना सब हो जाता है । बड़ी रसीली लीला है कृष्ण की , इस राधा-कृष्ण या द्रौपदी-सखा और रुक्मणी-रमण की कहीं चर्म सीमित शरीर में ,प्रेमानन्द और खून की गरमी और तेजी में , कमी नहीं । लेकिन यह सब रहते हुए भी कैसा निरापना ।
कृष्ण हैं कौन ? गिरधारी , गिरधर गोपाल ! वैसे तो मुरलीधर और चक्रधर भी है , लेकिन कृष्ण गुह्यतम रूप तो गिरधर गोपाल में ही निखरता है । कान्हा को गोवर्धन पर्वत अपनी कानी उँगली पर क्यों उठाना पड़ा था ? इसलिए न की उसने इन्द्र की पूजा बन्द करवा दी और इन्द्र का भोग , खुद खा गया , और भी खाता रहा । इन्द्र ने नाराज हो कर पानी , ओला , पत्थर बरसाना शुरु किया,तभी तो कृष्ण को गोवर्धन उठा कर अपने गो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी । कृष्ण ने इन्द्र का भोग खुद क्यों खाना चाहा ? यशोदा और कृष्ण का इस सम्बन्ध में गुह्य विवाद है । माँ,इन्द्र को भोग लगाना चाहती है , क्योंकि वह बड़ा देवता है , सिर्फ वास से ही तृप्त हो जाता है,और उसकी बड़ी शक्ति है,प्रसन्न होने पर बहुत वर देता है और नाराज होने पर तकलीफ । बेटा कहता है वह इन्द्र से भी बड़ा देवता है ,क्योंकि वह तो वास से तृप्त नहीं होता और बहुत खा सकता है और उसके खाने की कोई सीमा नहीं । यही है कृष्ण-लीला का गुह्य-रहस्य । वास लेने वाले देवतओं से खाने वाले देवताओं तक की भारत - यात्रा ही कृष्ण-लीला है ।
कृष्ण के पहले , भारतीय देव , आसमान के देवता हैं । निस्सन्देह अवतार कृष्ण के पहले से शुरु हो गये । किन्तु त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरन्तर देव बनने की कोशिश करता रहा । इसलिए उसमें आसमान के देवता का अन्श कुछ अधिक है । द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है , जो निरनतर मनुष्य बनने की कोशिश करता रहा । उसमें उसे सम्पूर्ण सफलता मिली । कृष्ण सम्पूर्ण और अबोध मनुष्य है , खूब खाया -खिलाया, खूब प्यार किया और प्यार सिखाया ,जनगण की रक्षा और उसका रास्ता बताया ,निर्लिप्त भोग का महान त्यागी और योगी बना ।
इस प्रसंग में यह प्रश्न बेमतलब है कि मनुष्य के लिए, विशेषकर राजकीय मनुष्य के लिए , राम का रास्ता सुकर और उचित है या कृष्ण का । मतलब की बात यह है कि कृष्ण देव होता हुआ निरन्तर मनुष्य बनता रहा । देव और निस्व और असीमित होने के नाते कृष्ण में जो असम्भव मनुष्यताएँ हैं , जैसी झूठ ,धोखा और हत्या , उनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैं,उसमें कृष्ण का क्या दोष । कृष्ण की सम्भव और पूर्ण मनुष्यताओं पर ध्यान देना ही उचित है , और एकाग्र ध्यान ।कृष्ण ने इन्द्र को हराया ,वास लेने वाले देवों को भगाया , खाने वाले देवों को प्रतिष्ठित किया , हाड़ ,खून, माँस वाले मनुष्य को देव बनाया , जन-गण में भावना जागृत की देव को आसमान में मत खोजो,खोजो यहीं अपने बीच, पृथ्वी पर । पृथ्वी वाला देव खाता है , प्यार करता है ,मिल कर रक्षा करता है ।
कृष्ण जो कुछ करता था , जम कर करता था ,खाता था जम कर ,प्यार करता था कम कर , रक्षा भी करता था जम कर करता था : पूर्ण भोग , पूर्ण प्यार , पूर्ण रक्षा । कृष्ण की सभी क्रियाएँ उसकी शक्ति के पूरे इस्तेमाल से ओत-प्रोत रहती थीं , शक्ति का कोई अंश बचा कर नहीं रखता था , कंजूस बिलकुल नहीं था , ऐसा दिलफेंक ,ऐसा शरीर फेंक चाहे मनुष्यों से सम्भव न हो , लेकिन मनुष्य ही हो सकता है , मनुष्य का आदर्श , चाहे जिसके पहुँचने तक हमेशा एक सीढ़ी पहले रुक जाना पड़ता हो । कृष्ण ने खुद गीत गाया है स्थितप्रज्ञ का ,ऐसे मनुष्य का जो अपनी शक्ति का पूरा और जमकर इस्तेमाल करता हो । ” कूर्मोगानीव ” ने बताया है ऐसे मनुष्य को ।कछुए की तरह यह मनुष्य अपने अंगों को बटोरता है , अपनी इन्द्रियों पर इतना सम्पूर्ण प्रभुत्व है इसको कि इन्द्रियार्थों से उन्हें पूरी तरह हटा लेता है ।कुछ लोग कहेंगे कि यह तो भोग का उलटा हुआ । ऐसी बात नहीं ।जो करना ,जमकर - भोग भी , त्याग भी। जमा हुआ भोगी कृष्ण ,जमा हुआ योगी तो था ही । शायद दोनों में विशेष अन्तर नहीं ।फिर भी कृष्ण ने एकांगी परिभाषा दी ,अचल स्थितप्रज्ञ की , चलस्थितप्रज्ञ की नहीं । उसकी परिभाषा तो दी जो इन्द्रियों से इन्द्रियों को हटा कर पूर्ण प्रभुता निखरता हो,उसकी नहीं जो इन्द्रियों को इन्द्रियार्थों में लपेट कर , घोल कर ।कृष्ण खुद तो दोनों था,परिभाषा में एकांगी रह गया । जो काम किस समय कृष्ण करता था,उसमें अपने समग्र अंगों का एकाग्र प्रयोग करता था ,अपने लिए कुछ भी नहीं बचाता था ,अपना तो था ही नहीं कुछ उसमें। ” कूर्मोगानीव ” के साथ-साथ ” समग्र-अंग-एकाग्री ” भी परिभाषा में शामिल होना चाहिए था । जो काम कर, कम कर करो,अपना पूरा मन और शरीर उसमें फेंक कर ।देवता बनने की कोशिश में मनुष्य कुछ कृपण हो गया है ,पूर्ण आत्मसमर्पण वह कुछ भूल सा गया है। जरूरी नहीं है कि वह अपने-आप को किसी दूसरे के समर्पण करे ।अपने ही कामों में पूरा आत्मसमर्पण करे । झाड़ू लगाये तो जमकर ,या अपनी इन्द्रियों का पूरा प्रयोग कर युद्ध में रथ चलाये तो जम कर ,श्यामा मालिन बन कर राधा को फूल बेचने जाए तो जम कर ,जीवन का दर्शन ढूँढे और गाए तो जम कर ।कृष्ण ललकारता है मनुष्य को अकृपण बनने के लिए ,अपनी शक्ति को पूरी तरह और एकाग्र उछालने के लिए। मनुष्य करता कुछ है ,ध्यान कुछ दूसरी तरफ रहता है ।झाड़ू देता है फिर भी कूड़ा कोनों में पड़ा रहता है । एकाग्र ध्यान न हो तो सब इन्द्रियों का अकृपण प्रयोग कैसे हो । ” कूर्मोगानीव ” और ” समग्र-अंग-एकाग्री ” मनुष्य को बनना है । यही तो देवता की मनुष्य बनने की कोशिश है । देखो, माँ ,इन्द्र खाली वास लेता है , मैं तो खाता हूँ ।
( जारी )
April 28, 2007 at 2:03 am
इसके आगे की कढी का इन्तजार है…..
April 28, 2007 at 11:37 am
काफी पहले मैने कृष्ण और आधुनिक गीता पर कउछ लिखा था। यदि नज़र न पढ़ी हो तो यहाँ देख सकते है।
http://soniratna.wordpress.com/2006/08/16/geeta/
April 28, 2007 at 6:23 pm
कृष्ण क्रान्तिकारी थे। जेल चमें जन्मे। जंगलों में गाय चराते गरीबी में जीवन बीता। माखन चुरा कर पेट भरा। बचपन से ही असुरों का आक्रमण सहा। कंस मामा को मारा। कभी रणछोड़ भागे तो कभी रथ का ड्राईवर बनना पड़ा। नरकासुर को मारा तो उसके हरम से जिन 9 लाख 16 हजार सर्वहारा नारियों को मुक्त कराया, उन्हें अपनाने के लिए अन्य कोई भी राजी नहीं हुआ। उन सबको अपनी पटरानी बनाना पड़ा। फिर भी जीवन भर राधा के लिए तड़पते रहे। पा न सके। अन्त में अपने समग्र वंश का विनाश अपनी आँखों से देखना पड़ा। फिर भी सदा हँसते और हँसाते रहे। जो भी कृष्ण के चित्र को देखता है, उसे हर्ष ही होता है।
April 28, 2007 at 8:21 pm
सही है..
May 2, 2007 at 2:13 pm
बहुत सुन्दर लिखा है । कृष्ण के कितने रंग हैं किन्तु आपने जो यह कहा कि वे जो करते थे मन प्राण से करते थे बहुत अच्छा लगा । क्या कर रहे हो से अधिक महत्वपूर्ण किस ढंग से कर रहे हो हो गया । यह जीवन दर्शन बहुत सही व महत्वपूर्ण है ।
घुघूती बासूती