एक कौम : उसकी हँसी , उसके सपने ( लोहिया : ३ )

By अफ़लातून

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    इसी तरह , जाहिर है , कृष्ण और राम की किंवदन्तियों के भी दूसरे स्वरूप हैं । राम चाहे जितने ही मर्यादा पुरुषोत्तम रहे हों , लेकिन, अगर उनके किस्से का मामला बैलगाड़ी की पुरानी लीक तक ही फँस कर रह जाएगा तो फिर उनके उपासक कभी आगे बढ़ नहीं सकते । वे लकीर में बँधे रह जाएँगे । यह सही है कि राम के उपासक , शायद , बहुत बुरा काम नहीं करेंगे , क्योंकि बुराई करने में भी वे मर्यादा से बँधे हैं अगर अच्छाई करने में मर्यादा से बँधे हुए हैं तो वे दोनों तरफ बँधे हुए हैं । शिव या कृष्ण में इस तरह बन्धन का कोई मामला नहीं है । कृष्ण में तो किसी भी नीति के बन्धन का मामला नहीं है ।और शिव में हर एक घटना खुद इतने महत्व की हो जाती है कि अपनी सम्पूर्ण शक्ति उसमें लगाकर , उस वक्त भी पूरी हद तक पहुँच सकता है या उससे बाहर , और उसके बाद , जैसा कि दक्षिण वालों में तो यह कहीं ज्यादा मालूम होगा , उत्तर वालों के मुकाबले में । तांडव की भी कोई बुनियाद होती है : एक गाढ निद्रा – एकाएक आँख खुली , लीला देखी , लीला के साथ-साथ आँखें इधर-उधर मटकायीं , और देख कर फिर आँखें बन्द हो गयीं । फिर , मुमकिन है , एक दूसरी सतह पर आँखें बन्द हुईं और एक लीला हुई और चली गयी , आँखें खुलीं और बन्द हुईं ।

    इससे एक तामस भी जुड़ा हुआ है । शान्ति सतोगुण का प्रतीक है । लेकिन अगर शान्ति कहीं बिगड़ना शुरु हो जाये तो फिर वह

साभार : कल्पना 

 

तामस का रूप ले लिया करती है ।   चुप बैठो , कुछ करो मत , धगद्धगद होता रहे , धतूरा या धतूरे प्रतीक की कोई न कोई चीज़ चलती रहे । और हमारे देश में अकर्मण्यता का तो बहुत जबरदस्त दार्शनिक आधार है , कर्म नहीं करने का । यह सही है कि अलग-अलग मौकों पर हिन्दुस्तान के इतिहास में अलग-अलग दार्शनिकों ने कर्म के सिद्धान्त को , अपने हिसाब से , समझाने की कोशिश की है । लेकिन बुनियादी तौर पर हिन्दुस्तान का असली कर्म-सिद्धान्त यही है कि जहाँ तक बन पड़े अपने-आप को कर्म की फाँस से रिहा करो । यह सही है कि जो पुराने संचित कर्म हैं , उनसे तो छूट सकते नहीं , उनको तो भुगतना पड़ेगा , वे तो और नये कर्मों में आएँगे ही , लेकिन , कोशिश यह करो कि नये कर्म न आएँ । हिन्दुस्तान की सभ्यता का यह मूलभूत आधार कभी नहीं भूलना चाहिए , कि नये काम मत करो , पुराने कामों को भुगतना ही पड़ेगा और जब कामों की श्रृंखला टूट जाएगी तभी मोक्ष मिलेगा । और शिव जैसी किंवदन्ती , और इस तरह के विचार के मिल जाने के बाद , कई बार तामस भी आ जाया करता है – उसके साथ – साथ एकाएक कोई विस्फोट हो जाया करता है यानी जिसके आगे और पीछे कुछ हैं नहीं , नतीजा निकले या न निकले , क्योंकि जहाँ हर एक कर्म अपने औचित्य को अपने आप में रखता हो और न आगे है न पीछे है , वहाँ , अगर किंवदन्ती कहीं बिगड़ गयी तो यह सम्भावना हो जाया करती है कि विस्फोट हो जाये । उसका आगे है न पीछे है और न ही कोई तात्पर्य है । फिर , जब किंवदन्तियाँ बिगड़ती हैं , तो वे ,चाहे राम का इलाका हो , चाहे कृष्ण का इलाका हो , चाहे शिव का इलाका हो , बिगड़ती ही चली जाती हैं ।

    मैं समझता हूँ , किसी हद तक , मैंने इन तीन किंवदन्तियों के स्वरूप आपके सामने रखे – बड़े स्वरूप । इनके किस्से किसी भी काम के लिए मनोहर हैं और छाती को चौड़ा करने वाले हैं ।जरूरी नहीं है कि कोई उन किस्सों को माने । झूठे हैं तो इससे मुझसे क्या मतलब ? किस्से तो हैं न ! हम उपन्यास पढ़ते हैं कि नहीं पढ़ते । ‘ हितोपदेश ‘ और ‘ पंचतंत्र ‘ के गंगदत्त और प्रियदर्शन को याद रखते हैं । ये किस्से ऐसे हैं जिन्हें हर एक कौम , अपनी हँसी और सपने को , दिमाग की सतह पर , जो बहुत बुनियादी और गहरी सतह है , उस पर खोद कर रखा करती है । इन किस्सों के बारे में सावधान हो कर रहना चाहिए ।

      वह नीलकण्ठ शिव , जिसके हर एक काम का औचित्य उसके अन्दर बना हुआ है । वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम और वह योगीश्वर कृष्ण जो लीला करके चन्द्रमा को ताने मारा करता है । ये सब किसी भी आदमी के दिल को बड़ा करने वाले किस्से हैं ।पुराने देश ने इस बात का भी थोड़ा-बहुत इंतजाम किया कि ये किंवदन्तियाँ आपस में न टकराएँ । अगर वे कहीं टकराती हैं , शायद मुमकिन है भी , तो बोलचाल में , कहीं लोगों में गरम बोल-चाल हो गयी हो आपस में । ज्यादा से ज्यादा , मारपीट इस हद तक हुइ होगी कि लोगों ने मूर्तियाँ तोड़ी हों । मूर्तियाँ तो आज भी टूटती हैं और पहले के जमाने में टूटी होंगी ।इसमें आदमी को बहुत सोच-विचार नहीं करना चाहिए ।यह सब तो लीला की तरह चलता रहता है , आँखें खोलो और बन्द करो ।कहीं पर मूर्ति टूट गयी या बन गयी, यह सब तो चला करता है ।ख़ैर । ये इंतजाम किये गये हैं कि तीनों आपस में टकराएँ नहीं ।

    और सिर्फ जमुना और सरयू में ही एका करने की कोशिश नहीं की गयी । जब तुलसीदास गये जमुना के किनारे , तो उन्होंने अपना सिर नँवाने से इनकार किया , यह जानते हुए कि सब एक ही माया है । लेकिन उन्होंने कहा कि भई हाथ में धनुष-बाण लो ,अपनी मुरली अलग रखो तब मैं अपना सिर नँवाऊँगा । तो फिर मुरली अलग हुई , धनुष-बाण हाथ में आया , जमुना और सरयू एक हो गयी। और , हमारे यहाँ के जो गाने-बजाने वाले लोग हैं , उनसे बढ़ कर इन मामलों में कोई और नहीं हो सकते , जो राम को हमेशा जमुना के तट पर होली खिलवा के छोड़ दिया करते हैं ।जमुना के तट पर राम होली खेलें ।तो अब कहो कि ये कौन सी बात है ।सरयू के तट पर कृष्ण जाकर कौन-सी अपनी रास-लीला रचायें ।ये सब चीजें हमारे लेखक कर दिया करते हैं , और लेखक कोई मामूली आदमी थोड़े ही होते हैं , पर हर लेखक नहीं ।बड़ा लेखक बहुत बड़ा आदमी होता है । वह राम को भेज देता है जमुना -किनारे और कृष्ण को भेज देता है सरयू-किनारे ।फिर यह क्यों न सम्भव हो कि हिन्दुस्तानी लोग भी ऐसी किंवदन्ती को अपने आँखों के सामने लायें कि जिसमें शिव अपनी जटा में सिर्फ चन्द्रमा ही नहीं मुरली वाले कृष्ण को लिये हो , और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ तांडव कर रहा हो ।लाने को ऐसी तसवीरें लोग अपनी आँखों में ला ही सकते हैं , शायद आ जाए हिन्दुस्तान में ।

    मेरा बिलकुल यह मतलब नहीं था कि कोई उपदेश करूँ । उपदेश मैं कर भी क्या सकता हूँ ।उपदेश करना बेवकूफ़ी होगी ।इसका सिर्फ एक मकसद था कि इन तीन किंवदन्तियों के कुछ पहलुओं को आपके सामने लाना कि जिसमें कुछ किस्से-कहानियों को याद करके आपकी तबियत कुच खुश हो , आप कुछ हँसें और कुछ सपने देखें ।

    ६ महीने तक मरी हुइ पार्वती को अपने कंधों पर डाल कर ले चलना , यह भी एक अनोखा प्रेम है ।लड़ाई के मैदान में दुनिया के शायद सबसे बड़े दर्शन को गीत के रूप में कह देना , यह भी एक अनोखा दर्शन है । यों हिन्दुस्तान में एक अजीब खूबी पायी गयी है कि अपने दर्शन को उसने गीत के रूप में कहा । और कौमों ने भी इसकी कोशिश की , लेकिन,जिस किसी सबब से हो,उतनी सफलता नहीं मिली । उसी तरह से राम ने भी अपनी ताकत को मर्यादा के अन्दर रख कर अपना काम किया ।जब रावण मर रहा था तो राम ने लक्ष्मण को रावण से राजनीति सीखने के लिए कहा कि जाओ ,सीख कर आओ । पहले नहीं भेजा था ।हर एक चीज का अपना वक्त होता है । कई लोग कहते हैं कि राम बड़ा चतुर था । हो सकता है कि वह चतुर रहा हो ।लक्ष्मण और परशुराम के संवाद में अक्सर ऐसा मालूम होता है कि जैसे बड़े भाई मजे में उकसा रहे हों छोटे भाई को , कि तुम ताना मारो , मैं तो हूँ ही ,अगर मामला बिगड़ेगा तो बचा ही लूँगा, तुम जरा मामला बढ़ाते रहो ।उसी तरह से , शूर्पणखा की मामले में , मालूम पड़ता है कि बड़े भाई साहब छोटे भाई को अगर उकसा नहीं रहे हैं तो कम से कम मजा तो जरूर ले रहे हैं । आप देखते होंगे कि जिन्दगी में भी , जब कभी किसी दल के २ – ३ लोग होते हैं तो वे आपस में चाहे पहले बातचीत हुई हो या न हुई हो , एक ऐसा इंतजाम – सा कर लिया करते हैं कि एक तो दुशमन को जरा शान्त करेगा और अपने आदमी को जरा डाँटेगा-डूँटेगा तब दूसरा जरा गुस्से में बोलेगा , और फिर दोनों मिल कर उसके ऊपर हावी हो जाएँगे ।ख़ैर । राम ने लक्ष्मण को कभी भी रावण के पास लड़ाई के दौरान नहीं भेजा । जब रावण मर रहा था , तब भेजा । लक्ष्मण लौट कर आया , बोला – रावण तो कुछ बोलने को ही तैयार नहीं । तब राम ने उससे पूछा – तुमने किया क्या था ? लक्ष्मण ने कहा, मैं वहाँ गया और मैंने रावण से कहा कि मुझे राजनीतिशास्त्र बताओ । तब राम ने पूछा – तुम कहाँ खड़े हुए थे । लक्ष्मण ने कहा – कि रावण लेटा पड़ा था , मर रहा था और मैं उसके सिर के बगल में खड़ा हुआ । तो राम बोले – इस तरह से सीखा करते हो , जाओ , पैर के पास खड़े रहो , फिर सवाल पूछो और जवाब माँगो । लक्ष्मण फिर गया , पैर के पास खड़ा रहा तो उसे जवाब मिला । ऐसा बढ़िया – बड़िया किस्से हैं ।

    छोटा-सा किस्सा है कि दुश्मन है , बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी गयी और जब दुशमन मर गया तब उसके पास अपना आदमी जाता है , मर गया तब ।पहले नहीं ।मुमकिन है , मेरे किस्से को मेरे ही खिलाफ कुछ लोग इस्तेमाल कर दें और कहें कि तुम इस किस्से को बता रहे हो , तुम्हें जाना चाहिए , लेकिन रावण मरे तब लक्ष्मण जाता है , मरने के पहले नहीं ।और जा कर सिरहाने नहीं खड़ा होना चाहिए , पैताने खड़ा होना चाहिए ।जब बैठो कहीं मेज पर तो देख कर बैठो कि बगल वाले को कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है । कहीं अपनी जगह से ज्यादा तो नहीं ले रहे हो  वगैरह-वगैरह । ख़ैर ।यहाँ मुझे सिर्फ इतना ही बताना है कि इन किस्सों की एक-एक तफ़सील में ,एक-एक संवाद में , एक-एक बात में मजा भरा है । जरूरी नहीं कि इन किस्सों को आप सही समझें ।जरूरी नहीं है कि आप उसको धर्म मानें । उनको आप सिर्फ उपन्यास की तरह लें ,एक ऐसा उपन्यास जो दस – बीस – पचास हजार आदमिओं तक नहीं , बल्कि जो करोड़ों लोगों तक ५ हज़ार बरसों से चला आया है , और पता नहीं , कब तक चला जाता रहेगा ।

4 Responses to “एक कौम : उसकी हँसी , उसके सपने ( लोहिया : ३ )”

  1. ghughutibasuti Says:

    बहुत अच्छा लिखा है और मन से लिखा है ।
    घुघूती बासूती

  2. अनूप शुक्ला Says:

    सही है। लोहिया जी के बारे में मधुलिमयेजी ने कुछ लेख थे। वे उपलब्ध हों तो पढ़ायें। :)

  3. प्रियंकर Says:

    जब हम लोहिया का साहित्य पढते हैं तो न केवल इस देश की महान विरासत को — इसके मिथकों को — समझने और सराहने की नई दृष्टि पाते हैं वरन लोहिया जैसी बड़ी प्रतिभा के अंतर को भी अंतरंग रूप से जान पाते हैं.

  4. bhaskar Says:

    लोहिया जी एक ऐसे समाजवाद चिन्तक और नेता थे जिनकी विद्वत्ता और अद्भुत विचार शक्ति ने भारत में समाजवाद को हिन्दुस्तानी ढंग से और भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़मीन तैयार की, अन्यथा प्रायः समाजवाद की परिकल्पना वैदेशिक उपमानों और प्रतीकों की निर्भरता से ग्रस्त रहा करती थीI साथ ही लोहिया जी ने अपने वैयक्तिक जीवन में जिस आज़ादखयाली का परिचय बिना किसी ढोंग और कथित नैतिकता का झूठा चोला पहने बिना दिया वह अत्यन्त दुर्लभ है/

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